अनुपम शर्मा की कविता – गरीब आदमी 

कविता

 गरीब आदमी

अनुपम शर्मा

 

ग़म के आटे को, आंसुओं के पानी से भिगोकर

गरीब अपने नसीब की रोटी खाता है

वो जीता है या मरता है

आख़िर गरीब ही क्यों रोता है?

 

मंदिर – मस्जिद जाता है

तीर्थ नियम सब निभाता है

पीर पर चादर भी चढ़ाता है

फिर भी मुट्ठी भींच, आंसुओं को पी जाता है

आख़िर गरीब ही क्यों तरसता है?

 

पत्थर तोड़ बड़ी-बड़ी इमारतें

भवन और अट्टालिकाएं बनाता है

मंजिल पर सब पहुंचे,ऐसी सड़कें बनाता है

फिर भी विकास की अंधी दौड़ में, सबसे पीछे क्यों रह जाता है

आख़िर गरीब ही क्यों ठोकरें खाता है?

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