कविता में ‘रूपक और सोशल-मेलोड्रामा ‘

कविता में ‘रूपक और सोशल-मेलोड्रामा ‘

प्रस्तुत कविता बहुजन न्यायवादी कवि ओमसिंह अशफ़ाक की पुस्तक ‘अन्याय गाथा’ के खंड आठ से ली गई है। इसमें जाति,लिंग,पेशा,धन, अंधविश्वास, नफ़रत आधारित सामाजिक विभाजन को प्रतीकों के सहारे एक बहुत ही रोचक व रोमांचक “रूपक एवं मेलोड्रामा” की रचना की गई है। कविता में यह नया प्रयोग है। इसमें हमारे समाज की बुनावट में मौजूद भेदभाव तथा अंतरविरोधों की चीरफाड़ ( Dissection) करते हुए उनके निदान की तरफ भी इशारा किया गया है -संपादक)

 

खंड आठ : हमें जात-पांत में मत बांट

 

ओमसिंह अशफ़ाक

 

कविता: जूते, चप्पल और सलिपर

 

1

बन्दा जूती-चप्पल गांठ रहा है !

संग दुखड़े उनके बांट रहा है !

सुबह-सुबह का ये मौका है !

इसमें कुछ भी ना धोखा है !

पेटी पे माथा टिका हुआ है !

‘धन-धन सतगुरु’ लिखा हुआ है !

ये मोची ना कोई अलबेला है !

संग सबके यही झमेला है !

इसका, कोई उसका चेला है !

संग गुरु का नाम फ़सेला है!

ना जेब के अन्दर धेला है !

जो उसका ही सब खेला है-

क्यूं छांट-छांट धन बांट रहा है !

बन्दा जूती-चप्पल गांठ रहा है!

2

जूती-जूते जो वो नहीं बनाता !

मानव तो पंगु हो जाता !

क्यूं काम का उसके मान नहीं है?

क्या मानव का ये अपमान नहीं है?

टूटे-बिगड़े को भी सही बनाता !

है अपने कौशल का निर्माता !

पैर को जब पीड़ा होती थी,

वो आया था बन मुक्तिदाता !

तब कोई मोटर-कार नहीं थे !

ये रस्ते भी हमवार नहीं थे !

उस युग को दिशा दिखाता है !..

फिर इज्ज़त में हुनर क्यों घाट रहा है?

बंदा जूती-चप्पल गांठ रहा है!

3

जितनी जूतों की नकलें हैं !

हममें उतनी कहां अक्लें हैं ?

बस,एक बात है मोटा-मोटी-

है ‘जूता ऊंचा, जूती छोटी’ !

ये रीत-पुरानी चलती आई-

जब-जब जूती ने दी है दुहाई !

ख़ूब हुई उसकी रगड़ाई !

यूं रगड़-रगड़ औकात बताई-

तू पैर की जूती पैर में रहना ?

घणा समझिये थोड़ा कहना !

जो चिरड़-मिरड़ ना रोज करेगी !

पैर के नीच्चै मौज करेगी !

ठीक नहीं ज्यादा इतराना !

दुश्मन है तेरा सारा जमाना !

हर बात पे मालिक डांट रहा है !

बन्दा जूती-चप्पल गांठ रहा है!

4

जूते-जूती में ना बेसिक झगड़ा !

बस, नासमझी का है ये रगड़ा !

जब जूता अपनी ऐंठ दिखावै !

जूती भी सम्मुख अड़ जावै-

बहुत सहा है, अब ना सहूंगी !

सच्ची-सच्ची कहके रहूंगी-

हाड़-मांस जब एक-मेक है !

क्यूं ऊंच-नीच की राम-टेक है?

अब मर्दवाद ना चलने दूंगी !

झूठा अहम् ना पलने दूंगी !

किस बात में तुमसे घाट रही हूं?

फिर क्यूं बारा बाट रही हूं?

अरे झूठा अहम् क्यूं नहीं छोड़ते?

क्यूं अक्ल से रिश्ता नहीं जोड़ते?

यहां ‘कुतवाल ही चोर को’ डांट रहा है।

बन्दा जूती चप्पल गांठ रहा है !

5

कुछ जूतों की ‘गर्दन ऊंची’ है ।

कीमत उनकी हमने पूछी है ।

शोरूम का मालिक झट मुस्काया ।

जूतों का ना मोल बताया ।

एक सादा जोड़ा ला दिखलाया ।

दुनियावी दस्तूर बताया…

भईया छोड़ो इधर उधर की बातें ।

कभी दिन छोटे, कभी लम्बी रातें।

राह-रीत तुमको समझावें ।

बड़ी पते की बात बतावें ।

पैरों को उतना पसराओ-

जितना चादर में आ जावें।

मुंह से तो मीठा बोले है।

नज़र से हमको काट रहा है।

बन्दा जूती-चप्पल गांठ रहा है।

6.

इक ‘हाइहील’ की सैंडल पड़ी हुई है ।

वहां छोटी-सी मैडम खड़ी हुई है ।

यूं शायद उसका कद बढ़ जाए ?

हां, पति की नजरों में चढ़ जाए ?

भला इसमें उसका दोष कहां है ?

पर जग को इतना होश कहां है ?

टीम-टाम पर खूब जोर है ।

मुद्दा असली कहीं और है ।

जब तक उसको ना पकड़ेंगे ।

बस, जूते कपड़ों में अकड़ेंगे ।

चोर तो चांदी काट रहा है ।

बन्दा जूती-चप्पल गांठ रहा है ।

7

जूतों में एक होवे ‘सलिपर’ ।

अजब-गजब हैं ख्याल औ’ खप्पर।

बोइंग में करता असवारी-

धरती पै कहे दिशा शनिचर?

नफ़रत है चप्पलधारी से-

कहता है ये उसे ‘फटीचर’ ।

अरे, बिन पैदी का ये लोटा है।

वर्ग नहीं अब ये छोटा है ।

मन में तो ‘हाइनेक’ से यारी ।

ना जुड़ पाती जब रिश्तेदारी ।

फिसल धड़ाम से नीचे आता ।

हाइनेक को तब गरियाता ।

चप्पल संग आवाज मिलाता !

दुखड़े अपने अनंत बताता ।

कहे इज्जत की मैं रोटी खाता ।

नहीं किसी को कभी सताता ।

‘हाइनेक’ मुझे क्यूं काट रहा है ?

बन्दा जूती-चप्पल गांठ रहा है ।

8

इक दिन सभी ‘फटीचर’ हुए इकट्ठा ।

जोड़न लगे आय का चिट्ठा ।

लगा सलिपर बदलने पाला ।

गौमाता का दिया हवाला-

अरे, मैं तो हूं ट्रस्टी रखवाला ।

बुरे वक्त से पड़ा है पाला !

तुमसे बेशक भिन्न-सा भी हूं।

फिर भी मैं एक इंसां ही हूं..

अब जूती ने उसको हड़काया।

सब करतूतों का भेद बताया ।

रहा सदा तू उसका साथी !

जब तेरी ना पार बसाती !

आन मिला तू मार-के-गाती !

लगा बरतने ठकुर-सुहाती ?

इतना कान खोलके सुणले !

सच्ची बात तू मन में गुणले !

दो-नाव में जिसने करी सवारी !

देर-सबेर डूबण की बारी !

धरी रहेगी सब हुश्यिारी !

क्यूं थूक-थूककर चाट रहा है?

बन्दा जूती-चप्पल गांठ रहा है।

9

‘जूती-चप्पल’ का जब मेल बणेगा !

निर्णायक तब खेल बणेगा !

फिर ‘जूता’ भी संग आन मिलेगा !

किस्मत को पहचान मिलेगा !

नाज़ और नखरे सब भूलेगा !

समता की लय में झूलेगा !

झट ‘सलिपर’ संग होलेगा !..

यूं चारों का जब कट्ठ बण जागा !

अरे ‘हाइनेक’ क्यूंकर डट जागा ?

फिर तो सत्ता छोड़णी होगी !

जनता की जय बोलनी होगी !

तब जनता ही उद्धार करेगी !

अटका बेड़ा पार करेगी !

ज़ालिम पै तगड़ा वार करेगी !

सुनिश्चित उसकी हार करेगी !

फिर बन्दा जो चप्पल गांठेगा !

वो शान से बाकी हक बांटेगा!

चोरों का अभी तक ठाठ रहा है !

बन्दा जूती-चप्पल गांठ रहा है !

 

(रचना काल,2006में)

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नोट: उपरोक्त कविता में प्रतीकों का इस्तेमाल हुआ है। जूती, चप्पल, सेंडल, जूता, स्लीपर, हाईनेक सब किसी न किसी रूप में हमारे समाज के विभिन्न वर्गों-उपवर्गों के प्रतीक के रूप में आए हैं और वे कविता में उन्हीं “वर्गों के विचार” का प्रतिनिधित्व भी करते हैं। जिनको पाठक कविता को पढ़ते हुए आसानी से समझ भी सकता है।

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