हर धर्म को भाषा की ज़रूरत होती है, लेकिन किसी भाषा को धर्म की ज़रूरत नहीं होती  

हर धर्म को भाषा की ज़रूरत होती है, लेकिन किसी भाषा को धर्म की ज़रूरत नहीं होती

  • ऑल इंडिया कैफ़ी आज़मी अकादमी और जनवादी लेखक संघ लखनऊ ने आयोजित की ‘उर्दू में साझा सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ’ विषय पर गोष्ठी

कैफ़ी आज़मी अकादमी लखनऊ में 11 अप्रैल को ‘उर्दू में साझा सांस्कृतिक प्रवृत्तियाँ’ विषय पर गोष्ठी का आयोजन किया गया। आयोजन ऑल इंडिया कैफ़ी आज़मी अकादमी और जनवादी लेखक संघ लखनऊ द्वारा किया गया। इस मौके पर सगीर अफराहीम की किताब “प्रेमचंद: एक नकीब” के द्वितीय संस्करण और खालिद अशरफ़ की किताब “परीखाना : बेग़मात-ए-अवध के ख़ुतूत” का विमोचन किया गया।

कार्यक्रम का संचालन कर रहे सलमान ख़याल ने स्वागत भाषण के लिए राजीव प्रकाश गर्ग “साहिर” को आमंत्रित किया। राजीव जी ने प्रेमचंद को याद करते हुए अपने वक्तव्य की शुरुआत की और इंक़लाबी नारों को भी याद किया। मौजूदा वैश्विक और देशीय राजनीति पर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने मजरूह सुल्तानपुरी का शेर उद्धृत किया। मुनव्वर राना और अन्य शायरों के शेरों को उन्होंने हिंदी और उर्दू की साझेदारी के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने अपने स्वागत वक्तव्य का समापन इस पंक्ति से किया: “अंधेरे भी सहमे-सहमे हैं यारो, हवाओं से मिलने अब दिए जा रहे हैं।”

पहले वक्ता के रूप में सगीर अफराहीम को आमंत्रित किया गया। उन्होंने खुसरो से लेकर आज तक की दो धाराओं का उल्लेख करते हुए चिंता जताई कि ये धाराएं अलग क्यों हो गईं? निदा फ़ाज़ली के शेर से अपनी बात आगे बढ़ाते हुए उन्होंने सूफ़ियों की बयानी और साथ चलने पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चा जब स्कूल जाता है तो अपना टिफ़िन धर्म देखकर नहीं, बल्कि सहजता से साझा करता है, लेकिन आज हम किस दौर में आ गए हैं। समाज में मां और गुरु का दर्ज़ा बहुत ऊँचा है, लेकिन अब दोनों का अपमान हो रहा है।

साहित्य जज़्बात का नाम है। उन्होंने राजेंद्र यादव और मंज़ूर एहतेशाम का ज़िक्र किया और मीर के शेर को उद्धृत करते हुए साहित्य की गहराई में जाने की बात कही। प्रेमचंद की ईदगाह कहानी का उल्लेख करते हुए कहा कि इसे पूरी तरह समझने में लोगों को सदियाँ लगेंगी। साझा संस्कृति पर लग रहे हमलों पर उन्होंने चिंता जताई।

इसके बाद झारखंड से आए अली इमाम साहब को आमंत्रित किया गया। उन्होंने प्रलेस के पहले सम्मेलन को याद करते हुए कहा कि आज हम फिर लखनऊ की धरती पर बात कर रहे हैं। उन्होंने इक़बाल के शेर से अपनी बात शुरू की और देश के बंटवारे को याद किया। उन्होंने कहा कि उर्दू को इस तरह पेश किया जा रहा है जैसे वह हिंदुस्तान की ज़बान नहीं है, जबकि असल में उर्दू हमारी मुश्तरका तहज़ीब का हिस्सा है। हिंदी और उर्दू दोनों का जन्म एक ही देश-काल में हुआ है। हमारी साझी विरासत, साझे ख़्वाब, साझे खान-पान और तहज़ीब में है। ग़ालिब के शेर को उद्धृत करते हुए उन्होंने उसके दर्शन को उपनिषद से जोड़ा और आग का दरिया तथा प्रेम की रचनाओं के हवाले से विस्तार से अपनी बात कही।

खालिद अशरफ़ ने कहा कि जनवादी लेखक संघ का मानना है कि हिंदी और उर्दू दोनों ही भारतीय भाषाएँ हैं। उन्होंने प्रो. आलोक राय का ज़िक्र करते हुए कहा कि इस विषय पर उनकी किताब बेहतरीन है। भाषा विज्ञान के दृष्टिकोण से देखा जाए तो दोनों एक ही भाषाएं हैं। उर्दू में लगभग 25 फीसदी फ़ारसी, 1.5 प्रतिशत तुर्की, 4-5 फीसदी अरबी और 70 प्रतिशत शब्द पंजाबी, ब्रज, अवधी व अन्य क्षेत्रीय भाषाओं के शब्द हैं। उन्होंने कहा कि हमें अपने देश के सेक्युलर ढाँचे को बचाए रखने के लिए दोनों भाषाओं को फलने-फूलने देना चाहिए।

सदरे मोहतरम अली अहमद फ़ातमी ने अपने शुरुआती दिनों में आगरा में लगने वाले नज़ीर मेले को याद किया। उन्होंने कहा कि नज़ीर को बाज़ारी शायर कह कर नकारा गया था, लेकिन उस मेले में उनकी नज़्में लोगों की ज़ुबान पर थीं। उन्होंने दोहराया: “हर धर्म को भाषा की ज़रूरत होती है, लेकिन किसी भाषा को धर्म की ज़रूरत नहीं होती।” बंटवारे के बाद हालात ने उर्दू को मुस्लिमों से जोड़ दिया, जबकि नज़ीर की बहुत-सी नज़्में हिंदू देवी-देवताओं और त्योहारों पर हैं।

ग़ालिब और इक़बाल के हवाले से उन्होंने बताया कि वे यहाँ की संस्कृति की गहराई को व्यक्त करते हैं। मौलाना हसरत मोहानी नित्य रूप से मथुरा जाते थे और उन्होंने कृष्ण पर नज़्में लिखी थीं। उन्होंने ईदगाह कहानी को कई परतों में सामने रखा और फिराक़ गोरखपुरी के शेरों के हवाले से साझा संस्कृति को उद्धृत किया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन आभा खरे ने दिया।

रिपोर्ट – माधव महेश

सदस्य, राज्य परिषद, जनवादी लेखक संघ उत्तर प्रदेश।

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