चरागाहों पर मंडराता वैश्विक संकट

चरागाहों पर मंडराता वैश्विक संकट

   कुलभूषण उपमन्यु

संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 2026 को चरागाह और पशुचारक वर्ष घोषित किया है. इससे जाहिर है कि वैश्विक स्तर पर चरागाह भूमियाँ संकट ग्रस्त हैं और इन पर ध्यान देने की जरूरत है. इनका क्षेत्रफल भूमि उपयोग में बदलाव के कारण घटता जा रहा है. अतिदोहन और खरपतवारों के कारण इनकी उपजाऊ क्षमता लगातार घटती जा रही है. दुनिया में चरागाह, सवाना घास के मैदान, झाड़ीदार जंगल, रेगिस्तान, पर्वतीय चारागाह, खुले वन और कृषि वानिकी क्षेत्र इसी श्रेणी में शामिल हैं.

वैश्विक क्षेत्रफल का 54% भू भाग किसी न किसी प्रकार की चरागाह भूमियों में शामिल है. जिसमें से 78% शुष्क क्षेत्रों में स्थित है. एक तिहाई जैव विविधता इन्ही क्षेत्रों पर निर्भर है. विश्व खाद्य उत्पादन का 16% इन्ही क्षेत्रों से आता है. चरागाह क्षेत्र भूमि को पोषक तत्व प्रदान करने के अतिरिक्त कार्बन प्रचूषण, इको टूरिज्म,और मनोरंजन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. कुल चरागाह क्षेत्र का 50% भाग अनुत्पादक होने के कगार पर है.

भारतवर्ष में चरागाह भूमियों का क्षेत्रफल 1210 लाख हेक्टेयर है जिसमें से 1000 लाख हेक्टेयर अच्छी स्थिति में नहीं है और पूर्ण उपयोगिता के स्तर की भूमिका निभाने में असमर्थ है. जिसके चलते पशु चारक समुदाय हाशिये पर आते जा रहे हैं और सरकारी नीतियों में भी उनके हितों की ओर उपयुक्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है. खनन और उर्जा परियोजनाएं इन क्षेत्रों में पंहुच को सीमित करती जा रही हैं. देश में ढाई करोड़ लोग पूर्णत: पशुपालन पर आजीविका के लिए निर्भर करते हैं.  ग्रामीण क्षेत्रों और छोटे भू मालिकों की दो तिहाई आबादी को पशुपालन से 16% आजीविका का आधार प्राप्त होता है.

भारत में कुल पशु संख्या 53 करोड़ 61 लाख के लगभग है. जिसमें से गाय, भैंस, मिथुन, याक 30 करोड़ 31 लाख हैं. बाकि सूअर, घोडा, भेड़, बकरी आदि हैं. चरागाह भूमियों के भूमि उपयोग में बदलाव, भूमि कटाव आदि से नुकसान के अलावा खरपतवार आक्रमण से भी चरागाह भूमियों को भारी नुकसान पंहुचा है. खरपतवार चरागाहों की उत्पादकता को 90% तक नष्ट कर देते हैं. लेंटाना, युपिटोरियम, पार्थेनियम, एजरेटम आदि प्रमुख खरपतवार हैं जो चरागाहों को भारी हानी पंहुचा रहे हैं.

हिमाचल प्रदेश का उदाहरण लें तो प्रदेश के कुल क्षेत्रफल 55 लाख 67 हजार हेक्टेयर में से 15 लाख 11 हजार हेक्टेयर चरागाह भूमि हैं. जिसमें से 6000 फुट की ऊंचाई से कम वाले क्षेत्रों की चरागाहें लगभग 80% खरपतवारों की चपेट में आ कर अनुत्पादक हो चुकी हैं. प्रदेश में 2020 की पशु गणना के मुताबिक 44 लाख 13 हजार पशु धन है. जो 2012 की गणना के मुकाबले काफी कम है. जिसका मुख्य कारण पशु चारे की कमी है. भारतीय घास-चारा अनुसन्धान परिषद के एक अध्ययन में पाया गया कि प्रदेश में हरे चारे की आपूर्ति में 20.30% और सूखे चारे की उपलब्धता में 53.61% की कमी है.

इस कमी की पूर्ति करने के लिए पशुपालक पंजाब और हरियाणा से गेहूं और धान का भूसा आयात करते हैं जो 10 से 15 रु. किलो तक यहाँ पंहुचता है. इतने मंहगे चारे से पशु पालन घाटे का सौदा हो गया है इसी कारण लोग पशु पालन से मुंह मोड़ रहे हैं. पशु सडकों में छोड़े जारहे हैं. जिससे फसलें तबाह हो रही हैं और दुर्घटनाओं को न्योता मिल रहा है.

हालांकि प्रदेश के सकल घरेलू उत्पाद में पशु पालन का 28.8% योगदान है किन्तु पशुपालन को पेश मुख्य समस्याओं की ओर सम्यक ध्यान ही नहीं दिया जा रहा है. पर्वतीय क्षेत्रों में पशुपालन मुख्यत: चराई पर निर्भर था. यदि चरागाह में पर्याप्त घास हो तो पशु पालन में लगने वाले श्रम और लागत में आधी कटौती हो जाति है. खूंटे पर बांध कर पशुपालन वह  भी आयातित चारे के आधार पर करना काफी मंहगा मामला है.

हालांकि पशुपालन को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार ने दूध के मूल्य में बढ़ोतरी करने आदि कुछ कदम उठाए हैं किन्तु मुख्य समस्या तो चारे की है. जिस ओर ध्यान नहीं दिया जा रहा है. दुर्भाग्य से सारी चरागाह भूमियाँ भी प्रबंधन के लिए वन विभाग के अधीन हैं. चरागाह प्रबन्धन वन विभाग की मान्य कार्ययोजना का हिस्सा ही नहीं है. इनकी भाषा में तो चरागाहों को प्रति भूमि कहा जाता है. जबकि चरागाह वेस्ट लैंड नहीं हैं, उत्पादक प्रक्रिया का हिस्सा हैं. यदि उनमें घास उत्पादन की क्षमता घट जाति है तो उन्हें कम उपजाऊ चरागाह कहा जा सकता है, न कि वेस्ट लैंड.

जब इस विषय पर सरकार को लिखा तो उन्होंने यह मामला पशुपालन विभाग को भेज दिया. पशुपालन विभाग के पास तो चरागाह भूमि का नियंत्रण ही नहीं है, न ही उनके पास चरागाह सुधार के लिए कोई बजट ही है. इस तरह चरागाह भूमि ऐसी भूमियाँ बन कर रह गई हैं जिनका कोई बेली वारिस नहीं है. वन विभाग तो पहले ही इन भूमि पर चीड़ रोपण करके घास उत्पादन को समाप्त करने का काम कर चुका है. उनकी वर्किंग प्लान में अभी भी चरागाह विकास का तो कोई वर्किंग सर्कल ही नहीं है. केवल कुछ परियोजनाओं के माध्यम से सिल्वी पेस्टोरल मॉडल खड़े करने के प्रयास हुए हैं किन्तु वह मांग और क्षेत्र की दृष्टि से न काफी हैं. उनका अभी तक कोई प्रत्यक्ष सफल मॉडल देखने को कम ही सामने आया है.

हालांकि कृषि विश्व विद्यालय पालमपुर और भारतीय घास चारा अनुसन्धान संस्थान पालमपुर के पास खरपतवार उन्मूलन करके चरागाह को उपजाऊ बनाने का पर्याप्त अनुभव और तकनीक और घासों के बीज उपलब्ध है, किन्तु जरूरत है कि प्रदेश सरकार इस दिशा में उपयुक्त ध्यान दे कर चरागाह विकास को प्रदेश के लिए 28.8% सकल घरेलू उत्पाद का योगदान देने वाले पशुपालन कार्य को तदनुरूप प्राथमिकता दे कर बजट प्रावधान और प्रबन्धन व्यवस्था स्थापित करे. विश्व चरागाह और पशु चारक वर्ष में इस दिशा में की गई पहल एक सकारात्मक वैश्विक संदेश भीं साबित होगी.

लेखक सामाजिक कार्यकर्ता और पर्यावरणविद है।

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