सुरेंद्र कल्याण बुटाना की कविता: कदम-कदम बढ़ाए जा

सुरेंद्र कल्याण बुटाना युवा कवि हैं। कविता के क्षेत्र में कदम रखा है। कविताएं भले ही कसौटी पर खरी न उतरें लेकिन उत्साह से लबरेज़ हैं। पहली पहली सीढ़ी चढ़े हैं, प्रोत्साहन की जरूरत है। यह आशा की जा सकती है कि आगामी समय में अच्छी कविताएं पढ़ने को मिलेंगी। सुरेंद्र जी को बथाई।

कविता

कदम-कदम बढ़ाए जा

सुरेंद्र कल्याण बुटाना

कदम-कदम बढ़ाए जा,

सफलता के बीज उगाए जा।

मदद के सहारे नहीं,

मेहनत के दम पर आगे बढ़,

खुद को इतना मजबूत बना,

कि हर मुश्किल से तू लड़ जा।

 

कर इरादा अटल, अडिग,

निखर हीरे सा चमक जा,

अपने कर्मों की रोशनी से,

जहाँ में उजाला फैलाए जा।

 

One thought on “सुरेंद्र कल्याण बुटाना की कविता: कदम-कदम बढ़ाए जा

  1. # सुरेंद्र कल्याण बुटाना की कविता “कदम-कदम बढ़ाए जा” : संघर्ष, संकल्प और आत्मनिर्भरता का घोष

    समकालीन हिंदी कविता में युवाओं की एक नई पीढ़ी सामने आ रही है, जो जीवन के संघर्षों, सपनों और आत्मविश्वास को अपनी रचनाओं का आधार बना रही है। सुरेंद्र कल्याण बुटाना की कविता **“कदम-कदम बढ़ाए जा”** इसी क्रम की एक प्रेरणात्मक कविता है। यह कविता आकार में छोटी होते हुए भी अपने भीतर एक व्यापक जीवन-दर्शन समेटे हुए है। इसमें संघर्ष, आत्मनिर्भरता, दृढ़ निश्चय और कर्मप्रधानता जैसे मूल्यों को अत्यंत सरल भाषा में अभिव्यक्त किया गया है।

    ## प्रेरणा और प्रगति का स्वर

    कविता की आरंभिक पंक्तियाँ हैं—

    > “कदम-कदम बढ़ाए जा,
    > सफलता के बीज उगाए जा।”

    यहाँ “कदम-कदम” शब्दों की पुनरावृत्ति निरंतरता और सतत प्रयास का बोध कराती है। कवि जीवन को एक यात्रा के रूप में देखते हैं, जहाँ ठहराव नहीं, बल्कि निरंतर आगे बढ़ना ही सफलता का मार्ग है। “सफलता के बीज” एक प्रभावी रूपक है। बीज का अर्थ है—आरंभ, संभावना और धैर्य। जिस प्रकार बीज बोने के बाद उसे समय, परिश्रम और देखभाल की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार सफलता भी निरंतर श्रम और संयम से प्राप्त होती है।

    ## आत्मनिर्भरता का संदेश

    कविता की अगली पंक्तियाँ हैं—

    > “मदद के सहारे नहीं,
    > मेहनत के दम पर आगे बढ़,”

    यहाँ कवि स्पष्ट रूप से आत्मनिर्भरता का समर्थन करते हैं। वे यह संदेश देते हैं कि जीवन में दूसरों के सहारे की अपेक्षा अपनी मेहनत पर विश्वास करना अधिक महत्वपूर्ण है। यह विचार आज के युवा समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक है, जहाँ अनेक बार लोग त्वरित सफलता की अपेक्षा करते हैं। कवि इस प्रवृत्ति का विरोध करते हुए श्रम को ही वास्तविक शक्ति मानते हैं।

    यहाँ “मेहनत के दम पर” वाक्यांश में दृढ़ता और आत्मविश्वास का भाव निहित है। यह पंक्ति केवल प्रेरणा नहीं देती, बल्कि व्यक्ति को आत्मचिंतन के लिए भी प्रेरित करती है कि वह अपने जीवन की जिम्मेदारी स्वयं उठाए।

    ## आंतरिक शक्ति और संघर्ष

    > “खुद को इतना मजबूत बना,
    > कि हर मुश्किल से तू लड़ जा।”

    इन पंक्तियों में कवि ने जीवन के संघर्षों को स्वीकार किया है। वे यह नहीं कहते कि जीवन सरल है; बल्कि वे मानते हैं कि कठिनाइयाँ अवश्य आएँगी। किंतु उनका समाधान भागना नहीं, बल्कि उनसे जूझना है। “मजबूत” शब्द यहाँ केवल शारीरिक शक्ति का प्रतीक नहीं है, बल्कि मानसिक और नैतिक दृढ़ता का भी द्योतक है।

    यहाँ संघर्ष को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। कवि का आशय है कि कठिनाइयाँ व्यक्ति को तोड़ने के लिए नहीं, बल्कि उसे और अधिक सशक्त बनाने के लिए आती हैं। यह दृष्टिकोण जीवन को सकारात्मक परिप्रेक्ष्य में देखने की प्रेरणा देता है।

    ## अटल संकल्प और हीरे का रूपक

    > “कर इरादा अटल, अडिग,
    > निखर हीरे सा चमक जा,”

    इन पंक्तियों में कवि ने “हीरा” रूपक का प्रयोग किया है। हीरा अत्यधिक दबाव और ताप से बनता है। यह संकेत देता है कि मनुष्य भी संघर्ष और विपरीत परिस्थितियों में निखरता है। “अटल” और “अडिग” जैसे शब्द दृढ़ निश्चय की भावना को और प्रबल करते हैं।

    यहाँ अनुप्रास अलंकार की छटा भी दिखाई देती है—“अटल, अडिग” में ध्वनि-सौंदर्य कविता को प्रभावशाली बनाता है। यह पंक्ति पाठक के मन में आत्मबल और संकल्प की भावना को जागृत करती है।

    ## कर्मप्रधान जीवन-दृष्टि

    कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं—

    > “अपने कर्मों की रोशनी से,
    > जहाँ में उजाला फैलाए जा।”

    यहाँ कवि ने कर्म को “रोशनी” के रूप में चित्रित किया है। यह एक अत्यंत सार्थक रूपक है। रोशनी अंधकार को दूर करती है, उसी प्रकार अच्छे कर्म समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकते हैं। यह विचार भारतीय सांस्कृतिक परंपरा से भी जुड़ा हुआ है, जहाँ कर्म को सर्वोपरि माना गया है।

    कवि का संदेश केवल व्यक्तिगत सफलता तक सीमित नहीं है। वे चाहते हैं कि व्यक्ति अपने कर्मों से समाज को भी प्रकाशमान करे। यह व्यापक सामाजिक चेतना का परिचायक है।

    ## भाषा और शैली

    कविता की भाषा अत्यंत सरल, सहज और बोधगम्य है। इसमें जटिल शब्दावली या दुरूह बिंबों का प्रयोग नहीं किया गया है। यही इसकी विशेषता है। यह कविता विशेष रूप से युवाओं और सामान्य पाठकों के लिए प्रेरणादायक सिद्ध हो सकती है।

    शैली की दृष्टि से यह कविता प्रेरणात्मक (Motivational) और उपदेशात्मक (Didactic) है, किंतु इसमें उपदेश का बोझ नहीं है। भाषा में सहजता है और भावों में स्वाभाविकता।

    ## समग्र मूल्यांकन

    “कदम-कदम बढ़ाए जा” एक ऐसी कविता है जो जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है। यह कविता बताती है कि सफलता का मार्ग निरंतर प्रयास, आत्मनिर्भरता, दृढ़ निश्चय और श्रेष्ठ कर्मों से होकर गुजरता है। इसमें प्रयुक्त रूपक—बीज, हीरा और रोशनी—कविता को अर्थपूर्ण और प्रभावशाली बनाते हैं।

    यद्यपि कविता आकार में छोटी है और शिल्प की दृष्टि से अत्यधिक जटिल नहीं, फिर भी इसका भाव-पक्ष सशक्त है। यह कविता विशेषकर युवाओं के लिए मार्गदर्शक का कार्य कर सकती है। कवि की उत्साहपूर्ण अभिव्यक्ति यह संकेत देती है कि वे भविष्य में और अधिक परिपक्व तथा गहन रचनाएँ प्रस्तुत कर सकते हैं।

    अंततः कहा जा सकता है कि “कदम-कदम बढ़ाए जा” केवल एक कविता नहीं, बल्कि जीवन को सकारात्मक दृष्टि से देखने और निरंतर आगे बढ़ने का प्रेरक संदेश है। यह पाठक को रुकने नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में आगे बढ़ने का साहस प्रदान करती है।

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