अन्याय गाथा, खंड आठ
प्रस्तुत कविता बहुजन न्यायवादी कवि ओमसिंह अशफ़ाक की पुस्तक ‘अन्याय गाथा’ के खंड आठ से ली गई है। इसमें उस सफाई कर्मी के इतिहास, वर्तमान, भविष्य तथा उसके जीवन का मामूली सा विवरण है जिसके दम पर सब शहर, गांव, कस्बे हजारों साल से जिंदा हैं! लेकिन कभी उसके खुद के जीवन की मुश्किलों और मुसीबतों की सुध नहीं ली गई है? यहां तक कि कविता में भी उसके विवरण को भदेश ही माना गया है? जबकि सच्चाई यह है कि अगर वह नहीं होता, तो हम सब भी नहीं होते, समाज नहीं होता, ये पूरा राष्ट्र और विश्व भयंकर महामारी की भेंट चढ़कर ख़त्म हो गया होता? -संपादक)
हमें जात-पांत में ना बांट-2
ओमसिंह अशफ़ाक
कविता: बंदा झाड़ू लगा रहा है !
1
बन्दा झाड़ू लगा रहा है !
ना किस्मत अपनी जगा रहा है !
इतिहास वो अपना भूल गया है !
ना सदियों से स्कूल गया है!
कीचड़ के संग कीचड़ होता !
रात में मिट्टी के संग सोता !
सबके गंद को सिर पै ढ़ोता !
बिन इसके कुछ भी ना होता !..
उधर खड़े हैं महल-चौबारे !
छप्पर भी ना इसके द्वारे !
कहता है- किस्मत ने मारे !
ना भय किस्मत का भगा रहा है!
बन्दा झाड़ू लगा रहा है!
2
साथ ही बच्चे, औरत भी है !
फिर भी कोई शौहरत नी है !
क्या जनगणना में भी जिक्र नहीं है?
क्यूं किसी को इसकी फिक्र नहीं है?
नीति नियम बनते रहते हैं !
बिल संसद में टलते रहते हैं !
राज ने इसको खूब दुहा है !
विकास ने अब तक नहीं छुआ है !
सन् सैंतालिस से ही तूफान मचा है!
झूठ या सच घमासान मचा है !
पर आस कोई ना जगा रहा है !
बन्दा झाड़ू लगा रहा है!
3
आरक्षण का जब ढोल बजा है !
सोचा इसने यहीं मजा है !
सब संकट अब कट जायेंगे !
सभी दलिद्दर हट जायेंगे !
भरम-शरम में बरसों जीया !
पर सबने इसका लहू ही पीया !
पंचवर्षी ने इसको भरमाया !
वोट लिये, पीछे सरकाया !
कहा-छुआछूत को हम रोकेगें-
मौके-बेमौके भौंकेगें ?
कभी पांचसूत्री जिक्र चलाया !
कभी बीससूत्री निकल के आया !
इस बियाबान जंगल के अन्दर-
ना इसका कोई सगा रहा है!
बन्दा झाड़ू लगा रहा है!
4
ये काम लूट से बेहतर तो है ?
फिर नाम अभी तक ‘मेहतर’ क्यों है ?
बचपन में मां ने भी यही किया था !
क्यों ‘भंगिन’ उसको नहीं कहा था ?
घर में झाड़ू-पोछा और सफाई !
माता सदा से करती आई !
कभी उसे क्यों ‘अछूत’ न माना !
क्यों ‘भंगी’ को कमतर पहचाना !
है जिसने ऐसा विधान बनाया !
मर्म वो सच का समझ न पाया !
जो लेशमात्र भी सच वो पाता !
‘सर्जन’ का नाम भंगी हो जाता !
हाय, ज्ञान का कैसा अकाल पड़ा है ?
मानव-मानव से त्याज्य खड़ा है !
जाति-पाति में बंटते-बंटते-
ब्राह्मण भी बन ‘तगा’ रहा है!
बन्दा झाड़ू लगा रहा है!
5
जब मुठ्ठी की ताकत जानेगा !
शत्रु को खुद पहचानेगा !
भरम-शरम का जाल़ हटेगा-
शोषण का तब फंद कटेगा !
फिर राजकाज में हिस्सा होगा !
धन-धरती वाला घिस्सा होगा !
झाड़ू से ये संकट नहीं हटेगा !
जाति-पाति में जो नहीं बंटेगा-
ये दुखड़ा प्यारे तभी कटेगा !
अपना पाला़ पहचान ले भाई-
ये अलख़ कवि भी जगा रहा है!.
बन्दा झाड़ू लगा रहा है !
(रचना काल, 2006)
————————–
नोट: उपरोक्त कविता हमें यह परखने और स्वयं का मूल्यांकन करने का मौका देती है कि हमारी सोच, विचार और व्यवहार में कितना अंतर विरोध है और हम हजारों साल से कितना अतार्किक व अमानवीय व्यवहार करते और सहते चले आ रहे हैं।

कवि के व्हाट्सएप पर अंग्रेजी के वरिष्ठ आलोचक व लेखक डॉ एन के नागपाल की यह टिप्पणी प्राप्त हुई है:
” No doubt much improvement has come in the life of safai karamcharies.Still much needs to be done.We have sympathy with them.In offices not much discremation.Dont know much in far flung rural areas.”
-Dr NK Nagpal,
Principal and professor of English (retired)
IGN college, Ladwa, kurukshetra (Haryana) India