छोरी की मूर्छा का चक्कर

 

ज्ञान विज्ञान

छोरी की मूर्छा का चक्कर

रणबीर सिंह दहिया

सते-फत्ते-नफे-कविता-सविता-सरिता, ताई भरपाई फेर कट्ठे होए शनिचर नै तो ईबकै कविता बोली – हम तीन जणे जयप्रकाश के धोरै गये थे। मेरे मामा की छोरी मैं ओपरे का रोग था। हमनै बताया अक म्हारी छोरी को लगातार चक्कर आते हैं। छह म्हिने तै बहोत परेशान है लड़की। पहले पूरी मोटी होती थी फेर ईब बहोत कमजोर होगी। 10वीं मैं पढ़ै सै। स्कूल जायें बी 15 दिन होगे। स्कूल मैं बी कई बर चक्कर आ जाया करते। कई मास्टर तो डरण लागगे अक कदे स्कूल मैं छोरी मर ना जावै। हमनै कई जगह अर कई स्याणां तै इलाज करवाया फेर कोए आराम नहीं हुया। पीस्से बी बहोत खर्च होगे फेर छोरी तो कमजोर होत्ती जावै सै।

जयप्रकाश म्हारी गेल्यां आया। म्हारे मामा के गाम मैं उस छोरी के नानके सैं। नाना-नानी सैं जिनकी उम्र 70 के नेड़े-धोरै सै। जयप्रकाश नै छोरी के नाना तै बात करी तो उसने बताया – मेरै दो लड़कियां सैं लड़का कोए नहीं सै। मैं मेरी लड़की की लड़की को यहां अपने पास रखता हूं। पहले तो घर ठीक चल रहया था।

एक दिन जब लड़की सुबह उठी तो उसके बाल कटे मिले और चुन्नी का एक कोना कट्या मिल्या। ईसी घटना कई बर होली अर जिबे तै इस छोरी ने चक्कर आवैं सैं। मेरे हकीकियों ने कुछ करवा दिया लगता है। मेरै छोरा सै नहीं तो उनकी धन-धरती पै निगाह सै। मनै एक दिन कैह भी दिया अक या जमीन-जायदाद मेरी छोरियां की सै। थामनै फूट्टी कोड्डी बी कोन्या मिलै। तबसे वे मेरे बसे-बसाये घर मैं आग लावणा चाहवैं सैं।

कई श्याणे आये उननै भी इन्है कान्नी इशारा करया सै। फेर इलाज नहीं हुआ। थाम उनका इलाज करद्यो म्हारी छोरी तो आपैए ठीक होज्यागी। मैं कुछ माणसां नै अर अपणे भाईचारे नै कट्ठा कर ल्यूं सूं। उन सबके बीच मैं थाम उनका नाम ले दियो, फेर हम देख ल्यांगे। जयप्रकाश ने कहया – मैं किसे का नाम नहीं ल्यूंगा। मनै आपका सारा घर देख लिया सै, उननै कुछ नहीं करवा राख्या। मैं एक बार लड़की से अकेले में बात करना चाहता हूं, उसी के बाद सही बात बता सकता हूं। नाना बोल्या – छोरी को तो मैं बुला ल्यूंगा, फेर म्हारा घर एकबै फेर देखल्यो। यू सारा काम मेरे भतीजों व बहुओं नै करवा राख्या सै। सारे स्याणे बी याहे बात कहवैं सैं।

जयप्रकाश बोल्या – इननै बी बाद मैं देख ल्यांगे, पहलम छोरी नै बुलवाओ। थोड़ी सी वार मैं लड़की आगी जो काफी कमजोर लग रही थी।

जयप्रकाश नै उसको एकांत मैं बिठाया, उसका नाम बूझया, उसकी शिक्षा के बारे मैं बूझया। नाना-नानी का व्यवहार जाण्या। उसनै कहया सब ठीक-ठ्याक सै। सब मेरे तै प्यार करैं सैं। मास्टर जी बी ठीक सैं। फेर आड़ै मेरे मामा के लड़के ठीक कोनी। जयप्रकाश ने काफी देर बात करी अर कहया – तुम किसे बात तै डरती हो। वा बोली – नहीं। फेर बूझया – क्या कोए लड़का या लड़की आपका दोस्त सै? वा बोली – नहीं। मैं स्कूल तै आये पाछै किसे तै बात नहीं कर सकती। मेरे नाना व नानी किसी से बात नहीं करने देते। मेरा कोई दोस्त नहीं है।

जयप्रकाश ने बाद मैं बूझया – क्या आपकी माहवारी शुरू हो चुकी है तो उसनै कहया अक मनै तो बेरा नहीं पर एक बीमारी सै जो छह म्हिने से है और पंद्रह दिन रहती है फिर ठीक हो जाती है। मेरे पेट में दर्द रहता है। जयप्रकाश नै बूझया – पेट दर्द के अलावा और क्या होता है? वा बोली – शर्म आवै से बतान्ती हाणी। वो बोल्या – बेटे, बीमारी बतावण मैं कैसी शर्म, बेहिचक बताओ। बीमारी नहीं बतावेगी तो इलाज क्यूकर होवैगा? छोरी रोवण लागगी अर रोवते-रोवते बोली – 15 दिन तक खून बहता रहता है और पेट मैं बहोत ज्यादा दरद होता है।

जयप्रकाश बोल्या – नाना-नानी ताहिं बताया कदे इस बारे मैं? वा बोली – नानी ताहिं बताया था। वा बोली अक अपने आप पेट दरद ठीक होज्यागा। कई बर कहया, फेर मनै कहना बंद कर दिया। जयप्रकाश नै लड़की को बाहर भेज दिया और नानी भीतर बुलाई। आत्ते ही बोली – गुरु जी किमै आया समझ मैं। जयप्रकाश बोला- गुरु जी तो कोन्या, फेर समझ मैं बहोत कीमै आग्या सै। एक बर तो थाम छोरी नै किसे बढ़िया डाक्टर तै दिखाओ। ठीक होज्यागी। बाकी मैं ठीक कर द्यूंगा। फेर वा बोली – म्हारी छोरी कैं डाक्टरां आली बीमारी कोन्या। घणीए वार समझाई, बीमारी के बारे बताया। जिब जाकै डाक्टर कै दिखावण नै राज्जी हुई।

नाना को बुलाया अर उस ताहिं बी सारी बात समझाई। छोरी का डाक्टर नै इलाज करया, वा ठीक होगी। नाना-नानी जयप्रकाश को बताने आये अक छोरी ठीक होगी। चक्कर बंद होगे, आगला जाबता और कर द्यो। जयप्रकाश बोल्या – वो तो मनै कर दिया। ये किताब सै ये पढ़या करै वा। सब ठीक होज्यागा। सरिता बोली – सारी बातां का तनै क्यूकर बेरा लाग्या? कविता बोली – मैं जयप्रकाश धोरै टेलीफोन पै बूझती रहया करती इस सारे केस के बारे मैं। सरिता बोली – बहोत पहोंच्या औड़ स्याणा लाग्या। कविता बोली – कदे मिलवाऊंगी उसतै। सरिता बोली – म्हारै बी सै एक केस वो दिखावांगे उसपै।

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