जीवन से मुक्ति का शोध नहीं करने देती दुनिया!
– मंजुल भारद्वाज
दुनिया जड़ है और नए प्रवाह से डरती है। इसलिए सवालों से घबराती है। सवालों को दबाती है। सवालों की दिशा मुक्ति की बजाए भोग की तरफ़ मोड़ देती है।
इसका पहला उदाहरण है शिक्षा व्यवस्था। पूरी शिक्षा व्यवस्था सत्ता अनुकूलन है। पेट भरने, व्यवस्था को चलाने,परंपराओं को ढोने वालों को तैयार करती है। जो ज्यादा सत्ता अनुकूलित होता है उसका सबसे बड़ा ईनाम देती है, उसको सफ़ल बताती है , उसी को सफ़लता का मॉडल,मार्ग और मापदंड मानती है।
सवालों की हत्या करने का षड्यंत्र रचती है। मानव शरीर धारण किए 97 प्रतिशत इसी में खप जाते हैं स्वयं को धन्य मानते हैं।
बाकी के तीन प्रतिशत में से दो प्रतिशत प्रस्थापित सत्ता और उसके स्वामित्व को चुनौती देते हैं। अलग अलग कालखंड में अलग अलग विधियों का उपयोग कर सत्ता पर काबिज़ हो पूरी धरा और संपदा के स्वामी बन जाते हैं।
बचा हुआ एक प्रतिशत दुनिया के जड़त्व को चुनौती देता है। पर वो विकट राह चुनते हैं। सूली पर चढ़ते हैं। दुनियादारी को छोड़ जंगलों में समाधिस्थ हो जाते हैं पर वो दुनिया के चक्र को बदल देते हैं। अमूमन यह सौ से 500 साल की कलावधि के दरम्यान होता है।
धीरे धीरे नई धारणा सृजित होती है जो आमूल व्यवस्था को बदल देती है। पर वो धारणा उतने दिन चलती है जितना प्राण सृजनकार उस धारणा में डालता है। धीरे धीरे 97 प्रतिशत उसे फ़िर जड़ बना लेते हैं,यह भक्त उसको भूलते नहीं उस धारणा को निष्प्राण कर परम्परा के नाम पर ढोते हैं।
जब यह एक प्रतिशत अपनी राह चुनते हैं तो यह दुनिया उन्हें सूली पर चढ़ा देती है। जबकि यह वो राह अपने लिए नहीं चुनते अपितु दुनिया की मुक्ति के लिए चुनते हैं।
याद कीजिए उस व्यक्ति को जो दुनिया की प्रचलति धारणा के विरुद्ध बोला था कि सूर्य नहीं पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है। सोचो कितना अदम्य साहस,आत्मबल,शोध और प्रमाण पर टीका उसका आकलन रहा कि वो धर्म सत्ता, राजनैतिक व्यवस्था,प्रस्थापित वैज्ञानिक मानदंड के विरुद्ध अकेला खड़ा रहा। कल्पना करो 98 प्रतिशत के खिलाफ़ वो अकेला खड़ा था ।
अपने ज़हन में तसव्वुर करो सारी दुनिया उसको उंगली दिखा रही थी और कह रही थी तू गलत है,तू गलत है पर वो ज्ञान के साथ था , सत्य के साथ था,प्रमाण के साथ था , इसलिए अडिग रहा !
नतीजा मूर्ख दुनिया ने उसे मौत का ईनाम दिया ! और आज यह दुनिया उसी के सत्य पर अब तक चल रही है…..
इसलिए जिनको प्रश्नों से , सवालों से इश्क़ है वो आपे जीवन की आहुति देने के लिए तैयार रहें और प्रकृति से कहें कि इस मूर्ख दुनिया को मुआफ़ कर दो !
जब शोध करने के लिए आप मार्ग चुनते हो तो व्यवस्था का प्रमाण पत्र लेने के मत चुनो ! दुनिया को सत्य पथ दिखाने के लिए चुनो!
इस दुर्गम पथ के हर मोड़ पर आपको अलग अलग विद्वानों का ज्ञान और शोध मिलेगा आपकी मदद करेगा । लेकिन उस ज्ञान से मूढ़ बन चुके उसके भक्त तुम्हारी हर बात को गलत ठहराने के लिए अपना सब झोंक देंगे।
यहां तक कि अंततः वो तुम्हारी हत्या कर देंगे… इसके प्रमाण इतिहास में दर्ज़ हैं और वर्तमान में हो रहे हैं…..
