राजकुमार कुम्भज की तीन कविताऍं
1.
युद्ध का अभिप्राय
युद्ध का अभिप्राय
अज्ञान और अविश्वास तो है ही
सोची-समझी मूर्खता भी कुछ कम नहीं
जिसमें शामिल हो जाती है गाहे-बग़ाहे
मूर्खों की मूर्खतापूर्ण वह आज्ञाकारिता भी
जब कुछ अंधे,कुछ दूसरे अंधों को
बरबस ही दिखाने लगते हैं अंधी ऑंखें
जहाॅं छुपी होती है क्रूरताऍं और बर्बरताऍं
वे दोनों ही जो उजाड़ती हैं उजागरता से
वह सब,वह सच जो बसाती है कविता
बरसों बरस की यातनाओं से गुज़रते हुए
और होते हुए मनुष्य,सभी मनुष्यों के लिए
मुक्ति के अभिप्राय में.
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2
हारते हैं वे भी
ज़िद है जीतने की सभी को
मगर युद्ध में हारते हैं सभी के सभी
बुलंद नहीं हो पाती हैं बंदूकें और तोपें
बुलंद नहीं हो पाती हैं बारूदी लिखावटें भी
और बुलंद नहीं हो पाती हैं पत्थर-हरक़तें
पानी मिटा देता है ज़िदें सभी और सबकी
शांति से ही सुलगाई जाती है आग कहीं भी
शांति से ही लिखी जाती हैं ऐतिहासिकताऍं
शांति से ही होती है हासिल ख़ुशबुऍं सब
भीतर ही भीतर शांति से चलते रहते हैं युद्ध
दुनिया भर में,दुनिया भर की शांति के लिए
हारते हैं वे भी,वे भी हर किसी युद्ध में
जो कहलाते हैं विजेता.
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3
कविता अब भी संभावना है.
सिर ऊपर चल रहा है जो
पाताल की गहराइयों तक जा गिरेगा
मरेगा एक दिन कुत्तों की मौत मरेगा
न तो पहला है और न अंतिम युद्ध है ये
युद्ध-दर-युद्ध होते रहे हैं,होते रहेंगे
मिटते रहे हैं,मिटाते रहेंगे घर पक्षियों के
जलते रहे हैं,जलते रहेंगे तक्षशिला
फिर भी,फिर-फिर उड़ेंगी,उड़ती रहेंगी पतॅंगें
और लिखने वाले लिखते रहेंगे कविताऍं
कविता अब भी संभावना है.
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