समर्पित शिक्षक, कुशल संगठनकर्ता, समाजसेवी और विचारक – हनुमान सिंह यादव

हरियाणाः जूझते जुझारू लोग- 69

समर्पित शिक्षक, कुशल संगठनकर्ता, समाजसेवी और विचारक – हनुमान सिंह यादव

सत्यपाल सिवाच

आन्दोलन की कतारों में हजारों साथी मिले। सभी की अपनी-अपनी विशिष्टताएं हैं लेकिन इनमें हनुमानसिंह यादव ऐसी शख्सियत हैं जिनकी चमक मृत्यु के लगभग दो दशक बाद छाई हुई है। 5 मई 1952 को महेन्द्रगढ़ जिला, नारनौल तहसील के गांव धौलेड़ा में श्रीमती मिश्री देवी और सुलतान सिंह के घर किसान परिवार में एक सपूत ने जन्म लिया। उस समय शायद ही किसी ने सोचा होगा कि नवजात शिशु हनुमान ऐसा नाम कर जाएंगे कि लोग उन्हें याद रखेंगे। वे तीन भाई और एक बहन थे। हनुमान सिंह ने बी.ए. बी.एड. और राजनीति शास्त्र में एम.ए. तक शिक्षा प्राप्त की। प्रारंभ में उन्होंने राजस्थान में थर्ड ग्रेड टीचर के रूप में राजस्थान में नौकरी की। फिर एक जनवरी 1986 में हरियाणा में एस.एस. मास्टर नियुक्त हो गए और 27 अक्तूबर 2007 को कैंसर की जानलेवा बीमारी के चलते सेवानिवृत्ति से लगभग अढ़ाई साल पहले चल बसे।

परिवार में उनकी पत्नी श्रीमती विद्यादेवी की भी 30 जून 2017 को कैंसर के कारण मृत्यु हो गई। वे अपने सरल, सीधे स्वभाव के कारण जानी जाती हैं जो अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को बखूबी निभाती रहीं। उनकी दो सन्तान हैं – बेटा कृष्ण कुमार संस्कृत अध्यापक है और बेटी सुनीता प्राथमिक शिक्षक । कृष्ण कुमार अपने पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए यूनियन में सक्रिय हैं। वे महेन्द्रगढ़ जिले में हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ के उपाध्यक्ष हैं। पहले तीन साल संगठन सचिव और छह साल कोषाध्यक्ष रह चुके हैं।

हनुमान सिंह एक समर्पित शिक्षक, कुशल संगठनकर्ता, समाजसेवी और विचारक के रूप में सर्वमान्य रहे हैं। वे बहुत अध्ययनशील और चिंतन-मनन करने वाले थे। इसी विशेषता के चलते उनके चारों ओर एक विशेष आभामंडल निर्मित हुआ। उनके पिता जी द्वितीय विश्वयुद्ध में सैनिक रहे थे। उनकी वजह से शिक्षा के लिए फीस माफ हो जाती थी। इससे पढ़ना थोड़ा आसान रहा। जब उनके पिता जी मृत्यु हुई तो हनुमान अल्पायु के ही थे। माँ मिश्री देवी यथा नाम मधुर स्वभाव की और मिलनसार थीं। बड़े भाई अमींलाल परिवार की जिम्मेदारी निभाने के फौज में भर्ती हो गए। वहाँ पढ़ना जारी रखा और पाँच साल बाद ही पहले हरियाणा और फिर राजस्थान में अध्यापक नियुक्त हो गए। छोटे सूबेसिंह कबड्डी खिलाड़ी थे और इसी के आधार वे पुलिस में भर्ती हो गए। बड़े भाई और माँ के प्रोत्साहन से हनुमान सिंह ने शिक्षा पूरी की। वे एन.सी.सी.और एन.एस.एस. में भी भाग लेते थे।

वे स्कूली जीवन मे पढाई के साथ साथ कबड्डी, वालीबॉल, हॉकी, दौड़ आदि खेलों में भी अव्वल थे। 1971 में उन्हे बेस्ट प्लेयर अवार्ड भी दिया गया। NCC व NSS के भी अच्छे कैडेट रहे। बचपन से ही उन पर आर्य समाज का प्रभाव रहा। आर्य युवक परिषद दिल्ली द्वारा आयोजित 1971 में “सत्यार्थ रत्न परीक्षा” तथा 1972 मे “सत्यार्थ भूषण परीक्षा” पास की।  1978 मे आर्य युवक परिषद हरियाणा द्वारा आयोजित “ब्रह्मचर्य शिक्षक प्रशिक्षण” प्राप्त किया। MA, B.Ed करने के बाद शुरुआती 2 वर्ष गुरुकुल इन्द्रप्रस्थ दिल्ली, 6 वर्ष राजस्थान व 21 वर्ष हरियाणा कुल 29 वर्ष उन्होंने अध्यापन कार्य किया। उनके द्वारा किए गए सामाजिक कार्यों का विवरण इस प्रकार है :-

  1. हरियाणा विद्यालय अध्यापक संघ (ह० रा० अ० संघ 70) में खंड सचिव, जिला सचिव व राज्य सचिव रहते हुए अध्यापकों के हकों के लिए संघर्ष किया तथा जिला (नारनौल) में हुए एकमात्र राज्य सम्मेलन (1996) के रूप सफल आयोजनकर्ता रहे।
  2. 1993 मे हड़ताल और गिरफ्तारी के कारण 8 दिन नौकरी से बर्खास्त हुए।
  3. 1993 मे 22 दिन व 1998 मे 4 दिन जेल मे रहे।
  4. यूनियन की पत्रिका (अध्यापक समाज)के संपादक मंडल में रहे तथा 50 से अधिक लेख शैक्षिक, सामाजिक, राजनैतिक, वैश्विक मुद्दों पर लिखे।
  5. 1985 में ग्राम विकास परिषद धौलेड़ा का गठन करवाया।
  6. 1986 में गांव मे पुस्तकालय की स्थापना व भवन निर्माण मे अहम भूमिका निभाई।
  7. 1987 में सती प्रथा के विरोध में दिल्ली से दिवराला (सीकर) 18 दिन की पदयात्रा मे भाग लिया।
  8. 1989 में धौलेड़ा से नारनौल सड़क बनवाने के लिए अथक और सफल प्रयास किया।
  9. 1991 मे जनयुद्ध रैली मे रघु यादव का काफी सहयोग किया। उस समय नारनौल ITI रैली में पुलिस की गोली से 2 शहीद व कई घायल हुए थे।
  10. 1995 मे गांव की धर्मशाला का काला नौपा परिवारों के सहयोग से पुनर्निर्माण करवाया।
  11. 2000 में आर्य समाज मंदिर निर्माण में अहम् किरदार निभाया।
  12. नेहरू युवा केन्द्र के सहयोग से गांव मे अनेक बार खेल व कैंपों का सफल आयोजन करवाया तथा कई बार जिला मे प्रथम युवा क्लब का खिताब दिलवाया।
  13. आर्य समाज, तर्कशील सोसाईटी, ज्ञान विज्ञान समिति आदि अनेक सामाजिक संगठनों से ताउम्र जुड़े रहे।
  14. उनकी कथनी और करनी मे कभी अंतर नही रहा। बेटे कृष्ण कुमार की शादी में उन्होंने दहेज में 1 रुपया लेकर समाज के सामने उदाहरण पेश किया। उन्होंने अंधविश्वास और मूर्तिपूजा का विरोध केवल भाषणों मे नहीं किया बल्कि उसे अपने जीवन में लागू किया। हमारे घर में कभी मूर्ति पूजा नहीं हुई। मेरी शादी में भी निकासी (मंदिर जाने की रस्म) ना निकालकर एक अनूठा उदाहरण पेश किया।

मुझे याद है कि एक उनके “अध्यापक समाज” के लिए लिखे एक सम्पादकीय “जब देवपुरुष हार गए” को पढ़कर एक कर्मकांडी शिक्षक ने उत्तेजित होकर प्रतिक्रिया लिख डाली तो हनुमान सिंह ने शांत रहकर तर्कपूर्ण स्पष्टीकरण दिया। वह शिक्षक पूर्णतया निरुत्तर हो गए। बात 2005 की है। नारनौल पंचायत भवन में DC ने जनता दरबार लगाया था। जिले के सभी प्रशासनिक अधिकारी उपस्थित थे। श्री हनुमान सिंह जी भी अध्यापक संघ के जिला पदाधिकारियों के साथ अध्यापकों की समस्याएं ले कर दरबार में पहुंचे। जब समस्याएं दरबार में रखीं तो एक अधिकारी (CTM) ने बोल दिया कि सरकारी अध्यापक बच्चों को नहीं पढ़ाते, सारा दिन कुर्सी तोड़ते हैं। श्री हनुमान सिंह जी ने तुरंत विरोध जताते हुए तार्किक जवाब दिया। उस अधिकारी ने गलती मानी और विचारों से इतने प्रभावित हुए कि दरबार खत्म होने के बाद मुलाकात की, नाम पता पूछा और अपनी गाड़ी सें घर छोड़ कर गए। बाद में जब हनुमान जी बीमार हो गए तब मिल कर भी गए।

बात इमरजेंसी से पहले की है। नारनौल सें धौलेड़ा रोड़ बनना शुरू हो गया। नारनौल के विधायक रामशरण मित्तल गांव में आए। गांव में किसी बात को लेकर कर उनका विरोध हो गया। विधायक ने तुरंत रोड का काम रुकवा दिया और ताजीपुर (जहां तक बन चुका था) से कारोता – कमानिया होते हुए नांगल चौधरी बनवा दिया।

श्री हनुमान सिंह जी उस समय बी.एड. कर रहे थे। इमरजेंसी के दौरान उन्होंने नारनौल के स्वतंत्रता सेनानी श्री अयोध्या प्रसाद व श्री बाबू नंद शर्मा के साथ मिल कर आंदोलन में भाग लिया। दोनों नेताओं को जेल में डाल दिया गया। हनुमान सिंह जी ने बाहर रह कर उनके काम को जारी रखा। अपने काम की बदौलत वे दोनों नेताओं के सबसे विश्वासपात्र बन गए। वे अक्सर अयोध्या प्रसाद जी से आजाद चौक पर उनकी घड़ियों की दुकान व बाबू नंद शर्मा जी से उनकी किताबों की दुकान पर मिलने जाते और उनसे आजादी के किस्से सुनते। 1977 में जनता पार्टी ने अयोध्या प्रसाद जी को नारनौल से टिकट दे दिया। (हालांकि वे राजनीति से दूर रहना चाहते थे) श्री हनुमान सिंह जी ने भी उनके चुनाव प्रचार में बहुत मेहनत की। गांव गांव जाकर मंचों सें भाषण दिए। अयोध्या प्रसाद जी रिकार्ड मतों सें विजयी हुए। इसके बाद हनुमान सिंह जी ने विधायक जी से धौलेड़ा रोड बनवाने का आग्रह किया और रोड बन गया।

एक और प्रसंग मुझे याद आ रहा है। वे आर्य समाजी होने के साथ साथ प्रगतिशील और वामपंथी रुझान भी रखते थे। एक बार कोई शिक्षक उन्हें और श्री रामपत यादव जी को रोहतक में एसयूसीआई द्वारा आयोजित शिक्षण कार्यक्रम में ले गया। दूसरे दिन की कक्षा में एजेंडा आया कि आप लोग हरियाणा राजकीय अध्यापक संघ को तोड़कर अलग संगठन बनाइए। हनुमान जी और रामपत जी दोनों ने इसे गलत बताया और शिविर छोड़कर आ गए तथा यूनियन की बैठक में इस साजिश की जानकारी दी।

वे संगठन के बहुत समर्पित और निष्ठावान थे। बाद में सूबे सिंह व कुछ शिक्षकों ने अलग यूनियन बना भी ली जो चल नहीं पाई। जनपक्षधरता तो उनके स्वभाव में शामिल ही थी। पूरे राज्य में अध्यापक संघ ने शिक्षा पर सेमिनार आयोजित किए। नारनौल में मेरी ड्यूटी थी। हनुमान जी का अपने कॉलेज शिक्षक के जरिए योगेन्द्र यादव से परिचय था। किसी को लगता नहीं था कि योगेन्द्र यादव समय देंगे। इन्होंने उन्हें बुलाया। वहीं सेमिनार में उनसे मुलाकात के बाद वर्षों तक पत्राचार का सिलसिला चलता रहा।(सौजन्य ओमसिंह अशफ़ाक)

लेखक- सत्यपाल सिवाच

One thought on “समर्पित शिक्षक, कुशल संगठनकर्ता, समाजसेवी और विचारक – हनुमान सिंह यादव

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