कविता
मैं किताब हूँ
अनुपम शर्मा
मैं किताब हूँ।
मैं बिन पढ़ी, बिन समझी किताब हूँ।
कोई तो होगा
जो मुझे पढ़ सके, समझ सके।
मैं किताब हूँ।
मेरे शब्द
मनुस्मृति से मेल नहीं खाते,
इसलिए
किसी के मानसिक पटल पर
ठहर नहीं पाते।
किताब के शौकीन खरीददारों ने
आवरण देखा,
रंगीन पृष्ठ उलट-पुलट कर
मूल्य आँका
पर खरीद न सके।
मैं किताब हूँ।
मेरे शब्द स्वच्छंद हैं,
रूढ़ियों को खंड-खंड करते हैं।
वे किसी के मनमुताबिक नहीं ढलते।
मैं दोहरा चरित्र नहीं अपनाती
शायद इसलिए
किसी को समझ नहीं आती।
मैं किताब हूँ।
मेरे शब्दों के अर्थ समझने वाला
कभी न कभी, कोई पाठक आएगा
जो सतह से परे
अर्थों की गहराई तक पहुँचेगा।
मैं प्रतीक्षा नहीं,
अपनी उपस्थिति की घोषणा हूँ।
मैं किताब हूँ।
