आज के हरियाणा की चुनौतियां..1

आज के हरियाणा की चुनौतियां..1

रणबीर सिंह दहिया

हरियाणा ने 1966 में अपना अलग प्रदेश के रूप में सफ़र शुरू किया और आज 2026 तक पहुंचा है । इस बीच बहुत परिवर्तन हुए हैं । इनका सही सही आकलन ही हमें आगे की सही दिशा दे सकता है ।

इसके बनने के वक्त पिछड़ी खेती बाड़ी का दौर था । उसके बाद हरित क्रांति का दौर आया । हरित क्रांति का दौर अपने आप नहीं आ गया । यहाँ के किसान और मजदूर की मेहनत रंग ले कर आई जिसने सड़कों का जाल बिछाया, बिजली गावों -गावों तक पहुंचाई । नहरी पानी की सिचाई का भी विस्तार हुआ । इस सब का सही सही आकलन शायद ही हुआ हो । मगर एक बात जरूर देखी जा सकती है कि इस के आधार पर ही हरित क्रांति दौर आ पाया ।

नए बीज, नए उपकरण, नयी खाद, नए तौर तरीकों को यहाँ के किसान मजदूर ने अंगीकार किया और हरयाणा के कुछ हिस्सों में हरित क्रांति ने उन क्षेत्रों की खेती की पैदावार को बढ़ाया ।

वहीँ आहिस्ता आहिस्ता इसके दुष्प्रभाव भी सामने आने लगे । जमीन की उपजाऊ शक्ति कम होती चली गई । कीटनाशकों के अंधाधुंध इस्तेमाल ने अपने कुप्रभाव मनुष्यों , पशुओं व् जमीन के अंदर दिखाए हैं जो चिंतनीय स्तर तक जा पहुंचे हैं ।

हरित क्रांति से एक धनाढ्य वर्ग पैदा हुआ, जिसने अपने अपने इलाके में अपनी दबंगता व् स्टेटस का इस्तेमाल करते हुए यहाँ के राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में अपना प्रभुत्व जमाया है । इस सब में हमारी पिछड़ी सोच और अंध विश्वासों के चलते एक अधखबडे़ इंसान का विकास हुआ है जो कुछ बातों में प्रगतिशील है और बहुत सी बातों में रूढ़िवादी है । जात पात और गोत नात अभी भी वंचित तबकों के बेहतर जीवन के लिए बड़ी चुनौती बने हुए हैं। इस इंसान के व्यक्तित्व का प्रभाव हर क्षेत्र में देखा जा सकता है। चाहे शिक्षा का क्षेत्र हो, चाहे स्वास्थ्य का क्षेत्र हो, चाहे खेती बाड़ी का क्षेत्र हो , चाहे उद्योग का क्षेत्र हो , चाहे सामाजिक क्षेत्र हो ।

हमारे समाज में कृषि में हरित क्रांति के साथ-साथ जो औद्योगिक प्रगति हुई है, उसका लाभ तो शिक्षित मध्य वर्ग को मिला है। इसके चलते हरियाणा की आबादी के एक बड़े हिस्से की आर्थिक स्थिति मज़बूत हुई है लेकिन सामाजिक-सांस्कृतिक पिछड़ापन बड़े पैमाने पर व्याप्त है। हरियाणा में अर्ध-सामंती मूल्यों पर आधारित जातीय वर्चस्व, पितृसत्ता और पुरुष प्रधानता की मान्यता है; और सामाजिक सम्बन्धों का आधार यही मान्यता है। इसके चलते महिलाओं और दलित-पिछड़ी जातियों का उत्पीड़न आम घटनाक्रम है। इसी के साथ नवधनाढ्य वर्ग में सत्ता की भूख, जोड़-तोड़ के साथ निजी तरक्की का रुझान और आत्मकेंद्रित सोच हावी है। आज़ादी के आंदोलन में पैदा हुए आदर्शवाद की कमज़ोर उपस्थिति आदि के चलते अवसरवादी, भाई-भतीजावाद पर आधारित एवं भ्रष्टाचार से लिप्त राजनीति का बोलबाला है।

इस अधखबड़े व्यक्तित्व को भरे पूरे मानवीय इंसान में कैसे बदला जाये यह अहम् मुद्दा है जो कि महज राजनैतिक ही नहीं बल्कि सामाजिक भी है। और एक नवजागरण आंदोलन की मांग करता है । यह हरियाणा के पूरे समाज की जरूरत भी है और जिम्मेदारी भी बनती है कि सामंती और पुरुषवादी पिछड़ी सोच के खिलाफ समाज सुधार आंदोलन चलाया जाए।

जल संकट से जूझ रहे हरियाणा में भूजल की स्थिति गंभीर है। हरियाणा जल संसाधन प्राधिकरण द्वारा पूरे प्रदेश से जुटाए आंकड़ों के मुताबिक 2023 तक 1948 गांव रेड जोन में आ चुके थे। चिंता की बात यह कि 84 प्रतिशत गांवों में भूजल स्तर तेजी से पाताल की ओर जा रहा है। प्रदेश के कुल 7287 गांवों में से केवल 1304 गांव ग्रीन जोन में हैं, जबकि 6150 गांवों में भूजल तेजी से नीचे जा रहा है।

3041 गांव कमी पानी की

40% संकट में

1948 गम्भीर संकट में

शिक्षा के क्षेत्र में जहाँ एक और एजुकेशन हब बनाने के दावे किये जा रहे हैं और नए नए विश्वविद्यालयों का खोलना एक अचीवमेंट के रूप में पेश किया जा रहा है । 14473 सरकारी स्कूल और 10394 प्राइवेट स्कूल 2021 में खोले गए, मंत्री महोदय ने हरियाणा विधान सभा में एक सवाल के जवाब में बताए। 137 संस्कृति सीनियर सेकेंडरी स्कूल भी इन्ही का हिस्सा बताए थे।

वहीँ दूसरी और सरकारी स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता कई तरह से प्रभावित हुई है । शिक्षा की प्राइवेट दुकानों में भी शिक्षा की गुणवत्ता का तो प्रश्न ही नहीं बल्कि शिक्षा को व्यापार बना दिया गया है। चाहे वह स्कूली शिक्षा हो , चाहे वह उच्च शिक्षा हो , चाहे वह विष्वविद्यालयों की शिक्षा हो या ट्रेनिंग संस्थाओं की शिक्षा हो। हरेक क्षेत्र में व्यापारीकरण और पैसे के दम पर डिग्रियों का कारोबार बढ़ा है, बढ़ता ही जा रहा है । दलाल संस्कृति ने इस क्षेत्र में दलाल माफियाओं की बाढ़ सी लादी है । सेमेस्टर सिस्टम ने भी शिक्षा के स्तर को बढ़ाया तो बिलकुल भी नहीं, हाँ घटाया बेशक हो । आगे सर्वे करने के विषय हो सकती हैं ये सब बातें।

स्कूल बचेंगे तो शिक्षक बचेंगे। शिक्षक बचेंगे तो शिक्षा बचेगी। शिक्षा बचेगी तो देश बचेगा। अन्यथा कुछ नहीं बचेगा क्योंकि निजीकरण से शिक्षा का व्यवसायीकरण होगा। व्यवसायीकरण में शिक्षक और छात्र के बीच गुरु-शिष्य का रिश्ता कम लाभ-हानि का रिश्ता अधिक बनेगा। लाभ-हानि में पूंजीवादी लोग एक शिक्षक का नहीं, बल्कि एक ऐसे नौकर का चुनाव करेंगे, जो पूंजी को सलाम ठोकेगा। इस व्यवस्था में शिक्षक अपना ज्ञान बेचेगा, छात्र शिक्षा खरीदेगा बाक़ी गरीब, दलित, आदिवासी, असहाय, मजदूर इत्यादि से अच्छी शिक्षा कोसों दूर चली जायेगी । बेहतर है, शिक्षा का संरक्षण करें। हमें एकसमान, सरकारी, निःशुल्क, क्वालिटी एजुकेशन की दरकार है। इसी के लिए सरकार है। बेहतर राष्ट्र की कल्पना करते हैं, शिक्षकों का सम्मान करते हैं तो फिर पहले सुगम शिक्षा की बात जरूर कीजिए।

बहुत ढीली ढाली चल रही है । इसके लिए मॉनिटरिंग कमेटीज का प्रावधान नहीं रखा गया है । खून की कमी NFHS 4 के मुकाबले NFHS 5 में गर्भवती महिलाओं में बढ़ी है । इसी प्रकार मालन्यूट्रिसन भी बच्चों में बढ़ा है । गरीब के लिए मुफ्त इलाज भी महंगा होता जा रहा है ।

आज के हरयाणा की कुछ चुनौतियों में से एक बड़ा मसला सामाजिक न्याय का मसला है । सामाजिक न्याय के सवाल तीव्र रूप से सामने आ रहे हैं । महिलाएं न घर में , न कर्म स्थल पर , न गली कूचों में , न बाजारों में सुरक्षित हैं । लॉ एंड ऑर्डर को स्थापित करने का काम काफी कमजोर होता जा रहा है । भ्रष्ट अफसर , भ्रष्ट पुलिस और भ्रष्ट नेता की तिकड़ी का उभार तेजी हो रहा है ।

हरियाणा का दुलीना कांड हमें याद है । अक्तूबर 2002 में ठीक दशहरे के दिन पांच दलितों को जिंदा जला दिया गया था। आरोप था गोकशी का। पांच जनों की मौत पर संघ और आर्य समाज हत्यारों के साथ खड़ा था। 23 सितंबर 2023 को विहिप के केंद्रीय मंत्री डॉ. सुरेंद्र कुमार जैन ने गोकशी को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर चेतावनी दी कि दुलीना कांड की पुनरावृत्ति हो सकती है। 2012 में दलित लड़कियों के साथ रेप की अनेक वारदातों के समय दलितों में तूफान मचा तो मुख्य पार्टियां चौधरियों के नाराज होने के डर से उत्पीड़ितों के बजाय आरोपियों के पक्ष में तर्क तलाशते घूम रहे थे। मिर्चपुर, भगाना, डाबडा, दुलीना हर कहीं तो मुख्यधारा की पार्टियां, आर्य समाज, आरएसएस कोई भी आरोपियों के खिलाफ खड़े नहीं हुए। अब विभाजनकारी ताकतें और भी भयानक रूप से लोगों को जात पात और धर्म के नाम पर बांटने का घिनोना काम कर रही हैं ।

सकारात्मक एजेंडा न होने के कारण युवा वर्ग का एक हिस्सा नशे, फ्री सेक्स और अपराधीकरण की गिरफ्त में आता जा रहा है । दलित उत्पीड़न के, महिला उत्पीड़न के मामले बढे हैं पिछले कुछ वर्षों में । लम्पटपन बढ़ रहा है ।

असंगठित क्षेत्र का विस्तार होता जा रहा है जिसमें मजदूर की हालत चाहे वह महिला है, पुरुष है, प्रवासी मजदूर है और उसकी जिंदगी बहुत ही मुस्किल हालातों की तरफ धकेली जा रही है । महंगाई का असर इन तबको के इलावा माध्यम वर्ग को भी प्रेषण किये हुए है ।

एक तरफ शाइनिंग हरयाणा है जिसका गुणगान हर जगह और बहुत से इससे लाभान्वित तबकों द्वारा किया जाता है । मगर यह सच है कि यह तबका बहुत छोटा होते हुए भी प्रभावशाली है ।

दूसरी तरफ सफरिंग हरयाणा हैं जिसका बहुत बार कोई भी व्यक्ति गम्भीरता से जिकर तक नहीं करता । इस तबके को हासिये पर धकेला जा रहा है । इसकी जद में गरीब किसान , मजदूर , वंचित तबके, महिलाएं , नौजवान लड़के लड़की, प्रवासी मजदूर, माइग्रेटेड पापुलेशन, असंगठित क्षेत्र के कर्मचारी खासकर महिला हैं । यानि हरियाणा का बड़ा हिस्सा इसमें शामिल है ।

संक्षिप्त में कहें तो

ये बढ़ गई बेरोजगारी, करजे चढ़ते जा रहे भारी, हुई दुखी गरीब जनता सारी,हमारे बालक बिना दवाई मर रहे हैं, पढ़ाई महँगी से महँगी होती जा रही है।

नाबराबरी ने वंचित तबकों को साँस चढ़ा दिये हैं , कारपोरेट के अत्याचारों की हदें पार हो रही हैं , मीडिया ने वर्तमान सरकार के प्रचारी का रूप धार गया है। ,

जात पात मैं बाँटी है जनता, विरोध किया तो काटी है जनता।

किसान की श्यामत आ गई है, महिला की इज्जत तार तार की जा रही है, चोरी जारी बढ़ती ही जा रही है।

झूठे जुमले रोजाना देते हैं,मगर खबर हमारी कभी नहीं लेते हैं। ये सब देख देख जन की तबियत खारी होंती जा रही है, क्योंकि शासक हुआ बहुत भ्रष्टाचारी है।

जनता हिम्मत नहीं हारी है उसका संघर्ष जारी है । ‘लड़े हैं जीते हैं , लड़ेंगे -जीतैंगे’ भरतू और भरतारी।

नेशनल कैपिटल रीजन स्कीम के तहत हरयाणा का ताना बाना काफी बदल रहा है और और भी बदलेगा । फोरलेन , टोल प्लाजा , फलाई ओवर , सेज़ के तहत उपजाऊ जमीनों के अधि गरहण के चलते खेती योग्य जमीन कम से कमतर होती जा रही है । जी डी पी में एग्रीकल्चर का योगदान काफी कम हुआ है । नए हरियाणा का स्वरूप क्या होगा ? बिखरते गांव इस पर कोई चर्चा नहीं है । औद्योगिकीकरण के दिशा क्या होगी कोई चर्चा नहीं। नौकरी पैदा करने वाली या नौकरी खत्म करने वाली ? वातावरण का क्षरण रोकने के बारे क्या किया जायेगा ?

जेंडर फ्रैंडली, इको फ्रेंडली और सामाजिक न्याय प्रेमी विकास का नक्शा क्या होगा ? ये कुछ मुद्दे हैं जिन पर हरियाणा के प्रबुद्ध नागरिकों को सोच विचार करना चाहिए और फिर एक जनता का चुनाव एजेंडा बना कर सभी राजनैतिक पार्टीयों के सामने पेश करके उनकी इस एजेंडे पर अपनी पोजीशन रखने को कहा जाना चाहिए । इस सबके लिए जनता का जनपक्षीय राजनीति के लिए लामबंद होना बहुत जरूरी है ।

हरियाणा नंबर वन -मजदूर किसान बिना , इन सबके सम्मान बिना इनके चेहरे पर मुस्कान बिना – कैसे हो सकता है?

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