… कसौली में खुशवंत सिंह का चर्चित बंगला

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और यायावर संजय श्रीवास्तव लगातार लिखते रहते हैं। देश-विदेश घूमने में विशेष रुचि है। जहां जाते हैं वहां की विशेषताओं  पर अपनी बारीक नजर रखते हैं। वहां के खानपान, वेशभूषा आचार व्यवहार को देखते समझते हैं और उनका लुफ्त उठाते हैं तो अपनी लेखनी और तस्वीरों के जरिये उन सभी जानकारियों से दूसरों को भी अवगत कराते हैं। भाषा के धनी हैं, लेखन में लयात्मकता, रोचकता और स्वच्छंदता है। इसलिए पाठक भी उस पर्यटन स्थल का उतना ही आनंद उठाता है जितना वे स्वयं। प्रतिबिम्ब मीडिया ने उनके कई यात्रा वृत्तांतों को प्रकाशित भी किया है। इस बार उन्होंने हिमाचल प्रदेश के पर्यटन स्थल कसौली यात्रा का वर्णन फेसबुक पर किया है। हम आभार सहित यात्रा वृत्तांत की पहली कड़ी यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। संपादक  

 

कसौली डायरी-1

 … कसौली में खुशवंत सिंह का चर्चित बंगला

संजय श्रीवास्तव

मंगलवार (7 अप्रैल) को जब कसौली पहुंचा तो हल्की फुल्की बारिश हो रही थी. इलाका पहाड़ों के बीच खुला हुआ था तो रात होते ही जबरदस्त ठंड हो गई. रातभर बारिश होती रही. सुबह तापमान 8 डिग्री सेंटीग्रेड पर पहुंच चुका था. ठंड से बुरा हाल था. वो तो गनीमत थी कि एक काम चलाऊ जैकेट रख ली लेकिन वो काफी नहीं थी. कसौली में हवाएं बहुत चलती हैं. लिहाजा मौसम इतना चिल्ड हो चुका था कि वाकई कांपने वाली स्थिति थी. यही स्थिति कल रात से आज सुबह तक सोलन में महसूस हुई. अब शाम को नोएडा पहुंचने के बाद ठंड गायब है. घर में पंखा चल रहा है. खैर ये तो थोड़ी मौसम की बात है. आपको खूबसूरत कसौली में राइटर खुशवंत सिंह के चर्चित बंगले के बारे में बताता हूं.

अंग्रेजों ने 1842 में इस जगह को सैन्य छावनी के तौर पर बसाया था. आज भी ये पुराने खूबसूरत कोलोनियल बंगलों और बेपनाह सुंदरता के लिए जाना जाता है. हवा खुशगवार और मिनरल पानी के तमाम नेचुरल सोर्स. कसौली को बसाने का श्रेय लॉर्ड हार्डिंग को जाता है. खुशवंत सिंह की कोठी यहां की चर्चित जगहों में है.

मैने ठंड हवाओं वाली दोपहर में जब लोअर मॉल में नीचे उतरना शुरू किया तो ऐसा लगा कि समय ठहर सा गया. यहां पुराने सेठों के शानदार घर हैं तो मध्यम वर्गीय छोटे घर भी. लोअर माल से ऊपर की चढ़ते एक 70 साल के बुजुर्ग मिले. फिटनेस गजब की. बात होने लगी. मैने पूछा कि लोग कहते हैं कि यहां पर खुशवंत सिंह का घर है, आप जानते हैं कहां है ये.

इसके बाद तो उन्होंने मुझको इस बंगले की ऐसी परफेक्ट लोकेशन बताई कि कोई भी आराम से पहुंच सकता था. आप अपर मॉल पर चले जाइए. जहां दूरदर्शन का टॉवर है, उसी के दूसरी ओर सड़क के एक रास्ता नीचे जा रहा है. उस पर दो छोटे नाम लिखे पिलर्स हैं. इस पर लिखा मिल जाएगा – राज विला. वो आगे भी बताते गए. खुशवंत ने अपनी ज्यादातर किताबें यहीं कसौली आकर लिखीं. अब वो तो रहे नहीं लेकिन उनका बेटा अक्सर यहां मॉल पर घूमता दीख जाता है, लंबे बाल.

आगे बढ़ने से पहले आपको कसौली के ‘अपर मॉल’ और ‘लोअर मॉल’ के बारे में बताता चलूं. दरअसल कसौली में मॉल रोड में एक हिस्सा ऊपर गिल्बर्ट हिल्स की ओर जाता है, यहां अंग्रेजों के रईसी उनके पुराने बंगलों से झलकती जाएगी, अब ये बंगले या तो होटल बन गए या लग्जरी होम स्टे या यहां देसी रईस रहने लगे हैं. अपर वाले हिस्से में आर्मी का पूरा सेटअप भी फैला हुआ है. लोअर मॉल आमतौर पर स्थानीय लोगों और व्यापारियों के लिए था. अपर मॉल पर आमतौर पर सीनियर अंग्रेज अधिकारी और उनके परिवार घूमते थे.

मशहूर लेखक खुशवंत सिंह कसौली को अपना दूसरा घर मानते थे. उनके किस्सों में अंग्रेजों द्वारा छोड़ी गई वो “क्वाइटनेस” और “विंटेज वाइब” आज भी महसूस की जा सकती है. जब हम अपर मॉल रोड पर जा रहे थे तो वहां चढ़ाई थी. रास्ते में अंग्रेजों के पुराने बंगले और उनकी नेमप्लेट. हालांकि अब इनके मालिक भारतीय हैं. फिर फौजियों का कसौली क्लब, जहां के मेंबर केवल आर्मी अफसर ही हैं. वहां आम लोग नहीं जा सकते. ये काफी सुंदर है

मॉल के किनारे लंबे पाइन ध्यान मग्न से लगते हैं. आगे बढ़ने पर दूरदर्शन का टॉवर नजर आता है और दूसरी ओर नीचे जाता हुआ एक रास्ता. सड़क से लगे उस रास्ते के दौनों छोरों पर ईंटों के दो पांच फुट के पिलर्स खड़े हैं. एक ओर संगमरमर की पट्टिका पर लिखा है सर तेजा सिंह मलिक और दूसरी ओर राज विला. इसी में ऊपर कुछ मिटता और दिखता हुआ खुशवंत सिंह का नाम.

ये प्राइवेट प्रापर्टी है. यहां थोड़ा आगे बढ़ते ही पेड़ों पर चेतावनी नजर आई, ये जगह सार्वजनिक नहीं है, इसलिए यहां यूं ही नहीं भटकें. खैर हमने तब भी कुछ कदम औऱ नीचे की ओर रास्ते पर बढ़ाए. फिर वही चेतावनी. सामने झाड़ियों और पेड़ों की ओट से लंबा चौड़ा बंगला नजर आया. सामने दो कारें और कुछ आवाजें. इस लंबे चौड़े बंगले में टिन की छत. हालांकि टिन की छतों पर लोग पेंट करा लेते हैं जिससे बारिश और तेज धूप में ये सुरक्षित रहे लेकिन यहां वैसा नहीं था.

इस बंगले की भी कहानी है. ये बंगला मूल रूप से एक ब्रितानी दंपत्ति का था. जिसे खुशवंत सिंह के ससुर सर तेजा सिंह मलिक ने खरीद लिया, वो सिविल इंजीनियर थे. उन्होंने इस बंगले को अपनी पत्नी का नाम दिया. इस बंगले के रास्ते में कभी उन्होंने गेट लगवाया ही नहीं. उसके बाद ये घर खुशवंत सिंह की पत्नी को मिला. फिर खुशवंत सिंह को. वह यहां 1930 के दशक में यहां तब पहली बार आए जबकि उनके पिता यहां अपने कंस्ट्रक्शन प्रोजेक्ट पर काम कर रहे थे. बाद में तो राज विला उनके लेखन के लिए मुफीद जगह बन गई. उन्होंने यहां ट्रेन टू पाकिस्तान लिखी. इसके अलावा और भी कई किताबें. लोग बताते हैं कि खुशवंत जब यहां आते थे तो अक्सर अपर मॉल पर हिमाचली शॉल ओढ़कर वॉक करते नजर आ जाते थे. उनका परिवार गर्मियों में यहां अक्सर आता है.

अब ये घर खुशवंत सिंह के बेटे राहुल सिंह के पास है, जो अक्सर यहां आते हैं और उनके साथ कई हस्तियां भी. अगर आपके मन में ये सवाल आ रहा हो – क्या राज विला घूमने या देखने जा सकता है तो इसका जवाब होगा – नहीं, क्योंकि ये प्राइवेट प्रापर्टी है. यहां केवल उनके पारिवारिक लोग और दोस्त ही आते हैं. हां अपर मॉल से भी इसका कुछ हिस्सा नजर आ सकता है.

यहां और भी ऐसे मशूहर बंगले हैं, लेकिन अगला किस्सा जनरल ओ डायर के पिता एडवर्ड ड़ायर का होगा, जिन्होंने 1820 में यहां इंग्लैंड से आकर भारत की पहली शराब ब्रुअरी लगाई. जिसको फिर मोहन मीकिन ने खरीद लिया. उनका भी यहां खूबसूरत बंगला था. आज भी यहां शराब बनती है. ओल्ड मांक भी. यहां सनोवर में वो फेमस लॉरेंस स्कूल भी है, जिसे एक अंग्रेज ने 1847 में शुरू किया था, यहां संजय दत्त, सनी देओल और उमर अब्दुल्ला जैसी हस्तियां पढ़ चुकी हैं. इसकी सालाना फीस 12 लाख रुपए के आसपास है. एडमिशन के लिए खासी होड़ रहती है. यहां मॉल के बीचों बीच ध्यान चंद की बड़ी सी प्रतिमा सेना ने लगवाई है. यहीं पर 1965 युद्ध के हीरो लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह का बंगला भी है. यहीं पर सेंट्रल रिसर्च इंस्टीट्यूट भी है, कहां जाता है कि भारत के ज्यादातर टीके यहीं तैयार होते हैं. नेहरू परिवार से जुड़ा एक आवास भी यहां लोवर मॉल में है । क्रमशः

लेखक – संजय श्रीवास्तव

 

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