जब पुरानी राजनीति असंभव हो जाती है

जब पुरानी राजनीति असंभव हो जाती है

(बंगाल में सीपीआई(एम) के बोधोदय पर क्षण भर)

अरुण माहेश्वरी

 

यह एक मान्य तथ्य है कि पश्चिम बंगाल की विशेष परिस्थितियों में सीपीआई(एम) पिछले कई वर्षों से भाजपा और तृणमूल को एक ही रणनीतिक धरातल पर रखकर दोनों के विरुद्ध समान संघर्ष की राजनीति करती रही है। समय-समय पर इस लाइन की आलोचना और आत्मालोचना भी हुई, फिर भी नीचे के स्तर के तीखे अनुभवों के कारण पार्टी के राजनीतिक व्यवहार में भाजपा और तृणमूल को समान स्तर पर रखने की प्रवृत्ति बनी रही।

अब भाजपा के राज्य की सत्ता में आने के बाद सीपीआई(एम) को स्पष्ट रूप से कहना पड़ रहा है कि भाजपा ही प्रमुख राजनीतिक शत्रु है। हाल में समाप्त हुई पार्टी की विस्तारित राज्य कमेटी की बैठक में लिया गया यही सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक फैसला है।

इसे केवल बदली हुई परिस्थिति के अनुरूप राजनीतिक लाइन में परिवर्तन मानना पर्याप्त नहीं होगा। इसमें उस पुरानी राजनीतिक समझ की व्यर्थता का बोध भी शामिल है जिस पर बंगाल की वाम राजनीति तृणमूल शासन के इन वर्षों में चलती रही। इसका सबसे मुखर रूपक था—‘बीजेमूल’।

‘कांग्साल’ से ‘बीजेमूल’

बंगाल की वाम राजनीति में दो दलों के संकर से निर्मित ऐसा पद कोई नया भाषाई आविष्कार नहीं था। सत्तर के दशक में नक्सलवादियों के हाथों सीपीआई(एम) के कार्यकर्ताओं की हत्याओं और उससे कांग्रेस को मिलने वाले लाभ के संदर्भ में ‘कांग्साल’—कांग्रेस और नक्सल का संकर—कहा गया था। बाद में कांग्रेस की ही सरकार ने नक्सलवादियों के जिस क्रूरतम दमन का इतिहास रचा, वह सबके सामने है।

इतिहास का सबक स्पष्ट था—दो शक्तियों का किसी तीसरी शक्ति के विरुद्ध वस्तुगत रूप से एक-दूसरे को लाभ पहुँचाना उन्हें एक अभिन्न राजनीतिक सत्ता नहीं बना देता।

तृणमूल शासन में वाम के दमन और क्षय ने निस्संदेह भाजपा के विस्तार की जमीन तैयार की। इस अर्थ में ‘बीजेमूल’ वाम के निजी राजनीतिक अनुभव के एक यथार्थ को व्यक्त करता था। लेकिन इस अनुभव से भाजपा और तृणमूल की राजनीतिक समानता का निष्कर्ष निकालते ही वह यथार्थ एक काल्पनिक संकर में बदल गया।

यही अनुभववाद की विडंबना है। पार्टी राजनीतिक जगत को अपने संदर्भ में पढ़ने लगती है—जो दो शक्तियाँ हमारे विरुद्ध हैं, वे अंततः एक ही हैं। यह प्रश्न पीछे छूट जाता है कि उन शक्तियों का अपना चरित्र क्या है और उनके आपसी अंतर्विरोध क्या हैं।

‘कांग्साल’ से ‘बीजेमूल’ तक की यात्रा इसलिए केवल दो पदों का इतिहास नहीं है। यह उस राजसत्तावादी राजनीतिक दृष्टि का इतिहास भी है जिसमें अपने विरुद्ध खड़ी शक्तियों की भिन्नताओं को पढ़ने के बजाय उन्हें एक साझा शत्रु में विलीन कर देना आसान हो जाता है।

विरोध समानता का आधार नहीं हो सकता

यह सच है कि तृणमूल के विरोध के बिना बंगाल में सीपीआई(एम) की राजनीति का कोई अर्थ नहीं हो सकता था। भ्रष्टाचार, राजनीतिक हिंसा, प्रशासन का दलीयकरण, विपक्ष के लोकतांत्रिक अधिकारों का संकुचन और सत्ता का एकाधिकारवादी व्यवहार—इनसे आँख मूँदना अपनी राजनीति को समाप्त करना होता।

इसी प्रकार भाजपा के फासीवादी चरित्र से संघर्ष को लेकर भी वाम हलकों में शायद ही कोई सैद्धांतिक संदेह रहा हो। समस्या वहाँ पैदा हुई जहाँ ‘दोनों का विरोध’ धीरे-धीरे ‘दोनों समान हैं’ की राजनीतिक समझ में बदल गया।

राजनीति में दो शक्तियों का विरोध करना और उन्हें समान मानना बिल्कुल अलग बातें हैं।

भाजपा और तृणमूल के बीच फर्क केवल शासन की अच्छाई-बुराई अथवा भ्रष्टाचार की मात्रा का नहीं है। आरएसएस-भाजपा का लक्ष्य केवल सरकार चलाना नहीं, बल्कि संविधान, राज्य, समाज और नागरिकता के चरित्र तक को एक केंद्रीकृत दिशा में बदलना है।

फिर भी बंगाल में तृणमूल शासन के प्रत्यक्ष अनुभव ने इस मूलभूत फर्क को धुँधला कर दिया। जिससे रोजमर्रा का संघर्ष था, वही सबसे निकट और इसलिए सबसे बड़ा शत्रु दिखाई देने लगा। भाजपा के विरुद्ध वैचारिक चेतावनी और तृणमूल के विरुद्ध प्रत्यक्ष राजनीतिक संघर्ष एक ही तराजू पर रख दिए गए।

लेकिन इतिहास कई बार किसी भ्रामक राजनीतिक समझ का खंडन तर्क से नहीं, उसके परिणामों से करता है।

जिस भाजपा के बढ़ाव को ‘दोनों के विरुद्ध संघर्ष’ के बीच से रोकना था, वही तृणमूल-विरोधी राजनीति के दौर में सबसे अधिक फली-फूली। वाम के कमजोर होने से खाली हुए विपक्षी राजनीतिक क्षेत्र पर उसने कब्जा किया और अंततः राज्य की सत्ता तक पहुँच गई।

भाजपा का सत्ता में आना स्वयं में सीपीआई(एम) की पुरानी राजनीति को गलत सिद्ध नहीं करता। लेकिन यदि आज स्वयं सीपीआई(एम) को भाजपा को ‘प्रमुख शत्रु’ कहना पड़ रहा है, तो सवाल उठता है—भाजपा में आज ऐसा क्या है जो कल नहीं था?

आरएसएस कल पैदा नहीं हुआ। भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति आज शुरू नहीं हुई। केंद्र की सत्ता और राज्य-संस्थाओं के साथ उसके संबंध भी नए नहीं हैं। भारतीय गणराज्य के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक चरित्र को बदलने की उसकी परियोजना भी बंगाल में सरकार बनने के बाद अचानक पैदा नहीं हुई है।

अर्थात् जिस विशिष्टता के कारण भाजपा आज प्रमुख शत्रु दिखाई दे रही है, उसके मूल तत्व पहले से मौजूद थे।

आज बदला यह है कि जो बात सिद्धांत और दूर के अनुभव में दिखाई देती थी, वह अब बंगाल के अपने अनुभव की ठोस वास्तविकता बन गई है। एक राजनीतिक सत्य जिसे जानना संभव था, अब ऐसा सत्य बन गया है जिसे न जानना कठिन है।

हमारी नजर में यही सीपीआई(एम) के वर्तमान बोधोदय का गर्भितार्थ है।

सत्य की देर की कीमत

सत्य कई बार किसी नई खोज की तरह सामने नहीं आता। वह हमारी पुरानी मान्यता के टिके रहने की संभावना को समाप्त करके भी सामने आता है। जिस विचार के साथ वर्षों तक चला जा सकता था, एक बिंदु पर उसी के साथ आगे चलना असंभव हो जाता है।

इसीलिए हम इसे ‘देर आयद, दुरुस्त आयद’ कहकर संतुष्ट नहीं होना चाहेंगे। इस मुहावरे में देर की राजनीतिक कीमत छिप जाती है।

सीपीआई(एम) का यह बोधोदय तब हुआ है जब जिस खतरे को सिद्धांततः पहले से जाना जाता था, वह बंगाल में ठोस राजसत्ता का रूप ले चुका है। यही राजसत्तावादी राजनीति की गहरी विडंबना है। वह किसी शक्ति के सत्य को कई बार उसके सत्ता में प्रकट होने के बाद पहचानती है। जब तक वह शक्ति सत्ता की ओर बढ़ती रहती है, उसे दूसरे प्रतिद्वंद्वियों के बीच एक और शक्ति मानकर उसके बारे में चुनावी अंकगणित चलता रहता है। लेकिन जब वही शक्ति राज्य पर अधिकार कर लेती है, तब उसके विशिष्ट चरित्र का सत्य अचानक प्रत्यक्ष हो जाता है।

सत्ता इस सत्य को पैदा नहीं करती; वह उससे आँख चुराकर जीने की गुंजाइश समाप्त कर देती है।

इस अर्थ में राजनीति में सत्य का बोध कई बार असत्य के राज्य की स्थापना की कीमत पर होता है। सत्य तब अधिक साफ दिखाई देता है, लेकिन उसे बदलने की राजनीतिक कीमत भी कई गुना बढ़ चुकी होती है।

इसलिए सीपीआई(एम) के वर्तमान बोधोदय पर हमारा प्रश्न सिर्फ यह नहीं है कि देर से सही, उसने सत्य को पहचान लिया। प्रश्न यह है—क्या किसी राजनीतिक सत्य को पहचानने के लिए पहले उसका राज्य बन जाना जरूरी था?

यदि ऐसा है तो यह केवल एक गलत राजनीतिक लाइन की समस्या नहीं है। यह उस राजसत्तावादी दृष्टि की विडंबना है जो राजनीतिक संभावनाओं को उनके जन्म के समय नहीं, सत्ता में उनके पर्यवसान के बाद पहचानती है।

प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी

यही विडंबना पार्टी-प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी के स्तर पर और विकट रूप ग्रहण करती है। पार्टी जिस सत्य को अपने राजनीतिक विन्यास में जगह नहीं दे पाती, उसके प्रति प्रतिबद्ध बुद्धिजीवी भी प्रायः अंधा हो जाता है।

उसके पास ज्ञान या विवेक की कमी है, यह जरूरी नहीं है। समस्या यह है कि घटना और उसके विवेक के बीच पार्टी की पहले से निर्मित व्याख्या खड़ी होती है। कई बार सब जानकर भी वह चुप्पी ओढ़ लेता है।

तब वह घटना से सवाल नहीं करता; घटना में पार्टी की स्वीकृत समझ की पुष्टि खोजता है। प्रतिबद्धता सत्य के प्रति निष्ठा के बजाय उपलब्ध ज्ञान के प्रति निष्ठा बन जाती है।

जबकि बुद्धिजीवी का काम पार्टी की स्थापित समझ को प्रमाणित करना नहीं, जरूरत पड़ने पर उसे अस्थिर करना भी है। अन्यथा उसकी आलोचनात्मक दृष्टि पार्टी की राजनीतिक दृष्टि की प्रतिलिपि बन जाती है। और तब जिस सत्य को विचार के स्तर पर पहले पहचाना जा सकता था, उसे इतिहास अपने सबसे निर्मम रूप में स्थापित करके दिखाता है।

इसीलिए बुद्धिजीवी की वास्तविक प्रतिबद्धता किसी पार्टी की अचूकता के प्रति नहीं, सत्य की उस संभावना के प्रति होनी चाहिए जो उसकी अपनी पार्टी को भी गलत सिद्ध कर सकती है। ऐसे बुद्धिजीवी पार्टी के लिए असुविधाजनक हो सकते हैं, लेकिन वही उसे इतिहास के हाथों मिलने वाली कहीं अधिक महँगी शिक्षा से बचा सकते हैं।

‘प्रमुख शत्रु’ के बाद क्या?

किसी पुरानी राजनीति का असंभव हो जाना अपने-आप नई राजनीति पैदा नहीं करता। ‘प्रमुख शत्रु’ की पहचान का अर्थ केवल भाजपा पर तृणमूल की अपेक्षा अधिक हमले करना नहीं हो सकता। इसका अर्थ समाज के राजनीतिक अंतर्विरोधों की पुनर्समीक्षा और उनकी प्राथमिकताओं का निर्धारण है।

तृणमूल के साथ सीपीआई(एम) के संघर्ष समाप्त नहीं होंगे। उसके भ्रष्टाचार, राजनीतिक दमन और शासन के पुराने अनुभवों को भुलाने का सवाल भी नहीं है। लेकिन यदि भाजपा प्रमुख शत्रु है तो तृणमूल और भाजपा के साथ अंतर्विरोधों को एक ही राजनीतिक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यहीं ‘समान दूरी’ की भाषा अपनी सीमा पर पहुँच जाती है।

राजनीति ज्यामिति नहीं है। राजनीतिक स्वतंत्रता का अर्थ सबसे समान दूरी बनाए रखना नहीं, बल्कि परिस्थिति का स्वतंत्र मूल्यांकन करते हुए मित्र, सहयोगी, प्रतिद्वंद्वी और प्रमुख शत्रु के बीच फर्क करने की क्षमता है। ‘समान दूरी’ कई बार स्वतंत्रता का प्रमाण नहीं, राजनीतिक निर्णय से बचने का सुविधाजनक तरीका भी हो सकती है।

चुनावी राजनीति समाज को वोट प्रतिशत में बाँटती है—इतने भाजपा के, इतने तृणमूल के, इतने वाम के। लेकिन कोई समाज अपने चुनाव परिणाम के बराबर नहीं होता। वह हमेशा उससे बड़ा होता है।

एक ही मतदाता अलग-अलग प्रश्नों पर अलग-अलग सामूहिकताओं का अंग हो सकता है। मजदूर रोजगार के प्रश्न पर, किसान जमीन पर, विद्यार्थी शिक्षा और बेरोजगारी पर, अल्पसंख्यक नागरिकता और सुरक्षा पर, लेखक-बुद्धिजीवी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर और सामान्य नागरिक लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रश्न पर एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं। सरकारी सामाजिक योजनाओं के लाभार्थियों के अपने हित हैं; प्रतिशोधमूलक कार्रवाइयों से नाराज तबके के अपने अनुभव हैं। इन सबके बीच लोकतंत्र की रक्षा का साझा धरातल बनाया जा सकता है।

राजनीति का काम इन्हीं बिखरी हुई संभावनाओं को राजनीतिक शक्ति में बदलना है। जाहिर है, इसमें ऐसी शक्तियाँ भी शामिल हो सकती हैं जिनसे वाम के गंभीर मतभेद हों। ‘प्रमुख शत्रु’ का अर्थ ही है कि सारे अंतर्विरोध समान नहीं होते। किसी के साथ संघर्ष और किसी प्रश्न पर सीमित सहयोग एक ही समय संभव है। राजनीति की परिपक्वता इसी में है कि वह सहयोग को आत्मसमर्पण और मतभेद को समान शत्रुता न समझे।

इसलिए सीपीआई(एम) के सामने असली प्रश्न केवल अपना पुराना वोट प्रतिशत वापस पाने का नहीं है। वह जरूरी हो सकता है, पर्याप्त नहीं। सवाल है कि क्या वह भाजपा की सत्ता के विरुद्ध समाज में मौजूद विभिन्न प्रतिरोधों को एक व्यापक लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रक्रिया में जोड़ सकती है।

सीपीआई(एम) ने अपनी पुरानी राजनीति की सीमा पहचानी है। सीपीआई(एम) ने अपनी पुरानी राजनीति की सीमा पहचानी है। कहीं न कहीं यह सीमा भी उसे अपने उस काल की विरासत से ही मिली है जब केन्द्र में यूपीए सरकार से समर्थन वापस लिया गया था । बहरहाल,अब नई राजनीति तब शुरू होगी जब वह इस नकारात्मक ज्ञान से कोई सकारात्मक राजनीतिक प्रक्रिया पैदा करेगी।

इसी में ‘असंभव की शक्ति’ का गहरा राजनीतिक अर्थ निहित है। राजनीति में असंभव कई बार पुराने रास्ते को बंद करके वह जगह खाली करता है जहाँ से नई संभावना पैदा की जा सकती है।

बंगाल में सीपीआई(एम) के सामने आज यही खाली जगह है।

पुरानी राजनीति का असंभव हो जाना नई राजनीति की गारंटी नहीं है। उस असंभव से पैदा हुई संभावना को वास्तविक शक्ति में बदलना ही राजनीति है।

लेखक साहित्यकार और पोलिटिकल कमेंटेटर हैं।

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