तर्कशील एवं न्याय के योद्धा बलवन्त सिंह

हरियाणा : जूझते जुझारू लोग

तर्कशील एवं न्याय के योद्धा बलवन्त सिंह

सत्यपाल सिवाच

बहुत संजीदा इन्सान, प्रबुद्ध शिक्षक, विकट स्थिति में भी ऊर्जा देने वाला अजीज, अध्यापक आन्दोलन, कर्मचारी आन्दोलन और तर्कशील अभियान के विख्यात् किरदार बलवन्त सिंह दिनांक 31 जनवरी 2024 को सांसारिक यात्रा पूरी कर भले ही वे सशरीर हमारे बीच नहीं रहे। लेकिन उनके काम, उनकी जनूनी ढंग से व हौसला देती हुई उपस्थिति बनी रहेगी। वे कुछ दिन से अस्वस्थ थे और कुरुक्षेत्र अस्पताल में भर्ती थे और वहीं उनका निधन हुआ।

बलवन्त सिंह का जन्म एक साधारण किसान परिवार में 03 फरवरी 1955 को हुआ। वे तीन दिन के बाद 69 वर्ष के हो जाते।

बलवन्त सिंह से मेरी मुलाकात सन् 1981 में हुई थी। उस दौर में खानपुर कोलियां गांव में उनके डेरे पर भी जाता रहा हूँ। वे कुछ समय पहले ही छह माह आधार पर पंजाबी शिक्षक नियुक्त हुए थे। आमतौर पर मेरे विद्यालय के वरिष्ठ शिक्षक ज्ञानी उजागर सिंह के पास आते रहते थे। संभवतः उनके सानिध्य में ही उन्होंने ज्ञानी परीक्षा पास करके शिक्षक बनने का रास्ता चुना था। बाद में वे प्राध्यापक पंजाबी पद से 28 फरवरी 2013 में सेवानिवृत्त हुए। उन दिनों हम यूनियन के कार्यों में रुचि लेने लगे थे। अस्थायी एवं बेरोजगार अध्यापक संघ को कुरुक्षेत्र में सक्रिय करने के लिए हमने साथ-साथ काम किया था।

यह हमारे सामूहिक विमर्श का ही परिणाम था कि हमने अस्थायी शिक्षकों को हरियाणा राजकीय अध्यापक हिस्से के रूप में एक मंच की तरह संगठित किया था। इस विमर्श में ऋषिकांत शर्मा, सत्यप्रकाश, रामनाथ धीमान, रामप्रताप, होशियार सिंह आर्य, धर्मपाल चहल आदि भी शामिल रहे थे।

वे अस्थायी एवं बेरोजगार अध्यापक संघ के महासचिव के रूप में हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य रहे। सन् 1985 तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से मिलने वाले प्रतिनिधिमंडल में भी वे शामिल थे। बाद में वे हरियाण राजकीय अध्यापक संघ की कुरुक्षेत्र जिला इकाई के सचिव चुने गए तथा इस हैसियत से भी राज्य कार्यकारिणी में हमने एक साथ काम किया।

हरियाणा में तर्कशील आंदोलन को आगे बढ़ाने में उनकी बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका थी। वास्तव में हरियाणा में इसे लोकप्रिय बनाने और सांगठनिक आधार पर खड़ा करने में उनका विशिष्ट योगदान रहा था। मेरे साथ परिचय से पहले से ही वे तर्कशील आन्दोलन से जुड़े हुए थे।

शुरुआती दिनों में उनके साथ अम्बाला में श्री मेघराज मित्र से मिलता रहा हूँ। बाद में उन्होंने वर्षों तक अपने फार्म हाऊस पर भूत-प्रेत अथवा अंधविश्वासों में जकड़े लोगों को बचाने के लिए काउंसलिंग से संकट से बाहर निकालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथी बलवन्त सिंह ने सन् 1991 में साक्षरता अभियान में भी सक्रिय भूमिका निभाई थी। धीरे-धीरे उनके समय का महत्वपूर्ण हिस्सा अध्यापन के अलावा चमत्कारों का पर्दाफाश, मनोवैज्ञानिक समस्याओं से ग्रस्त लोगों के मार्गदर्शन और तर्कशील साहित्य के प्रकाशन-वितरण में लगने लगा।

सांगठनिक दृष्टि से हमारी प्राथमिकताएं अलग-अलग हो गई। उनका ज्यादा समय वैज्ञानिक जागरूकता के कार्यों में लगने लगा था। उनके व्यक्तित्व से जुड़ा हुआ एक और घटनाक्रम है जो यहाँ सांझा करना चाहता हूँ। डेरा सच्चा सौदा में साध्वियों के दुराचार मामले को उजागर करवाने उनके अनाम पत्र को महत्वपूर्ण व्यक्तियों के पास भिजवाने तथा डेरे के पूर्व प्रबंधक रणजीत सिंह की हत्या मामले को उठाने में भी उन्होंने साहसिक भूमिका निभाई थी।

वैचारिक दृष्टि से एक ही मुख्यधारा से जुड़े होने के बावजूद हमारी भूमिका थोड़ा अलग-अलग हो गई थी। इसके बावजूद हमारा संपर्क बना रहा। सन् 1994 में जीन्द चले जाने के बाद संपर्क यदा कदा ही हो पाता था। उनकी सक्रियता बनी हुई थी। वैचारिक मुहिम को आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने जो कार्ययोजना तैयार की है, जो सांगठनिक आधार खड़ा किया है। उसे आगे बढ़ाते हुए हमें उत्साह प्रदान करता रहेगा मृत्योपरांत अपना शरीर भावी छात्रों की शिक्षा के लिए श्रीकृष्ण आयुष विश्वविद्यालय के लिए दान कर उन्हें सौंप दिया गया है।

बलवन्त सिंह के परिवार में उनकी जीवन साथी तेजेन्द्र कौर, दो बेटे – अमनदीप सिंह व फतेहसिंह तथा एक बेटी कर्मजीत कौर हैं। उनकी पत्नी अपने पिपली स्थित आवास पर रहती हैं। कभी-कभी बेटी के पास चली जाती हैं। खेती की जमीन बच्चों में बांट दी है। उन्हें आठ हजार रुपए मासिक पेंशन मिलती है। यद्यपि उनकी पेंशन 35 हजार रुपए है लेकिन लोन की किस्त अदायगी के बाद आठ हजार ही नकद मिलते हैं। बड़ा बेटा अमनदीप सपरिवार कनाडा में रहता है और छोटा फतेहसिंह अमेरिका में है। उसकी पत्नी शाहबाद में है। बेटी का परिवार शाहबाद में है। (सौजन्य: ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक : सत्यपाल सिवाच

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