जसिंता केरकेट्टा की कविताएं

जसिंता केरकेट्टा की कविताएं

 

राष्ट्रवाद

 

जब मेरा पड़ोसी

मेरे ख़ून का प्यासा हो गया

मैं समझ गया

राष्ट्रवाद आ गया ।

 

ईश्वर

 

बंदूकों पर

सारा दोष न मढ़ा जाए

इसीलिए

कुछ लोगों ने तय किया

चलो कोई ईश्वर गढ़ा जाए ।

 

मैं क्यों मारा जाता हूं

 

मैं जब

किसी के प्रेम में होता हूं

उसकी जाति,

धर्म, नस्ल भूल जाता हूं

बस इसी बात पर

हर बार मारा जाता हूं ।

 

गांव

 

जब शहर में विपत्ति आई

बहुत से लोग

अपने गांव लौट रहे थे

पर वे धरती पर किधर लौटेंगे

अपने गांव की हत्या हो जाने के बाद

जो शहर की तरफ़ भागे थे ?

 

नशा

 

हम महुआ के नशे में थे

और वे धर्म के

 

हम नशे में नाचने लगे

और वे हत्या करने लगे ।

 

महात्मा

 

मेमने मासूम बने रहे

भले और प्यारे भी

अहिंसक और प्रेम से भरे हुए

तब भी महात्मा न हो सके

 

भेड़ियों ने कहा

हिंसक होना तो हमारा स्वभाव है

पर हां

हममें से कोई

प्रेम और अहिंसा की बात करेगा

वह महात्मा होगा

 

और अक्सर

महात्मा उन्हीं के बीच से आया ।

 

इंसानों की सवारी करते लोग

 

इस देश में बहुत से देवी-देवता

फूल पर, हंस पर

हाथी पर, चूहे पर

भैंस पर, शेर पर सवार हैं

 

और उनको पूजने वाले लोग

कुछ इंसानों को

इंसान न मानते हुए

उन पर सवार हैं ।

 

लौटना

 

कुछ लौटे सीखने के लिए

 

पर कुछ लौटे

नए तरीक़े से

हमें लूटने के लिए ।

 

सपने

 

एक ऐसी दुनिया के सपने

देखती हूं

जहां किसी तरह की

सीमा न हो

पर हर आदमी जाने

कि उसकी सीमा क्या है ?

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