सब बोल रहे हैं, सुन कौन रहा है
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शब्दों और प्रतिक्रियाओं के बढ़ते शोर में कहीं हम अपनों की बात सुनना तो नहीं भूल गए?
~ डॉ. रीटा अरोड़ा
“आज मन बहुत खराब है,” बेटी ने घर आते ही माँ से कहा।
माँ ने तुरंत पूछा, “क्यों? फिर किसी से झगड़ा हुआ? मैंने कितनी बार कहा है कि हर बात दिल पर मत लिया करो।”
“नहीं माँ, बात वो नहीं है…”
“तो पढ़ाई का तनाव होगा। फोन कम चलाया करो, सब ठीक हो जाएगा।”
बेटी कुछ क्षण चुप रही। फिर धीरे से बोली, “माँ, मैं आपसे समाधान नहीं माँग रही थी… बस थोड़ी देर मेरी बात सुन लेतीं।”
माँ के हाथ वहीं रुक गए।
यह दृश्य केवल उस घर का नहीं है। कभी पत्नी पति से कुछ कह रही होती है, कभी पिता बेटे से, कभी कोई मित्र अपने मन की गाँठ खोलना चाहता है। लेकिन सामने वाला पूरी बात सुनने से पहले ही सलाह, तर्क या अपना अनुभव लेकर तैयार हो जाता है।
हमारे पास जवाब बहुत हैं, सुनने का समय कम।
आज संवाद के साधन जितने बढ़े हैं, शायद संवाद उतना ही अधूरा हुआ है। संदेशों की भरमार है, सामाजिक माध्यमों पर प्रतिक्रियाओं की बाढ़ है और हर व्यक्ति के पास हर विषय पर कुछ न कुछ कहने को है। लेकिन क्या हमारे पास किसी की बात बिना टोके, बिना निर्णय दिए और बिना अपनी कहानी बीच में लाए सुनने का धैर्य है?
हम अक्सर सामने वाले को सुनते हुए भी वास्तव में उसे नहीं सुन रहे होते। मन के भीतर अपना उत्तर तैयार कर रहे होते हैं। उसकी बात पूरी होने से पहले ही सोच लेते हैं – मुझे पता है यह क्या कहना चाहता है।
यहीं से समझ की जगह अनुमान लेना शुरू कर देता है। स्रोत सामग्री भी इसी फर्क को रेखांकित करती है – सामने वाले को समझने के लिए सुनना और केवल उत्तर देने के लिए सुनना दो अलग बातें हैं।
कभी किसी बुजुर्ग को गौर से सुनिए। वह कई बार वही पुरानी कहानी दोहराता है जिसे परिवार दस बार सुन चुका है। हम बीच में कह देते हैं, “हाँ पापा, यह आपने बताया था।”
कहानी वहीं रुक जाती है।
लेकिन शायद वह कहानी हमें कोई नई जानकारी देने के लिए नहीं सुनाई जा रही थी। शायद उस बहाने वे हमारे साथ दस मिनट और बैठना चाहते थे।
बच्चों के साथ भी ऐसा ही होता है। बच्चा स्कूल से लौटकर कहता है, “आज मेरे दोस्त ने मुझसे बात नहीं की।”
हम तुरंत समझाने लगते हैं – “कोई बात नहीं, दूसरे दोस्त बना लो।”
लेकिन संभव है कि उसे उस समय दोस्त बनाने की सलाह नहीं, अपने दुख को किसी के सामने रख देने की जगह चाहिए थी
पति-पत्नी के बीच भी कितनी बहसें केवल इसलिए लंबी हो जाती हैं क्योंकि दोनों अपनी बात समझाने में लगे होते हैं, दूसरे की बात समझने में नहीं। एक कहता है, “तुम मेरी बात समझते ही नहीं।” दूसरा तुरंत जवाब देता है, “मैं सब समझता हूँ, लेकिन तुम भी तो…”
और फिर बातचीत समस्या से हटकर इस प्रतियोगिता में बदल जाती है कि कौन सही है।
जबकि हर बातचीत का उद्देश्य किसी एक का जीतना क्यों हो?
सुनना सहमत होना नहीं है। किसी की बात धैर्य से सुनने का अर्थ यह नहीं कि हम उसकी हर बात को सही मान लें। इसका अर्थ केवल इतना है कि प्रतिक्रिया देने से पहले हम उसके अनुभव और भावना को समझने की कोशिश करें। सचेत और सहानुभूतिपूर्ण ढंग से सुनना रिश्तों में विश्वास और आपसी समझ को गहरा कर सकता है।
इसके लिए कोई कठिन प्रशिक्षण भी नहीं चाहिए।
अगली बार कोई अपनी बात कहे तो मोबाइल थोड़ी देर के लिए अलग रख दीजिए। बीच में उसका वाक्य पूरा मत कीजिए। तुरंत अपनी कहानी मत सुनाइए – “मेरे साथ तो इससे भी बुरा हुआ था।” और सबसे जरूरी, हर परेशानी का समाधान देने की जिम्मेदारी अपने ऊपर मत लीजिए।
कभी पूछकर देखिए –
“तुम चाहते हो मैं कुछ कहूँ, या बस तुम्हारी बात सुनूँ?”
शायद यही एक प्रश्न कई रिश्तों का स्वर बदल सकता है।
और एक छोटी-सी आदत और – सामने वाले की बात पूरी होने के बाद तुरंत उत्तर देने के बजाय कुछ क्षण रुकना क्योंकि वह हमें तत्काल सफाई या प्रतिवाद से बाहर निकालकर वास्तव में कही गई बात पर विचार करने का अवसर देता है।
आज हमें अच्छा बोलना सिखाने के लिए बहुत कुछ उपलब्ध है – भाषण-कला, व्यक्तित्व विकास, प्रस्तुतीकरण। लेकिन अच्छा सुनना कौन सिखाता है?
शायद इसकी पहली पाठशाला घर ही होनी चाहिए।
खाने की मेज पर बच्चे की अधूरी बात पूरी होने देना। बुजुर्ग की दोहराई हुई कहानी को फिर सुन लेना। मित्र के दुख पर तुरंत सलाह न देना। जीवनसाथी की शिकायत सुनते समय अपनी सफाई कुछ देर रोक लेना।
क्योंकि कई बार सामने वाले को हमारे ज्ञान की नहीं, हमारी उपस्थिति की जरूरत होती है।
रिश्तों की सबसे बड़ी दूरियाँ हमेशा बातचीत बंद होने से नहीं बनतीं। कभी-कभी बातचीत रोज होती है – बस किसी को लगता रहता है कि उसकी बात वास्तव में सुनी ही नहीं गई।
शायद अगली बार जब कोई अपना मन हमारे सामने खोले, तो उत्तर खोजने की जल्दी न करें।
हो सकता है, वह हमारे शब्दों के लिए नहीं… हमारे कानों में अपने लिए थोड़ी-सी जगह ढूँढ़ रहा हो।
