कविता
बारूद और बस्ता
मनजीत मानवी
ईरान की जमीं पर –
अट्ठाईस फरवरी की सुबह
सैकड़ों लड़कियाँ
कंधे पर बस्ता टाँगे,
उम्मीद की रोशनी आंखों में लिए
स्कूल की ओर निकलती हैं
घर लौटने से पहले ही
उनके सपने धुएं में घुल जाते हैं,
उनकी हंसी
मलबे के नीचे
दम तोड़ देती है,
और घरों की देहरी पर उतर आती है
सामूहिक ताबूतों की
एक लंबी, सर्द खामोशी
यह युद्ध की ताजा तस्वीर है-
जिसे इजरायल और अमेरिका
” मानवता के हक में ”
“सत्ता परिवर्तन ” का नाम देकर
अपनी-अपनी पीठ थपथपा रहे हैं,
मानो इतिहास
फ़कत बारूद का अंबार हो
माओं की खामोश आंखों में
एक अथाह समंदर ठहरा है,
धरती ने ओढ़ लिया है
अपने मासूम बच्चों की
दहकती राख का बिछौना
क्या साम्राज्यवाद का हर पासा
बचपन के क्रंदन पर ही फेंका जाएगा?
क्या शांति का हर दावा
लाशों की सीढ़ि. चढ़कर ही आएगा?
क्या बारूद कभी कर सकता है
किताब के अक्षरों की हिफाज़त
क्या मिसाइलें कभी लिख सकती हैं
मासूम बच्चों के भविष्य की इबारत
दूर कहीं
अधजली कॉपी के पन्ने प र
अब काँपते अक्षरों में लिखा है-
“हम पढ़ना चाहते थे,
बस पढ़ना…”
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