हरियाणाः जूझते जुझारू लोग-133
मिलनसार, खुशमिजाज और सहयोगी साथी बलबीर शर्मा
सत्यपाल सिवाच
बलबीर, यह नाम लेते ही एक खास तरह का अपनापन आ जाता। ऐसे शख्स का चित्र आँखों के सामने उभर आता है जो कभी किसी को सहयोग से “ना” नहीं कहता और उस पर भरोसा करके सब निश्चिंत हो जाते। सन् 1982 में मेरी नियुक्ति छह माह आधार पर हिन्दी अध्यापक के रूप में राजकीय उच्च विद्यालय खुर्दबन (कुरुक्षेत्र) में हुई थी। रादौर से साइकिल पर इकट्ठे जाते समय रास्ते भर मुलाकात धीरे-धीरे एक साथ काम करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि दोपहर पूर्व की छाया की तरह पारिवारिक रिश्ते के रूप में विकसित हो गई। शुरू में कभी दिमाग में नहीं आया था कि ऐसा साधारण दिखने वाला शख्स यूनियन और आन्दोलन के लिए बहुत समर्पित और सच्चा साथी बन सकता है।
उन दिनों मैं अस्थायी शिक्षकों और हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ में सक्रियता के साथ-साथ कभी-कभी अपने आवास की जगह गोष्ठियों का आयोजन करता; अध्ययन केन्द्र चलाता और समाचारों पर चर्चा के लिए चुनिंदा साथियों की बैठक करता। इस प्रक्रिया में पता ही नहीं चला कि कब बलबीर हमारे उस तानेबाने का अभिन्न हिस्सा बन गए थे। बाद में वह कर्मचारी आन्दोलन के सर्वाधिक विश्वसनीय और मजबूत कार्यकर्ता के रूप में विकसित हुआ।
बलबीर का जन्म दिनांक 01 अगस्त 1955 को कैथल जिले ढाण्ड कस्बे के नजदीक चूहड़माजरा गाँव में हुआ। उनकी माँ श्रीमती करेसनी देवी और पिता श्री पूर्णचन्द शर्मा कृषि, पशुपालन आदि के जरिए अपने परिवार का निर्वाह करते थे। ये तीन बहन-भाई हैं। वे पाँचवीं कक्षा तक गाँव के स्कूल में पढ़े और आठवीं तक की शिक्षा ढाण्ड से प्राप्त की। वे सन् 1980 में राजकीय उच्च विद्यालय, खुर्दबन में वाटर करियर कम गार्डनर के पद पर नौकरी में आ गए। यहाँ रहते हुए सभी शिक्षकों से उनके घनिष्ठ संबंध बन गए थे। अध्यापकों द्वारा उत्साहित करने पर उन्होंने प्राइवेट छात्र के रूप में दसवीं कक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद पदोन्नत होकर वे राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय कैम्प यमुनानगर में प्रयोगशाला सहायक बन गए। वहीं से 31 अगस्त 2013 को सेवानिवृत्त हुए।
बलबीर शर्मा के सक्रिय होने के बाद रादौर में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों का संगठन बनाया। जब सर्वकर्मचारी संघ बना तो वे लगातार अलग-अलग भूमिकाओं और ओहदों पर सक्रिय रहे। कोई रैली, धरना, प्रदर्शन, हड़ताल, जेल भरो ऐसा नहीं रहा होगा जिसमें उनकी भागीदारी न रही हो। रादौर में उनका मीटिंगों के अलावा आन्दोलनकारियों के सामूहिक लंगर तैयार करने का स्थान बन गया था। इस काम में उनकी जीवनसंगिनी संतोष और बच्चे भी जुटते। घर और संगठन के बीच कोई दूरी न थी। इसी संघर्ष के चलते उन्हें सन् 1993 की हड़ताल में बर्खास्त कर दिया गया। किसी परिवार के अकेले कमाने वाले की नौकरी पर आन पड़े, यह छोटी बात नहीं है, लेकिन बलबीर के दिल-ओ-दिमाग में कोई बोझ न था। उन्हें एकता, संगठन और संघर्ष की जीत पर अटूट विश्वास था। वह हर कदम सच होता जाता। वे 1987 से 2013 तक सभी संघर्षों में सक्रिय रहे।
ईमानदारी, सच्चाई, सेवाभाव, सादगी और सद्व्यवहार ऐसे गुण थे कि जो उनसे मिला वह अपना बनता गया। जब बलबीर ने रादौर में अपना घर बनाने का विचार किया तो आर्थिक संसाधन जुटाना चुनौतीपूर्ण काम था। उन दिनों हम सभी ऐसी ही स्थिति में थे। मिलजुलकर काम करने की सलाह कर रहे थे। तभी एक मित्र गुरचरण सिंह एस एस मास्टर ने पेशकश की कि वे बलबीर का मकान स्वयं अपने हाथों से बनाएंगे। वे भी जनूनी थे। नौकरी करते हुए भी मकान निर्माण किया। साथी सुभाष काम्बोज और अन्य साथियों ने बलबीर संसाधन जुटाने की चिंताओं से मुक्त कर दिया। वास्तव में यह साथी बलबीर के अपने व्यवहार और आचरण की कमाई थी।
बलबीर शर्मा सन् 1982-83 से ही वामपंथी विचारों के संपर्क में आ गए थे। उन्होंने रादौर क्षेत्र में जनवादी आन्दोलन और संगठनों को बनाने में भूमिका निभाई। चाहे नगरपालिका का मामला हो या आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की यूनियन बनाने का, बिजली बोर्ड में यूनियन खड़ी करनी शुरू की या किसानों के बीच काम किया, बैनर पकड़कर आगे चलने वालों में बलबीर अवश्य होते। रादौर में जनवादी महिला समिति का गठन करने में सुनीता, शान्ति, महेन्द्रकौर, जसवन्त कौर, नंजो आदि के साथ संतोष ने बहुत मेहनत की थी।
दिनांक 22.10.2022 को उनकी धर्मपत्नी संतोष का बीमारी के चलते निधन हो गया था। यह बड़ा और असमय आघात था। जिस साथी ने घरेलू कार्यों को ही नहीं, बल्कि संगठन में भी बढ़चढ़कर भाग लिया था उनका असमय चले जाना पीड़ादायक था। उनकी दो संतान हैंव। बेटी नीलम एम.एससी.(कैमिस्ट्री) हैं और निजी कंपनी में काम करती हैं। बेटा गौरव बी.टेक. तक शिक्षा प्राप्त कर निजी कंपनी में जॉब करता है। दोनों बच्चे विवाहित हैं।

लेखक – सत्यपाल सिवाच
