लेखक – कलाकार मजदूरों के स्वतःस्फूर्त आंदोलनों के दमन के खिलाफ हैं
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भारतीय अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान ‘हम देखेंगे’ ने जारी किया संयुक्त बयान

हम लेखक कलाकार देश भर में चल रहे मजदूरों के स्वत :स्फूर्त आंदोलनों के साथ हीन और उन पर हो रहे दमन के विरुद्ध एकजुट हैं!
गुड़गांव-मानेसर, नोएडा, फरीदाबाद, भिवाड़ी और पानीपत सहित देश के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में लाखों मजदूर एक बुनियादी मांग को लेकर सड़कों पर हैं — उचित वेतन और कानूनी अधिकार।
यह आंदोलन किसी बाहरी उकसावे की उपज नहीं, बल्कि मजदूरों के शोषण, उपेक्षा और वादाखिलाफी का स्वाभाविक परिणाम है।
गुड़गाँव- मानेसर और नोएडा में मजदूर 10-12 हजार रु. प्रतिमाह में 8 से 13 घंटे तक काम करते रहे हैं । कोई छुट्टी नहीं, कैंटीन में घटिया खाना, और क़दम-क़दम पर अपमान।
इस नाम मात्र के वेतन के साथ पहले से ही चल रही भयंकर महंगाई और अभी अमेरिका-इजराइल के ईरान के खिलाफ़ आपराधिक युद्ध के बाद गैस की किल्लत और उसके बेतहाशा बढ़ते दामों के चलते मजदूरों का धैर्य जबाव दे गया है। एक के बाद दूसरी कंपनियों के ठेका मजदूर सड़कों पर आने शुरू हो गये हैं।
गौरतलब है कि यहां सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम वेतन असल में इतना कम है कि उसे भुखमरी वेतन की ही संज्ञा दी जा सकती है; और उसे भी फैक्टरी मालिक अथवा पूंजीपति देने को तैयार नहीं हैं।
एक तरफ इन्हीं शहरों के तेज आर्थिक विकास का दावा किया जा रहा है, देश को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताया जा रहा है, दूसरी तरफ मजदूरों और गिग-कर्मियों को भुखमरी और अतिशय असुरक्षा के जाल में फंसाया जा रहा है।
भारत में उदारवाद के सबसे अमानवीय रूप का भ्रष्ट क्रोनी – पूंजीवाद का संश्रय देखा जा रहा है, जो केवल फासीवादी राजनीति के सहारे व्यापक जन-असंतोष का प्रबंधन करना चाहता है। लेकिन धार्मिक उन्माद और विकृत राष्ट्रवाद के सहारे रोजी रोटी के प्रश्नों को हमेशा के लिए स्थगित नहीं किया जा सकता। ऐसे में मजदूरों का सड़कों पर आना अपरिहार्य था!
गुरुवार से ही NSEZ मेट्रो स्टेशन के पास सैकड़ों ठेका मजदूर धूप में खड़े होकर 20,000 रु. न्यूनतम वेतन की मांग कर रहे थे। किसी अख़बार या चैनल को इस की सुध लेने की फुर्सत नहीं थी।
जब तक आंदोलन उग्र नहीं हुआ, तब तक न उत्तर प्रदेश सरकार हिली, न श्रम विभाग।
जिला प्रशासन ने रविवार को कई घोषणाएं कीं, लेकिन मजदूरों की मूल मांग — 20,000 रु. वेतन — को दरकिनार कर दिया। यही कारण है कि आंदोलन जारी रहा।
यही कड़वा सच है।
जब तक दर्जनों कारखानों के मजदूर हड़ताल पर थे — किसी अख़बार को, किसी चैनल को सुध लेने की फुर्सत नहीं थी।
जब नोएडा में प्रदर्शन उग्र हुए, तभी आनन-फानन में “21 प्रतिशत” वृद्धि की घोषणा की गई है। अकुशल मजदूर को इस वृद्धि से महज 13,690 रु. प्रतिमाह मिल पाएंगे।
यह वह मजदूर है, जो कपड़े से लेकर कार तक, मोबाइल से लेकर बच्चों के खिलौने तक, सब कुछ बनाता है। यह देश की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा है। फिर भी सबसे अदृश्य बना रहता है।
इस पूरे आंदोलन में महिला मजदूरों की बढ़-चढ़कर भागीदारी को समझना मुश्किल नहीं। उन्हें इन तमाम मुश्किलों के साथ-साथ घर चलाने, बच्चों को पालने और कार्यस्थल पर अतिरिक्त ज़िल्लतों से भी जूझना पड़ता है। फिर भी, 9 अप्रैल को मानेसर में गिरफ्तार 56 मजदूरों में 20 महिलाएं थीं। पुरुष पुलिसकर्मियों ने खुलेआम उन पर भी लाठियां भांजीं।
9 अप्रैल 2026 को मनेसर में दमन का नंगा चेहरा दिखाई पड़ा। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे मजदूरों पर भाड़े के गुंडों और पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया गया। 55 मजदूरों को गिरफ्तार किया गया। उन पर हत्या के प्रयास, आगजनी और आपराधिक षड्यंत्र जैसी संगीन धाराएं लगाई गईं। इंकलाबी मजदूर केंद्र के श्यामवीर, अजीत, पिंटू यादव, हरीश, राजू और आकाश को साजिशकर्ता घोषित कर जेल भेज दिया गया।
हालांकि 7 और 9 अप्रैल को दोनों बार उनके फोन और व्हाट्सएप खंगालने के बाद पुलिस को कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला था।
नोएडा में 13-14 अप्रैल को पुलिस ने 7 एफआईआर दर्ज कीं और 300 से अधिक मजदूरों को गिरफ्तार किया। पुलिस आयुक्त ने दावा किया कि व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर मजदूरों को जोड़ा जा रहा है। इसलिए इसके पीछे एक “सिंडिकेट” है। यह वही पुराना हथकंडा है। जब मजदूर एकजुट हों तो उसे षड्यंत्र बताओ, आंदोलन को अपराध बताओ।
दमन यहीं नहीं रुका। नोएडा में बिगुल मजदूर के कार्यकर्ताओं रूपेश, आकृति, सृष्टि और मनीषा को गिरफ्तार किया गया। उनकी पैरवी करने पहुंचे वकीलों को भी यूपी पुलिस ने मारपीट कर उठा लिया। लखनऊ में कवयित्री कात्यायनी, पत्रकार सत्यम वर्मा और वरिष्ठ पत्रकार संजय श्रीवास्तव को हिरासत में लिया गया। बनारस में BHU के युवा कवि तनुज कुमार को उनके कमरे से उठाया गया। सोशल मीडिया अकाउंट्स के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए।
गुड़गांव का एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी खुलेआम घोषणा कर रहा है कि मजदूर संगठनों को मजदूरों को संगठित नहीं करने दिया जाएगा। हड़ताल करना और यूनियन बनाना संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है। इसे अपराध की तरह पेश करना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि असंवैधानिक भी है।
एक ओर 4 नये लेबर कोड लागू कर मजदूरों को गुलामी की नई बेड़ियों में जकड़ा जा रहा है, दूसरी ओर उनकी आवाज़ उठाने वालों को — मजदूर नेता हों, लेखक हों, पत्रकार हों या वकील — सबको निशाना बनाया जा रहा है। यह महज मजदूर आंदोलन पर हमला नहीं — यह लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है।
हम माँग करते हैं —
▸ सभी गिरफ्तार मजदूरों, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और लेखकों को तत्काल एवं बिना शर्त रिहा किया जाए
▸ सभी फर्जी और संगीन मुकदमे तत्काल वापस लिए जाएं
▸ 9 और 13-14 अप्रैल की हिंसा की निष्पक्ष न्यायिक जाँच हो; दोषी प्रबंधकों और अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज हो
▸ मजदूर विरोधी 4 नये लेबर कोड रद्द किए जाएं; स्थायी काम पर स्थायी नियुक्ति हो; ठेका प्रथा समाप्त हो
▸ न्यूनतम वेतन 30,000 रु. प्रतिमाह घोषित किया जाए; ओवरटाइम का कानूनन डबल भुगतान सुनिश्चित हो
▸ हड़ताल व यूनियन के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।
हम देश के सभी लेखकों, बुद्धिजीवियों, नागरिकों और जनपक्षधर संगठनों से अपील करते हैं कि वे इस दमन के विरुद्ध एकजुट हों। मजदूरों की यह लड़ाई केवल वेतन की लड़ाई नहीं है, लोकतंत्र, संविधान और इंसानी गरिमा की लड़ाई है। वे जो बनाते हैं, उससे देश चलता है । अब वक्त है कि देश उनके साथ खड़ा हो।
