खंड तीन: उड़ीसा दिशाहीन
ओमसिंह अशफ़ाक
कविता: उड़ीसा* में आमंत्रित अकाल
कालाहांडी, नौपाड़ा-
क्या-बोलांगीर का जिक्र करें !
धरती के लाल तो बेघर होगे-
बूढ़े-बुढ़िया दिन-रात मरें !
दशों-दिशा है बिघन सूखे का
देखो मंडराता आय रहा !
झील कुएं तालाब सूखेंगे-
भू-जल रसातल जाय रहा !
पाणी लूटा उद्योगों ने-
ज़हर हवा में घोल दिया !
नदियों के भी-स्रोत बचे ना
फिर भूख ने धावा बोल दिया !
सभंलपुर और देवगढ़ में-
जल का हाहाकार मचा !
जिला अंगुल के तो गांव तीन सौ-
बिन-प्यासा ना कोई बचा !
ऊपर से तो लू मारे है-
नीचे भूख तापती है !
जवानों को मिला देश निकाला
आबादी शेष हांफती है!
पहले हम काटें थे जिंदगी-
अब जिदगीं हमें काटती है !
हालत वृद्धों की देखी ना जाए
दर्शक की रूह कांपती है !
माह के भीतर तीस की मौते !
क्या हो गया ये होते-होते !
दिन में चैन ना रात में सोते !
मन डूबे-तैरे, खावै गोते !
था बेहतर जो हम ना होते ।
बेमौत ना मरते, ना बाल़क रोते !
(रचना काल 2006 में)
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नोट: उड़ीसा* में अकाल की भयावह में स्थिति और तथ्यों की पुष्टि आशुतोष मिश्र की रपट में है।

कवि के व्हाट्सएप पर प्रतिबिंब मीडिया के नियमित पाठक श्री सुरेंद्र पाल तोमर की यह टिप्पणी प्राप्त हुई है:
“पानी लूटा उद्योगों ने ज़हर हवा मे घोल दिया…वर्तमान युग के लिए यह कटु अनुभव है. समयिक है, अच्छी कविता है.”
-सुरेंद्र पाल तोमर, भारतीय सेना का पूर्व सैनिक, बरेली (उत्तर प्रदेश) भारत।