नहीं रहे रघु राय, मानो रफ्तार को ठोकर लग गयी

18 दिसंबर 1942 – 26 अप्रैल 2026

देश के दिग्गज फोटोग्राफर/ फोटो पत्रकार रघु राय का आज (26 अप्रैल 2026) को 83 साल की उम्र में निधन हो गया। उनके फोटोग्राफ परिदृश्य को खुदबखुद बयां कर देते थे, केवल कैप्शन ही काफी होता था। मानवीय संवेदना उनके फोटो की पहली शर्त होती थी। वह फोटोग्राफी के किवदंति थे। प्रतिबिम्ब मीडिया के पाठकों के लिए कुमार सौवीर द्वारा उन पर लिखा गया लेख प्रकाशित कर रहे हैं। प्रतिबिम्ब मीडिया की उस महान शख्सियत को विनम्र श्रद्धांजलि।

आदरांजलि

नहीं रहे रघु राय, मानो रफ्तार को ठोकर लग गयी

  • 1971 के युद्ध से लेकर 1984 की भोपाल गैस त्रासदी तक

  • यूपी में भी बेहतरीन फोटोग्राफर हैं, लेकिन समग्रता में नहीं

कुमार सौवीर

भारत की दृश्य-स्मृति जैसे एक साथ ठहर-सी गई है। रघु जी का निधन केवल एक महान फोटोग्राफर का जाना नहीं, बल्कि उस दृष्टि का अवसान है जिसने दशकों तक भारत को उसकी पूरी जटिलता, करुणा और जीवंतता के साथ दुनिया के सामने रखा। इस शख्‍स ने जिन्‍दगी में बेहिसाब झंझावत देखे, मोड़ देखे, लेकिन कभी थमे नहीं। सिविल इंजीनियरिंग की पढाई लेकिन कन्‍नी छोड़ कर कैमरा थाम लिया। एस पॉल थे बड़े भाई, ख्‍यातिनाम फोटोग्राफर थे। उनसे सीखा और फाइनल टच सीधा हेरनी कार्टर ब्रेंसन से। स्‍टेट्समैन अखबार से लेकर इंडिया टुडे तक काम किया, लेकिन दर्जनों देशों के लिए भी काम करते रहे। कुछ बरस से वे कैंसर की जद में आ गये थे। करीब दो बरस तक इलाज होता रहा, और आज—

अभी-अभी प्रख्‍यात कलाकार सुमन कुमार सिंह से यह खबर सुनी, तो दिल धक्‍क से रह गया। 1942 में अविभाजित भारत के झंग में जन्मे रघु राय का शुरुआती जीवन किसी कलाकार की नियति जैसा नहीं था। उन की तस्वीरों में तकनीक से अधिक मनुष्य था, संरचना से अधिक संवेदना थी। उन्होंने कैमरे को दस्तावेज़ीकरण का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मा की भाषा बना दिया। 1971 के बांग्लादेश युद्ध से लेकर 1984 की भोपाल गैस त्रासदी तक, उनके कैमरे ने इतिहास के सबसे तीखे और असहज क्षणों को इस तरह दर्ज किया कि वे सिर्फ दृश्य नहीं रहे, बल्कि सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन गए।

रघु राय की खासियत यह थी कि वे केवल आपदाओं या राजनीतिक घटनाओं के फोटोग्राफर नहीं थे, बल्कि वे मनुष्य के भीतर की नमी को पकड़ते थे। उन्होंने मदर टेरेसा, दलाई लामा और बिस्मिल्लाह ख़ाँ जैसे व्यक्तित्वों को इस तरह चित्रित किया, जैसे कैमरा नहीं, कोई आत्मीय साक्षात्कार चल रहा हो। उनके फ्रेम में भारत केवल एक भूगोल नहीं, बल्कि एक जीवित अनुभव बनकर उभरता है, जहाँ भीड़ में अकेलापन है, गरीबी में गरिमा है, और अव्यवस्था में भी एक अद्भुत लय है। उनकी तस्वीरें यह सिखाती हैं कि देखने का मतलब केवल देखना नहीं, बल्कि समझना और महसूस करना भी है।

उनकी फोटोग्राफी में एक नैतिक आग्रह भी था। वे सनसनी के पीछे नहीं भागते थे, बल्कि उस क्षण को पकड़ते थे जहाँ मनुष्य की असली कहानी खुलती है। यही कारण है कि भोपाल गैस त्रासदी की उनकी तस्वीरें आज भी केवल पत्रकारिता नहीं, बल्कि एक नैतिक दस्तावेज़ मानी जाती हैं।एक ऐसी गवाही, जो समय के साथ फीकी नहीं पड़ती। रघु राय ने भारत को केवल शहरों, नेताओं या घटनाओं में नहीं देखा, बल्कि उन्होंने उसकी धूल, उसके त्योहार, उसके संघर्ष, उसकी थकान और उसकी उम्मीद, सबको समान महत्व दिया। उनके लिए भारत कोई विषय नहीं था, वह एक सतत संवाद था।

83 वर्ष की आयु में उनके निधन के साथ एक युग का अंत अवश्य हुआ है, लेकिन उनकी तस्वीरें इस बात का प्रमाण हैं कि सच्ची कला मृत्यु के बाद भी जीवित रहती है। रघु राय ने शब्दों के बिना जो लिखा, वह शायद शब्दों में कभी नहीं लिखा जा सकता। उन्होंने हमें यह सिखाया कि कैमरा केवल आँख का विस्तार नहीं, बल्कि अंतःकरण का भी विस्तार हो सकता है। आज जब हम उन्हें विदा करते हैं, तो यह एहसास और गहरा हो जाता है कि उन्होंने केवल तस्वीरें नहीं खींचीं, बल्कि भारत की आत्मा को समय के भीतर स्थिर कर दिया। उनका बेटा अवनींद्र राय भी उनकी पीढी को समृद्ध कर रहा है।

जानकार बताते हैं कि रघु राय का जीवन दो धाराओं में बहता रहा है। एक तो निजी जीवन की सादगी और सीमितता, और दूसरी, सार्वजनिक जीवन की अद्भुत व्यापकता, जिसमें उनका कैमरा एक पूरे देश और समय का साक्षी बन गया। सच बात यह है कि भारत की फोटोग्राफी बेहद समृद्ध रही है। जहां-जहां मैंने काम किया, उनमें पाली-मारवाड़ में दैनिक भास्‍कर का सुरेश हेमनानी, लखनऊ में प्रदीप शाह कुमांया, किशन सेठ, आरबी थापा, रवि बाल्‍मीकि और जौनपुर में आशीष श्रीवास्‍तव पोलू आदि बेहतरीन छायाकार हैं। हालांकि इसके पहले लखनऊ का संजीव प्रेमी, राजू तिवारी भी खासी मेहनत और दृष्टि रखते थे। इन लोगों का काम बेमिसाल रहता रहता रहा है। लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह है कि फोटोग्राफर होने के बाद उनका दिमाग सातवें आसमान में उड़ने लगता है। जाहिर है कि इस कवायद में उनकी जमीन उनके पैरों से निकल चुकी होती है। राजू तिवारी, रवि बाल्‍मीकि और सुरेश हेमनानी में एक गजब खासियत रही, कि उन्‍होंने कभी जमीन नहीं छोड़ी। हां, मैं पहले ही कह चुका हूं कि यह सब के सब बेहतरीन थे, लेकिन समग्रता में नहीं।

कुमार सौवीर के फेसबुक वॉल से साभार

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