कसौली डायरी -4, यात्रा वृत्तांत
कसौली के बंगले और सैकड़ों कहानियां
संजय श्रीवास्तव
कसौली की मॉल रोड दो हिस्सों में बंटी है. अपर मॉल और लोअर मॉल. इनमें एक से एक कोलोनियल बंगले हैं और उनकी सैकड़ों कहानियां। शाम की टिमटिमाती लाइट्स में यहां घूमते हुए लगता है जैसे वक्त मानो ठहर सा गया हो. 100 साल से पुराने अंग्रेजों के बंगले, जिन्हें अब भारतीय व्यापारी, अफसर और नेता आबाद करते हैं. हर बंगले की अपनी कहानियां हैं – यादें और दर्द भी.
शुरुआत सेंट्रल प्वाइंट से करते हैं. वो बिल्डिंग जहां कसौली के मॉल रोड की मुख्य दुकानें हैं. पुराना स्टूडियो, एक स्टाइलिश रेडिमेड कपड़ों की दुकान, डिपार्टमेंटल स्टोर. ऊपर रेस्टोरेंट्स और कुछ और दुकानें. ये दो मंजिला कांप्लैक्स कसौली का वो पड़ाव है, जहां से एक रोड ऊपर जाती है यानि अपर मॉल में और दूसरी नीचे यानि लोअर मॉल में. इन दोनों इलाकों में कुछ खास बंगले हैं. खुले, सुंदर, बड़े और पुरानी कोलोनियल शैली के. इन पर अब भी इनके अंग्रेज मालिकों के नाम हैं या अंग्रेज मालिकों के रखे गए नाम. मालिक तो बेशक बदल गए लेकिन नाम नहीं बदले.
मॉल रोड के बीच शॉपिंग कांप्लैक्स का काम करती हैरिटेज बिल्डिंग का नाम है जकी मल बिल्डिंग. कसौली का सबसे पुराना शॉपिंग कॉम्प्लेक्स. इसे ब्रिटिश काल में ही बनाया गया. इसे जालंघर के एक पंजाबी व्यापारी परिवार ने बनाया. उन्होंने फिर कसौली मे्ं अपना व्यापार फैलाया. उसमें अब कसौली का सबसे पुराना और एकमात्र फोटो स्टूडियो है, जहां लारेंस स्कूल सनावर के स्टूडेंट आकर फोटो खिंचाते हैं., यहां लॉरेंस के पुराने स्टूडेंट्स संजय दत्त, पूजा बेदी, परीक्षित साहनी और कई के फोटो लटके दिखते हैं, इसके बगल वाली रेडिमेड कपड़ों की दुकान जाकी मल परिवार की है. कहते हैं कि यहां कसौली के सबसे अच्छे कपड़े मिलते हैं. सबसे किनारे की दुकान गुप्ता ब्रदर्स है, जहां की तरह तरह की चटनियां मशहूर हैं.
ये बिल्डिंग अब भी कोलोनियल इरा की पुरानी शैली में है — लकड़ी, पत्थर और स्लोपिंग रूफ. पुराना चार्म बरकरार. यहां से ऊपर अपर माल में चलते हैं. थोड़ा ऊपर केंद्रीय रिसर्च इंस्टीट्यूट की वैक्सीन लैब है, जो कभी कुत्ता काटने के टीका बनाने के लिए फेमस थी. अब यहां तमाम बीमारियों के टीके बनाने के लिए रिसर्च होती रहती है. यहां दिन में चार बार बजने वाला साइरन पूरे कसौली में सुनाई पड़ता है. इसे एक जमाने में पाश्चर हास्पिटल के तौर पर जानते थे, कुत्ता काटने की रैबीज दवा यहीं मिलती थी. अब ये CRI स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन कई तरह की वैक्सीन बनाता है. ये राष्ट्रीय इन्फ्लुएंजा सेंटर है. अब नई बीमारियों के लिए लैब विकसित कर रहा है.
थोड़ा ऊपर कसौली क्लब है. किसी जमाने में ये खूबसूरत बिल्डिंग सैन्य अफसरों और नामवर सिविलियंस के मेंबरशिप वाला क्लब थी. अब भी शाम को महफिलें जमती हैं. इसमें खानपान, लाइब्रेरी, एंटरटेनमेंट की व्यवस्था है. 1880 में बनी ये बिल्डिंग वाकई बेहद खूबसूरत लगती है लेकिन इसमें हरकोई तो जा नहीं सकता, लिहाजा मैं भी कैसे जा सकता था. बस बाहर से ही निहार लिया. थोड़ा आगे बाईं और नीचे खुशवंत सिंह का अंग्रेजों के जमाने का बंगला है, जो उन्हें ससुर से सौगात में मिला. सड़क ऊपर जा रही है. ऊपर सैन्य अफसरों का एक गेस्ट हाउस है. ये लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह के नाम पर है. उससे पहले कुछ बंगले हैं, जिन्हें शायद लग्जरी गेस्ट हाउस में बदला जा चुका है.
आर्मी अफसरों का गेस्ट हाउस खत्म होते ही एक खूबसूरत का कॉफी कंफेक्शनरी क्योस्क है. उसके ठीक सामने छोटी सी पहाड़ी, जिसमें एक बंगला हरियाली के झुरमुटों केे बीच नजर आता है. गेट पर नाम लिखा है – लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह. वो तो नहीं रहे लेकिन ये प्राइवेट प्रापर्टी उनकी बेटी की है. वैसे अमृतसर के किसी भी शख्स से इस जनरल का नाम पूछेंगे तो वो तपाक से यही कहेगा कि अरे उन्होंने 1965 की लड़ाई में अमृतसर को पाकिस्तान के हाथों में जाने से बचाया था.
जनरल की पर्सनालिटी और कदकाठी किसी शेर जैसी. उनकी कहानी में रोमांच भी है और बहादुरी को सुनकर पैदा होने वाला सम्मान भी. ये ऊपर आपने जो स्कैच देखा, ये उन्हीं के कसौली बंगले का है. वह 1965 के भारत-पाक युद्ध में वेस्टर्न कमांड के कमांडर थे. कहते हैं कि अमृतसर की रक्षा के लिए आर्मी चीफ के आदेश को ठुकरा दिया था. ये कहा कि किसी भी तरह श्री हरिमंदिर साहिब नहीं खोने देंगे.
पंजाब के अमृतसर में स्वर्ण मंदिर परिसर के भीतर बने केंद्रीय सिख संग्रहालय की दीवारों पर खासतौर पर ले. जनरल हरबख्श सिंह का चित्र लगा हुआ है. ये सम्मान स्वर्ण मंदिर ने कम ही सिख अफसरों को दिया है. नवंबर 2017 में, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी ने केंद्रीय सिख संग्रहालय में लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह, लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोरा और भारतीय वायु सेना के मार्शल अर्जन सिंह समेत कई सिख युद्ध नायकों के चित्र लगाए थे.
पंजाब में पीढ़ियों से चली आ रही कहानी यह है कि पाकिस्तान के हमले की भयावहता से चिंतित होकर दिल्ली स्थित सेना नेतृत्व ने ब्यास नदी के पीछे हटने का आदेश दिया, ये ऐसा कदम था जिससे अमृतसर और दरबार साहिब पर कब्ज़ा होने का खतरा मंडरा रहा था. लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह ने आदेश नहीं माना. उनकी अगुवाई मेंभारतीय सेना ने अपनी स्थिति बनाए रखी, पाकिस्तानी आक्रमण को विफल किया और पंजाब को और अधिक घुसपैठ से सुरक्षित रखा. हालांकि युद्ध के बाद कुछ लोगों ने उनकी अवज्ञा पर सवाल उठाने की कोशिश की लेकिन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह के विवेक और शौर्य को पहचानते हुए उनका दृढ़ता से समर्थन किया. बाद में 1966 में सरकार ने उन्हें भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार पद्म विभूषण से सम्मानित किया. तो ये कसौली में ऊपर ही पहाड़ी पर बना अकेला बंगला उन्हीं का है.
बगल का रास्ता आगे जा रहा है, जिसमें गिल्बर्ट ट्रैल जाने का रास्ता है और गिल्बर्ट हाल में कसौली के सैन्य कमांडर का बंगला है. यहां हवा शुद्ध है और तापमान भी कम.
इसी रोड पर कसौली को बसाने वाले सर हेनरी लॉरेंस का बंगला सनीसाइड भी है. अभी तो लोअर मॉल के बंगले और कहानियां रह ही गईं. उनको भी घूमेंगे.
