मैं पैसा हूँ: कीमत मेरी है, चरित्र तुम्हारा
मैं साधन हूँ, साध्य नहीं – मुझे कमाइए, पर अपने रिश्तों और आत्मा से बड़ा मत बनाइए
डॉ. रीटा अरोड़ा
मैं पैसा हूँ। हाँ, वही पैसा जिसे पाने के लिए तुम दिन-रात दौड़ते हो, अपनी नींदें कुर्बान करते हो और जिसे पाकर तुम्हारा चेहरा खिल उठता है। मेरा कोई एक निश्चित रूप नहीं है। कभी मैं कागज़ के कड़कते नोटों में मुस्कुराता हूँ, कभी सिक्कों के रूप में खनक उठता हूँ, तो कभी कंप्यूटर की स्क्रीन पर ‘डिजिटल नंबर्स’ बनकर तैरता हूँ। रूप चाहे जो भी हो, मेरी ताकत हमेशा एक जैसी रहती है।
हिंदू धर्म में लोग मुझे केवल धातु या कागज़ का टुकड़ा नहीं मानते, बल्कि मुझे ‘लक्ष्मी’ का स्वरूप मानकर पूजते हैं। दीपावली की रात लोग मेरी पूजा करते हैं, मुझ पर कुमकुम चढ़ाते हैं और प्रार्थना करते हैं कि मैं हमेशा उनके घर में वास करूँ। मैं संसार के हर कोने में मौजूद हूँ। लोग मुझे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं- कहीं रुपया, कहीं डॉलर, यूरो या पाउंड। मेरे नाम और भेष भले ही बदलते रहते हैं, लेकिन मेरा महत्व दुनिया के हर कोने में एक समान है।
मेरे बिना किसी का कोई काम नहीं चलता। मैं मनुष्य के जीवन की सबसे बुनियादी ज़रूरत बन चुका हूँ। इलाज, मकान, भोजन, शिक्षा या यात्रा-हर जगह मेरी ही आवश्यकता पड़ती है। मैं जीवन की गाड़ी का वह ईंधन हूँ, जिसके बिना पहिए आगे नहीं बढ़ सकते।
सच्चाई तो यह है कि मैं मनुष्य के जन्म से लेकर उसकी मृत्यु तक का हमसफ़र हूँ। जब बच्चा इस दुनिया मंं कदम रखता है, तो अस्पताल का बिल चुकाए बिना या नर्सों को ‘बधाई’ दिए बिना उसे माता-पिता को नहीं सौंपा जाता। यानी मनुष्य अपनी पहली साँस भी मेरी मौजूदगी में ही लेता है।
“पैसा साथ नहीं जाता, यह सच है… लेकिन जब तक जीवन है, तब तक उसके बिना जीवन की यात्रा भी आसान नहीं होती।”
और जब मनुष्य की यह जीवन-यात्रा समाप्त होती है, तब भी मेरी भूमिका खत्म नहीं होती। अर्थी सजाने के सामान से लेकर, कफ़न, श्मशान की लकड़ियाँ और अंतिम संस्कार की दक्षिणा तक-हर व्यवस्था में मेरा ही उपयोग होता है। यहाँ तक कि गंगा जी के घाट पर तर्पण करने के लिए भी मेरी ज़रूरत होती है। इसलिए, मैं गर्व और थोड़े दुख के साथ कह सकता हूँ कि मैं मनुष्य के जन्म से लेकर उसकी अंतिम राख बनने तक उसका साथ निभाता हूँ।
मेरी एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि मैं हमेशा शुद्ध और पवित्र रहता हूँ। मैं कीचड़ में भी पवित्र हूँ। मैं कभी सफाई कर्मचारी के हाथ में होता हूँ, कभी किसान के तो कभी किसी व्यापारी या अपराधी के। लेकिन इससे मेरी पहचान नहीं बदलती। यदि मैं गलती से किसी नाले या गंदगी में गिर जाऊँ तो भी लोग मुझे उठाने के लिए तुरंत दौड़ पड़ते हैं उसे साफ़ करते हैं और माथे से लगाते हैं। गंगाजल की तरह मुझ पर भी किसी की अपवित्रता का कोई असर नहीं होता। मेरी कीमत हर हाल में वही रहती है, जो मेरे ऊपर छपी हुई है।
इसके साथ ही, मैं बहुत नटखट और चंचल हूँ। मैं एक हाथ में टिककर नहीं रह सकता। आज मैं तुम्हारी जेब में हूँ तो कल किसी और के बटुए की रौनक बढ़ा रहा हूँगा। आपकी खुशियों में उपहारों के रूप में और आपके दुखों में दवाइयों के रूप में मैं हर जगह उपस्थित रहता हूँ।
कुछ लोग मुझे बहुत पवित्र मानकर गंगा जी में या मंदिरों के दानपात्र में अर्पित कर देते हैं। उन्हें लगता है कि उन्होंने मुझे त्याग दिया। लेकिन मैं वहाँ भी शांत नहीं बैठता। गोताखोर लड़के या मंदिर के ट्रस्टी मुझे फिर से निकाल लेते हैं और मैं फिर किसी न किसी रास्ते से घूम-फिरकर वापस इंसानों के हाथों में लौट आता हूँ। मुझे बांधकर रखना, मुझे कैद करना किसी के बस की बात नहीं है। जो मुझे बहुत संभालकर रखता है, मैं एक दिन मंदी या किसी संकट के बहाने उसके हाथ से फिसल ही जाता हूँ।
इस पूरी दुनिया पर राज करने के बावजूद मेरा दिल भी रोता है। मुझे सबसे अधिक दुःख तब होता है, जब मेरे लिए लोग अपने सबसे पवित्र और अनमोल रिश्ते भूल जाते हैं। मैं तो केवल एक साधन था, लेकिन मनुष्य ने मुझे ही अपना जीवन मान लिया।
जब मैं देखता हूँ कि एक सगा भाई, दूसरे भाई के खून का प्यासा हो जाता है; एक बेटा संपत्ति के लिए अपने बूढ़े माता-पिता को घर से निकाल देता है; या वर्षों पुरानी दोस्ती सिर्फ कुछ नोटों की खातिर टूट जाती है, तब मेरा दम घुटने लगता है। लोग जब अदालतों में अपनों के ही खिलाफ मुकदमे लड़ते हैं और वकीलों को मुझे पानी की तरह बहाते हैं, तब मुझे अपनी ताकत पर शर्म आने लगती है।लेकिन इसमें मेरा क्या कसूर? दोष मेरा नहीं, बल्कि उस अंधी लालच का है जो मनुष्य के हृदय में घर कर जाती है। मनुष्य मेरे मोह में अंधा होकर खुद अपनी इंसानियत को भूल जाता है।
मैं एक बहुत अच्छा सेवक हूँ, लेकिन बहुत ही बुरा मालिक हूँ। यदि तुम मुझे एक सेवक की तरह इस्तेमाल करोगे, तो मैं तुम्हारे जीवन को सुखमय बना दूँगा। मेरे ज़रिए तुम किसी गरीब की मदद कर सकते हो, भूखे को खाना खिला सकते हो और बीमार का इलाज करवा सकते हो। तब मैं साक्षात ‘लक्ष्मी’ का रूप होता हूँ।
लेकिन इसके विपरीत, यदि तुम मुझे अपना मालिक बना लोगे, तो मैं तुम्हारे जीवन को नर्क भी बना सकता हूँ। मेरी अंधी चाहत में लोग अपने संस्कार और आत्मा तक बेच देते हैं। गलत रास्तों से कमाने वाले महलों में रहते हुए भी बिना नींद की गोली के चैन से सो नहीं पाते। तब वे समझ पाते हैं कि मैं सब कुछ तो हूँ, पर हर चीज़ नहीं हूँ।
मैं संसार के हर मनुष्य से बस यही कहना चाहता हूँ कि मेरी कद्र करो, मुझे कमाने के लिए खूब मेहनत करो, क्योंकि मेरे बिना जीवन की डगर बहुत कठिन है। लेकिन मेरे पीछे इस कदर अंधे मत बनो कि अंत में तुम्हारे पास केवल नोटों के बंडल हों और कोई अपना न बचा हो।
मेरा सही उपयोग करोगे, तो मैं तुम्हारी यात्रा को आनंदमय बना
दूँगा। लेकिन अगर मेरे लिए अपनी इंसानियत दांव पर लगाओगे, तो याद रखना—श्मशान की चिता पर मैं तुम्हारे साथ नहीं जलूँगा, मैं यहीं ज़मीन पर पड़ा रहूँगा और तुम खाली हाथ चले जाओगे। बुद्धिमान बनो, मेरा उपयोग करो, पर मुझे अपनी आत्मा मत बनने दो
इसलिए, मेरे पीछे इस कदर अंधे मत बनो कि जब तुम पीछे मुड़कर देखो, तो तुम्हारे पास केवल नोटों के बंडल हों और कोई हाथ थामने वाला अपना न बचा हो। मैं पैसा हूँ। मेरा सही उपयोग करोगे, तो मैं तुम्हारे जीवन की यात्रा को सुगम और आनंदमय बना दूँगा। लेकिन अगर मेरे लिए अपनी इंसानियत दांव पर लगाओगे, तो याद रखना – श्मशान की उस चिता पर मैं तुम्हारे साथ जलकर राख नहीं होऊँगा, मैं यहीं ज़मीन पर पड़ा रहूँगा और तुम खाली हाथ ही इस दुनिया से विदा हो जाओगे।
बुद्धिमान बनो।
मेरा उपयोग करो।
मेरा सम्मान करो।
लेकिन मुझे अपनी आत्मा मत बनने दो।
मैं पैसा हूँ।

लेखिका – डॉ रीटा अरोड़ा
डॉ. रीटा अरोड़ा सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल हैं।
