माँ – वह रिश्ता, जिसे समझने में अक्सर पूरी उम्र लग जाती है

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

मातृ दिवस पर विशेष

माँ – वह रिश्ता, जिसे समझने में अक्सर पूरी उम्र लग जाती है

डॉ रीटा अरोड़ा

 

*मातृ दिवस केवल एक दिन नहीं, उस प्रेम को महसूस करने का अवसर है जो बिना शर्त जीवनभर हमारे साथ चलता है*

बारिश की ठंडी रात थी।

बेटा पढ़ते-पढ़ते सो गया था। अचानक तेज़ बिजली कड़की तो उसकी आँख खुल गई। उसने देखा, माँ चुपचाप उसके पास बैठी थी और हाथ से पंखा झल रही थी क्योंकि बिजली चली गई थी।

बेटे ने उनींदी आवाज़ में पूछा, “माँ, आप अभी तक सोई नहीं?”

माँ हल्का-सा मुस्कुराई और बोली, तू आराम से सो जाए, बस वही मेरी नींद है बेटा…”

बेटा फिर सो गया। लेकिन उस रात उसे पहली बार एहसास हुआ – माँ केवल हमारे साथ नहीं रहती, वह हर पल हमारे लिए जीती है।

माँ… यह केवल एक शब्द नहीं है। यह वह एहसास है, जिसे जितना समझने की कोशिश करो, उतना ही छोटा महसूस होने लगता है। जब बच्चा पहली बार इस दुनिया में साँस लेता है, उसी क्षण एक माँ अपने लिए जीना थोड़ा-थोड़ा कम कर देती है। उसके बाद उसकी दुनिया का केंद्र वह बच्चा बन जाता है, जिसकी छोटी-सी मुस्कान उसके सारे दर्द भुला देती है।

मई के दूसरे रविवार को दुनिया “मदर्स डे” मनाती है। लोग तस्वीरें साझा करते हैं, उपहार देते हैं और अपनी माँ के लिए कुछ शब्द लिखते हैं। लेकिन सच तो यह है कि माँ का कर्ज किसी एक दिन में नहीं चुकाया जा सकता। क्योंकि माँ वह रिश्ता है, जो हर दिन चुपचाप हमारे लिए जीता है।

हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि जिस थाली में हमें गरम खाना मिलता था, उसके पीछे किसी माँ के ठंडे हो चुके हाथ होते थे। जिस स्कूल बैग को हम बिना सोचे उठा लेते थे, उसके पीछे किसी माँ की अधूरी नींद होती थी। हमारी छोटी-सी बीमारी पर जो सबसे ज्यादा घबराता था, वह डॉक्टर नहीं… हमारी माँ का दिल होता था।

विज्ञान कहता है कि माँ के भीतर ऑक्सीटोसिन जैसे हार्मोन उसे बच्चे से गहराई से जोड़ते हैं। लेकिन क्या कोई विज्ञान यह समझा सकता है कि आखिर क्यों एक माँ खुद भूखी रह सकती है, लेकिन अपने बच्चे को भूखा नहीं देख सकती? क्यों वह पूरी रात जाग सकती है, लेकिन बच्चे की आँखों में आँसू नहीं देख सकती?

शायद इसलिए क्योंकि माँ का प्रेम शरीर से नहीं, आत्मा से जन्म लेता है।

इतिहास में ऐसी अनगिनत घटनाएँ हैं, जहाँ माँ ने अपने बच्चे के लिए खुद को मिटा दिया। 1950 के कोरिया युद्ध की वह घटना आज भी दुनिया को रुला देती है। भीषण ठंड में एक माँ ने अपने नवजात बच्चे को बचाने के लिए अपने शरीर की अंतिम गर्मी तक उसे ढककर रखा। जब लोग वहाँ पहुँचे, बच्चा जीवित था… लेकिन माँ जा चुकी थी।

यह केवल कहानी नहीं है। यह माँ होने की सबसे बड़ी सच्चाई है –

माँ खुद टूट सकती है, लेकिन अपने बच्चे को टूटने नहीं देती।

आज की दुनिया बदल चुकी है। बच्चे अपने सपनों के लिए दूर शहरों और देशों में जा रहे हैं। लेकिन हर माँ की खुशी आज भी अपने बच्चों की सफलता में ही बसती है। वह उन्हें रोकती नहीं, बल्कि गर्व से कहती है

“जाओ बेटा, अपने सपने पूरे करो।”

और फिर वही माँ घंटों फोन की एक घंटी पर मुस्कुरा देती है।

बच्चों की भेजी हुई तस्वीरों को बार-बार देखती है।

लोगों से गर्व से कहती है –

“मेरा बच्चा बहुत अच्छा कर रहा है।”

शायद माँ की सबसे बड़ी खूबी यही है –

वह अपने दर्द से ज्यादा अपने बच्चों की उड़ान को महत्व देती है।

लेकिन इस भागती दुनिया में कहीं न कहीं हम अपनी माँ को “स्वाभाविक” मानने लगे हैं। हमें लगता है कि माँ तो हमेशा साथ रहेगी। हम यह भूल जाते हैं कि जिस चेहरे को हमने हमेशा मजबूत देखा, वह भी थकता है। जिस आवाज़ में हमेशा हौसला सुना, वह भी कभी-कभी सिर्फ अपनापन चाहती है।

माँ को महंगे उपहारों की जरूरत नहीं होती। उसे बस इतना चाहिए कि उसका बच्चा कुछ पल उसकी बातें सुन ले।

बिना जल्दी में हुए उससे पूछ ले –

“माँ, आप कैसी हो?”

क्योंकि सच यह है कि दुनिया की सबसे बड़ी सफलता भी उस दिन अधूरी लगती है जिस दिन माँ की आँखों में खुशी न हो।

*माँ केवल जीवन का हिस्सा नहीं होती…*

*वह वह वजह होती है, जिसके कारण जीवन खूबसूरत लगता है।*

0