रसोई गैस के बढ़ते दाम, युद्ध का बहाना और आम आदमी की पीड़ा*

*रसोई गैस के बढ़ते दाम, युद्ध का बहाना और आम आदमी की पीड़ा*

✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।

7 मार्च 2026 को देशभर में घरेलू रसोई गैस (14.2 किलोग्राम) के सिलेंडर की कीमतों में 60 रुपए की बढ़ौतरी कर दी गई। इसके बाद एक घरेलू गैस सिलेंडर की कीमत 949 रुपए तक पहुंच गई। इसी के साथ 19 किलो वाले कमर्शियल सिलेंडर के दामों में 115 रुपए से अधिक की बढ़ौतरी भी दर्ज की गई। इस बढ़ौतरी के पीछे अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों – विशेष रूप से मध्य-पूर्व क्षेत्र में बढ़ते तनाव, को एक प्रमुख कारण बताया जा रहा है।

लेकिन इसी समय सोशल मीडिया और व्हाट्सएप के माध्यम से इंडियन ऑयल की ओर से एक संदेश प्रसारित होता है, जिसमें कहा जाता है कि देश में ईंधन की किसी प्रकार की कमी नहीं है और ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता बनी हुई है। नागरिकों को आश्वस्त किया जाता है कि चिंता की कोई आवश्यकता नहीं है।

यहीं से आम नागरिक के मन में एक स्वाभाविक प्रश्न जन्म लेता है कि यदि देश में ईंधन की पर्याप्त उपलब्धता है, तो फिर अचानक इतनी बड़ी कीमत वृद्धि का औचित्य क्या है? और यदि अंतरराष्ट्रीय तनाव के कारण आपूर्ति पर दबाव है, तो क्या कीमतें बढ़ा देने से वह कमी दूर हो जाएगी?

यह प्रश्न केवल अर्थशास्त्र का नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और शासन की प्राथमिकताओं का भी प्रश्न बन जाता है।

दरअसल ऊर्जा संसाधनों का वैश्विक बाजार हमेशा से भू-राजनीतिक घटनाओं से प्रभावित रहा है। जब मध्य-पूर्व में युद्ध या तनाव बढ़ता है, तो कच्चे तेल और गैस की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उतार-चढ़ाव आना स्वाभाविक है। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात पर निर्भर होकर पूरा करते हैं, वहां इस प्रभाव का पड़ना भी स्वाभाविक माना जाता है।

परंतु सवाल यह है कि क्या हर बार अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों का पूरा बोझ सीधे आम जनता के कंधों पर डाल देना ही एकमात्र समाधान है?

रसोई गैस कोई विलासिता की वस्तु नहीं है। यह रोजमर्रा के जीवन की सबसे बुनियादी जरूरतों में से एक है। एक गरीब या निम्न-मध्यम वर्गीय परिवार के लिए रसोई गैस का सिलेंडर सिर्फ ईंधन नहीं, बल्कि पूरे परिवार की भोजन व्यवस्था का आधार होता है। जब इसकी कीमत बढ़ती है, तो उसका असर सीधे रसोई से लेकर पूरे घरेलू बजट तक फैल जाता है।

  1. आज भी देश में लाखों परिवार ऐसे हैं जिनकी मासिक आय सीमित है। पहले ही महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन और रोजमर्रा की जरूरतों के बढ़ते खर्च ने आम आदमी की आर्थिक स्थिति को दबाव में डाल रखा है। ऐसे में जब रसोई गैस जैसे आवश्यक संसाधन की कीमतें अचानक बढ़ती हैं, तो यह बढ़ौतरी केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं रहती, बल्कि यह रसोई में चूल्हे की चिंता बन जाती है।

यही कारण है कि आम जनता के बीच यह भावना मजबूत होती जा रही है कि महंगाई का बोझ धीरे-धीरे आम लोगों पर स्थानांतरित किया जा रहा है, जबकि बड़े आर्थिक हितों को सुरक्षित रखा जा रहा है।

जब सरकारें और ऊर्जा कंपनियां कीमत वृद्धि का कारण अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को बताती हैं, तब लोगों के मन में यह सवाल भी उठता है कि क्या वैश्विक बाजार के लाभ का हिस्सा भी कभी उतनी ही तेजी से जनता तक पहुंचता है जितनी तेजी से नुकसान का बोझ पहुंचाया जाता है?

यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा होता है कि यदि वास्तव में ईंधन की कमी हो, तो क्या उसकी कीमत बढ़ा देने से वह कमी दूर हो जाएगी? क्या गैस महंगी हो जाने से लोग खाना बनाना बंद कर देंगे? या रसोई में जलने वाली आग कम हो जाएगी?

स्पष्ट है कि ऐसा नहीं होने वाला। भोजन मनुष्य की मूलभूत आवश्यकता है। इसलिए कीमतें बढ़ने पर लोग खपत बंद नहीं करते, बल्कि अपनी अन्य जरूरतों में कटौती करने के लिए मजबूर हो जाते हैं।

इस पूरी स्थिति का मानवीय पक्ष यही है कि आर्थिक नीतियों के निर्णय केवल आंकड़ों और ग्राफों से नहीं समझे जा सकते। उनके पीछे करोड़ों लोगों का जीवन जुड़ा होता है – उनकी थाली, उनकी रसोई और उनके बच्चों का भविष्य।

समाज में बढ़ती असमानता और महंगाई के बीच यह प्रश्न और भी तीखा हो जाता है कि विकास और आर्थिक नीतियों का वास्तविक लाभ किस तक पहुंच रहा है।

इसलिए आज आवश्यकता केवल कीमतों की चर्चा करने की नहीं है, बल्कि उस व्यापक आर्थिक ढांचे को समझने की भी है जिसके भीतर ऐसे निर्णय लिए जाते हैं। लोकतांत्रिक समाज में जनता का यह अधिकार भी है कि वह सवाल पूछे, नीति-निर्माताओं से जवाब मांगे और यह समझने की कोशिश करे कि आर्थिक निर्णयों का बोझ किस पर पड़ रहा है और लाभ किसे मिल रहा है।

क्योंकि अंततः किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की सफलता केवल जीडीपी की वृद्धि दर से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि उस विकास का असर आम आदमी की जिंदगी पर कितना सकारात्मक पड़ता है।

और जब तक रसोई में जलने वाली आग सुरक्षित और सुलभ नहीं होगी, तब तक विकास की बड़ी-बड़ी बातें भी आम आदमी के लिए अधूरी ही लगेंगी।

✍️ कृष्ण कायत, मंडी डबवाली।

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