रूसी समाजवादी क्रांति थी औरतों की सबसे बड़ी उद्धारकर्ता
मुनेश त्यागी
8 मार्च 1910 को अंतर्राष्ट्रीय महिला कामगार संघ ने निर्णय लिया गया था कि 8 मार्च को पूरी दुनिया में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का दर्जा दिया जाए। अगले साल 8 मार्च 1911 को पहला अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया। इसी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के बुनियादी सिद्धांतों को वास्तविक अर्थों में किसानों मजदूरों यानी मेहनतकशों की समाजवादी रूसी क्रांति के बाद, रुस की किसानों मजदूरों की सत्ता और सरकार द्वारा, सबसे पहले रूस यानी यूएसएसआर में धरती पर उतारा गया। 1910 में महान विचारिका रोजा लक्जमबर्ग ने कहा था कि समाजवाद के बिना महिला मुक्ति संभव नहीं है और महिला मुक्ति के बिना, समाजवाद की स्थापना नहीं की जा सकती।
महान विचारक रोम्या रोलां ने सोवियत युवक युवतियों को आशा के केंद्र और वर्गहीन समाज के अग्रदूत बताया था और कहा था कि “वहां के बच्चे शोषण, भेदभाव, नफरत और आपसी भेदभाव को मिटा देंगे।”
1917 में लेनिन के नेतृत्व में बोल्शेविक पार्टी ने क्रांति की ओर रूसी क्रांति ने दुनिया में सबसे पहले महिलाओं के बुनियादी सिद्धांतों को धरती पर उतारा। क्रांति के बाद, रुस में औरतों को सामंती और पूंजीवादी गुलामी से छुटकारा दिलाकर, पुरुषों के साथ साथ समता और बराबरी दिलाई और वहां की औरतों को सभी प्रकार की गुलामियों से आजाद कर दिया गया। रुसी क्रांति ने ,,,,औरतों को मर्दों की व्यक्तिगत संपत्ति से मुक्ति दिलाई। रूसी क्रांति में औरतों ने बढ़ चढ़कर भाग लिया था। सुनिए यहां क्रांतिकारी लेनिन के मुख से,,,,
“पैत्रोग्राद, मास्को, शहरों से देहातों तक, स्त्रियां क्रांति की परीक्षा में खड़ी उतरीं। उनके बिना हम विजयी नहीं हो सकते थे। उन्होंने सभी तकलीफों को हंसते-हंसते बर्दाश्त किया क्योंकि वे सोवियत कायम करना चाहती थीं, क्योंकि वे स्वाधीनता चाहती थीं।”
रूस में साम्यवादी शासन शुरू होते ही औरतों को गुलामी, मातहती में रखने वाले सभी कानूनों को, एक ही झटके में खत्म कर दिया गया। क्रांति के महान नेता लेनिन ने कहा था “साम्यवाद क्या, संपूर्ण जनतंत्र भी तब तक संभव नहीं है, जब तक कि औरतों को राजनीतिक जीवन और समाज के सार्वजनिक जीवन में न्यायोचित स्थाई पद नहीं दिए जाते।”
क्रांति के बाद सोवियतों का नया संविधान बना, जिसमें कहा गया था कि ,,,,सोवियत संघ में औरतों को आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक जीवन में पुरुषों के बराबर अधिकार प्राप्त होंगे। ,,,,इसी के साथ-साथ उन्हें मर्दों के बराबर समान वेतन, समान काम, आराम, शिक्षा, सार्वजनिक सामाजिक बीमा के अलावा माता और बच्चों को राज्य में प्रतिनिधित्व का अधिकार प्राप्त है ,,,,गर्भवती महिलाओं को छुट्टी और वेतन का अधिकार प्राप्त है ,,,,औरतों के लिए मात्रृ ग्रहों, शिशु भवनों और किंडरगारटनों का जाल बिठाया गया।
,,,, क्रांति के बाद औरतों के लिए शिक्षा, उद्योग सभी पेशों, कला और विज्ञान के दरवाजे खोल दिए गए।,,,,इसके बाद औरतों ने सभी क्षेत्रों में पुरुषों के बराबर काम किये। ,,,,गृह युद्ध और सभी मोर्चों पर सिपाही बनीं, घुड़सवारी की, मशीनगनें चलाईं, ,,,,दो लाख स्त्रियां युद्ध के मोर्चे पर जा डटीं ,,,,औरतों की इस बहादुरी से दुश्मन को मोर्चा छोड़कर भागना पड़ा और क्रांति की जय हुई।
इसके बाद औरतें साम्यवाद/समाजवाद के निर्माण में जुट गईं। ,,,,कारखानों में गईं, कारीगर और प्रबंधक/मैनेजर बनीं, ,,,,कलपुरजों की देखभाल की और ,,,,किसी को भी शिकायत का कोई मौका नहीं दिया।
,,,,रूसी क्रांति के बाद शिक्षा प्राप्त करके औरतें इंजीनियर, टेक्नीशियन बनीं ,,,,कृषि क्षेत्र में प्रवेश करगी कर गई और तरह-तरह की फसलें उगाने लगीं।,,,,सभी कामों में औरतों को पुरुषों के बराबर वेतन दिया गया, ,,,,गर्भावस्था में सवेतन छुट्टियां दी गईं।,,,जगह-जगह शिशु ग्रह बनाए गए, जहां काम के वक्त बच्चों को रखा जाता था।,,, बड़े-बड़े सार्वजनिक भोजनालय बनाए गए, जिनसे औरतों को बड़े पैमाने पर गृह कार्यों से मुक्ति मिली।
,,, विवाह करने की आजादी दी गई ,,,पति-पत्नी दोनों को काम की गारंटी दी गई,,,, औरतों को अधिक से अधिक बच्चे पैदा करने की आजादी दी गई ,,,,,अधिक बच्चों की माता को अतिरिक्त आर्थिक सहायता प्रदान की गई ,,,,औरतों को तलाक का अधिकार दिया गया, मगर ऐसा करने से उन्हें यथासंभव रोका गया ,,,,बार-बार तलाक और पुनर्विवाह की सख्त निंदा की गई ,,,,,पारिवारिक जीवन की कद्र न करने वालों को सख्त सजा दी गई।
क्रांति के बाद रुस में वेश्यावृत्ति को पूरी तरह खत्म कर दिया गया ,,,,एक पत्नीव्रत और एक पतिव्रत की विचारधारा और सोच और मान्यता को उत्साहित किया गया ,,,,स्त्रियों को सार्वजनिक ओहदों पर नियुक्तियां दी गईं ,,,,उन्हें संसद, विधायक, सरकारी ओहदेदार बनाया गया और न्यायाधीश के रूप में न्याय की कुर्सी पर बिठाया गया।
,,,,क्रांति के बाद सार्वजनिक जीवन, साहित्य, पत्र, पत्रिकाओं, अखबारों, रंगमंचों और लेखन में जगह दी गई ,,,,पारिवारिक जीवन में बराबरी दी गई जिसमें प्रेम, सहयोग, शुद्ध प्रेम, सानंद, पारिवारिक जीवन को प्राथमिकता दी गई ,,,,जहां पहले स्त्रियां अपवित्र और गुलाम थीं, रूसी क्रांति के बाद समाजवादी व्यवस्था आने पर, औरतों की अपवित्रता और गुलामी का पूरी तरह से खात्मा कर दिया गया।
सोवियत व्यवस्था ने एक झटके में सभी गुलामियों को खत्म कर दिया गया,,,, उन्हें बराबरी का दर्जा दे दिया गया ,,,,सोवियत यूनियन में बाल विवाह, जबरन विवाह, और स्त्री बिक्री पर पूरी रोक लगा दी गई। विवाह की उम्र 18 वर्ष कर दी गई ,,,, स्त्रियों के लिए क्लब घर खोले गए।
,,,, सभी औरतों को अनिवार्य शिक्षा दी गई ,,,,उन्हें नई भाषाएं सिखाई गईं ,,,,घोड़े के बालों से बने “परांदा”/नकाब को औरतों ने उतार फेंका ,,,,पर्दा प्रथा को दफना दिया ,,,,बुर्के को फाड़ फेंका गया ,,,,,गुलामी के सभी चिन्हों,,,,,, पर्दो, बुर्कों, घुंघट के नामोनिशान मिटा दिए गए।
रूसी क्रांति के बाद, औरतों की आजादी और बराबरी का कमाल देखिए ,,,, बच्चियां अपने मां बाप से पूछने लगीं “परांजा” क्या होता है? ,,,,जिन स्त्रियों को कामवासना की तृप्ति का साधन और बच्चे पैदा करने की मशीन समझा जाता था, दासी समझा जाता था, वे प्रधानाचार्य, इंजीनियर, टेक्नीशियन, डॉक्टर, नर्स प्रबंधक, शिक्षिका, लेखिका, कृषक, सांसद और न्यायाधीश बन गईं और वे अपने पतियों को “कामरेड” यानी “साथी” कहने लगीं।
महिलाओं के अधिकारों को सबसे पहले रूसी धरती पर उतारने के बाद, दुनिया के अधिकांश देशों में महिलाओं को बुनियादी अधिकार दिए गए और भारत में भी संविधान के माध्यम से और कानून के शासन के माध्यम से, औरतों को बुनियादी अधिकार देने के प्रावधान दिए गए थे। यह महिलाओं के अधिकारों को धरती पर उतरने का रूसी क्रांति का ही महान कारनामा था। यह बेहद अफसोस की बात है की कानून और संविधान में महिलाओं को बुनियादी अधिकार देने के बावजूद भी, महिलाओं को दिए गए अधिकारों को धरती पर नहीं उतारा गया है और आज अधिकांश औरतें, फिर से बहुत सारी समस्याओं से जूझ रही हैं। महिलाओं के बुनियादी अधिकारों को आज फिर से अमल में लाने और लागू करने की सबसे ज्यादा जरूरत है। इसके लिए समस्त जनता यानी किसानों, मजदूरों, छात्रों, नौजवानों और महिलाओं के एकजुट और जोरदार संघर्ष की सबसे ज्यादा जरूरत है।

लेखक – मुनेश त्यागी
