मंजुल भारद्वाज की कविता – मुर्दे सच बोल गए !

ताकि सनद रहे…

मुर्दे सच बोल गए !

 मंजुल भारद्वाज

 

झूठ के

द्वेष के

आपसी फूट

निर्मल मन की लूट के

घात के प्रतिघात के

नफ़रत और अहंकार के

तीर सब चल गए !

 

ज़हर को उबाल कर

उन्माद को पाल कर

जनआकांक्षाओं के रक्त से

सिहांसन सजाया था

राष्ट्र के मान का

जनता की जान का

मिथ्या ध्वज उतर गया

तीर सब चल गए !

 

ज़िंदगी डुबाने वाले

कफ़न लपेट तैर गए

लाशों के अम्बार से

मरघट भी सहम गए

जलती चिताओं में

सारे वादे जल गए !

 

राष्ट्रद्रोह से डरी अवाम

जब खामोश रही

मुर्दे सच बोल गए

तीर सब चल गए !

One thought on “मंजुल भारद्वाज की कविता – मुर्दे सच बोल गए !”

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