हरियाणाः जूझते जुझारू लोग-118
सुतारदीन मिर्जा – जीवट वाले कार्यकर्ता
सत्यपाल सिवाच
सुतारदीन मिर्जा का जन्म दिनांक 02 अप्रैल 1966 को हिसार जिले के जाखोद खेड़ा गांव में हुआ। वे मुस्लिम अल्पसंख्यक लुहार परिवार में जन्मे। उनके पूर्वज मुलतान जिले के निवासी थे। वहाँ से आकर राजस्थान के गंगानगर जिले के गांव झांसल में रहे। वहीं से मुल्लापुर जिला हिसार में आए जहाँ तकरीबन तीन शताब्दी से रह रहे हैं। इनके साथ राजस्थान से भाई-बंधु हरियाणा के कई गाँवों जैसे चिकनवास, खरकड़ी, समैन, बौबुआ, बाबा लदाना आदि कई गाँवों में अपने-अपने काम-धंधे के लिए जा बसे। इनके दादा सरफूदीन जाने-माने सम्पन्न परिवार से थे। गाँव मुल्लापुर में इनके पास जमीन भी थी, खेती-बाड़ी के औजार बनाना आदि कार्य था।
इनके पिता जी शेरदीन के अलावा इनके पिता जी के पाँच भाई व तीन बहनें थीं। विभाजन के बाद एक बड़ी बहन पाकिस्तान चली गई। इनके पिता जी सभी भाइयों में बड़े थे। परिवार में सभी भाई इनके कहने पर कार्य करते थे। उनका इतना प्रभाव था कि परिवार के बच्चे भी डरते थे। इनके पिता जी उर्दू की चार कक्षा (जमात) पढ़े थे। इनके पिता जी शेर दीन की शादी हुई, पहले वाली बेगम पाकिस्तान अपने माँ-बाप के साथ चली गईं। उन्होंने दूसरी शादी गाँव सदलपुर में अल्लारख की पुत्री शकूरी के साथ हुई। इनके तीन लड़के शमसुदीन, सुतार दीन, गुलाबदीन हुए तथा इनकी पाँच बहनें हुईं। सुतार दीन के भाई शमसुदीन व गुलाबदीन आदमपुर में दुकान करते हैं।
सुतारदीन मिर्जा ने गाँव जाखौद खेड़ा (हिसार) के सरकारी स्कूल से दसवीं की। दो साल कॉलेज में पढ़ाई करने के बाद जेबीटी की ट्रेनिंग करके जनवरी 1986 को बतौर प्राथमिक अध्यापक कार्य शुरू किया। सबसे पहले गाँव रामसरा में बाद में गाँव चिंदड़ में रहे। उसके बाद 1991 में गाँव सीसवाल लाखपुल में लगभग 25 वर्ष के बाद गाँव सीसवाल के प्राथमिक पाठशाला में अब तक अपनी सेवा दी। कुल 38 साल 3 महीने 2 दिन की सेवा पूरी करके 30-4-24 को सेवा निवृत्त हुए।
इनका एक लड़का डॉक्टर फिजियोथेरेपिस्ट व दो लड़कियाँ बी.ए. – एम.ए. तक पढ़ी-लिखी हैं। सुतारदीन कक्षा प्रथम में पढ़ाई शुरू की तथा पढ़ाई में हमेशा अग्रणी पंक्ति में रहे। पढ़ाई के साथ-साथ खेल में बड़ी रुचि लेते रहे, दौड़, कुश्ती व कबड्डी इनका पसंद का खेल था। स्कूल लेवल पर हमेशा मॉनिटर व सोसल वर्कर का कार्य भी रुचि थी। छात्रों की समस्याओं हेतु लड़ना व अगुवाई करने का बड़ा चाव था। कॉलेज में भी एस.एफ.आई. के साथ काम किया। गाँव में जनवादी नौजवान सभा के साथ काम करते हुए संघर्ष किया।
अध्यापक लगने के बाद कच्चे कर्मचारी होते हुए भी 1987 से सर्वकर्मचारी संघ के आंदोलनों में हिस्सा लेते थे। संगठन के पदाधिकारियों शेर सिंह, बनवारी लाल बिश्नोई, फूल सिंह श्योकंद, पूनमचन्द रती के भाषणों से प्रभावित होकर संगठन आना-जाना शुरू किया। संगठन में ब्लॉक प्रधान, जिला उपप्रधान सर्वकर्मचारी संघ तथा अध्यापक संघ में ब्लॉक प्रधान, जिला प्रधान आदि पदों पर रहते हुए काफी संघर्ष किया। हर प्रकार के आंदोलनों में भी भागीदारी रही। हरियाणा रोडवेज की हड़ताल में भूख हड़ताल पर बैठे, पीटीआई शिक्षकों के आंदोलन में भूख हड़ताल पर रहे, किसान आंदोलन, मजदूर आंदोलन, महिला, आशा वर्कर, मिड-डे मील, आंगनवाड़ी आदि सभी आंदोलनों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते रहे।
आंदोलन में भेष बदल कर और भूमिगत रहकर भी सक्रिय रहे और अनेक बार जेल गए। कोई भी सरकार रही हो उसके खिलाफ आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लिया। भजनलाल के क्षेत्र में रहते हुए स्थानीय स्तर पर सक्रिय रहना कम चुनौतीपूर्ण नहीं था।
वे अधिकारियों अथवा राजनेताओं के साथ टक्कर लेने में नहीं झिझकते थे। कर्मचारियों के हकों पर डाका डालने वाले अथवा हकों को न मानने वालों अधिकारियों के खिलाफ बेखौफ होकर मोर्चा लगा देते थे।
इसके अलावा सामाजिक कार्यों में भी बढ़-चढ़ कर काम किया। इन्होंने अपने धार्मिक संगठन मुस्लिम खिदमत सभा के राज्य उपाध्यक्ष व जिला मुस्लिम कल्याण कमेटी के सदस्य
के रूप में काम भी किया। अपने गाँव में जो मस्जिद है उसके भी 6 साल प्रधान रहे। गाँव में होने वाले कार्यों में भी सहयोग करते रहते हैं।

लेखक – सत्यपाल सिवाच
