जब रिश्ते में दोस्ती घुल जाए…
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कृष्ण-अर्जुन से सीखिए रिश्तों को जीने का हुनर
डॉ रीटा अरोड़ा
जब रिश्ते में दोस्ती घुल जाए… कृष्ण-अर्जुन से सीखिए रिश्तों को जीने का हुनर
“माँ, एक बात कहूँ… आप नाराज़ तो नहीं होंगी?”
“पहले कहो तो सही।”
“डर लगता है कि आप मुझे समझेंगी नहीं।”
माँ ने उसका हाथ थाम लिया- “अगर अपनी बात कहने से पहले तुम्हें मेरे नाराज़ होने का डर है, तो मुझे सोचना होगा… मैं तुम्हारी माँ तो हूँ, लेकिन क्या तुम्हारी दोस्त भी हूँ?”
बेटा चुप रहा। शायद माँ के सवाल में ही उसके कई सवालों के जवाब छिपे थे।
हम सभी के पास रिश्ते हैं। कुछ जन्म से मिले हैं, कुछ विवाह से जुड़े हैं और कुछ समय के साथ हमारे जीवन का हिस्सा बन गए। फिर भी न जाने क्यों, आज मन की बात कहने के लिए इंसान को किसी अपने की तलाश रहती है।
रिश्ते बहुत हैं, लेकिन क्या उनमें दोस्ती है?
यही वह सवाल है, जो शायद हमें अपने हर रिश्ते से पूछना चाहिए।
रिश्तेदारी अपने आप मिल जाती है, मित्रता अर्जित करनी पड़ती है। रिश्ते हमें एक-दूसरे से जोड़ते हैं, लेकिन मित्रता उन रिश्तों में वह सहजता भरती है, जिसमें हम बिना डरे अपने मन की बात कह सकें।
महाभारत में कृष्ण और अर्जुन का संबंध इसी खूबसूरत बदलाव का उदाहरण है। वे रिश्तेदार थे, लेकिन उनका रिश्ता केवल रिश्तेदारी तक सीमित नहीं रहा। उसमें मित्रता का विश्वास इतना गहरा था कि अर्जुन अपने जीवन के सबसे कठिन क्षण में कृष्ण के सामने अपनी कमजोरी स्वीकार कर सका।
कुरुक्षेत्र में अर्जुन के हाथ से गांडीव छूट रहा था। सामने अपने ही लोग थे। मन में द्वंद्व था। वह युद्ध से पीछे हटना चाहता था। लेकिन उसने अपनी उलझन छिपाई नहीं। उसने कृष्ण से प्रश्न किए, अपनी शंकाएँ रखीं, अपने मन का भय सामने रखा।
और कृष्ण ने क्या किया?
उन्होंने अर्जुन को चुप नहीं कराया।
उन्होंने यह नहीं कहा- “तुम योद्धा हो, तुम्हें डरना नहीं चाहिए।”
उन्होंने उसके प्रश्नों को सुना और संवाद के माध्यम से उसकी उलझन को समझने का रास्ता दिया।
यही तो मित्रता है!
मित्र वह नहीं जो हर बात पर हमारी हाँ में हाँ मिलाए। मित्र वह है जिसके सामने हम अपनी ‘ना’ भी कह सकें।
आज हमारे परिवारों को इसी मित्रता की सबसे अधिक जरूरत है।
माता-पिता अक्सर शिकायत करते हैं- “बच्चे हमसे कुछ बताते ही नहीं।” लेकिन कभी यह भी सोचिए कि बच्चा अपनी बात कहने से पहले इतना क्यों सोचता है? क्या उसे डर है कि उसकी बात सुनते ही उसे डाँट मिलेगी, तुलना होगी या कोई फैसला सुना दिया जाएगा?
बच्चों को हमेशा सलाह देने वाला माता-पिता नहीं चाहिए। कभी-कभी उन्हें केवल ऐसा माता-पिता चाहिए जो उनकी बात पूरी होने तक चुपचाप सुन सके।
पति-पत्नी के रिश्ते में भी यही बात लागू होती है। विवाह दो लोगों को साथ रहने का अधिकार तो देता है, लेकिन मन तक पहुँचने का अधिकार अपने आप नहीं देता। उसके लिए विश्वास बनाना पड़ता है। यदि हर बातचीत बहस बन जाए, हर असहमति आरोप बन जाए और हर गलती पुराने हिसाब-किताब की किताब खोल दे, तो रिश्ता धीरे-धीरे संवाद खो देता है।
इसके विपरीत, जहाँ पति-पत्नी एक-दूसरे के मित्र बन पाते हैं, वहाँ शिकायत भी कही जा सकती है और असहमति भी सुनी जा सकती है।
मित्रता का अर्थ यह नहीं कि सामने वाला हमारी हर बात स्वीकार करे। उसका अर्थ है- वह हमारी बात सुने, समझे और असहमति में भी हमारा सम्मान बनाए रखे।
भाई-बहन के रिश्ते में भी यही गर्माहट आ सकती है। उम्र बढ़ने के साथ रिश्ते औपचारिक न हों, बल्कि एक-दूसरे के सुख-दुख के साथी बनें। बुजुर्ग माता-पिता के लिए भी बच्चों का मित्रवत व्यवहार उन्हें केवल सहारा नहीं देता, बल्कि यह एहसास देता है कि वे परिवार में आज भी महत्वपूर्ण हैं।
दरअसल, रिश्ते केवल खून से नहीं चलते।
खून, रिश्ता बना सकता है, लेकिन विश्वास, उसे जीवित रखता है।
कृष्ण और अर्जुन हमें यही सिखाते हैं कि किसी रिश्ते को महान बनाने के लिए उसका नाम महत्वपूर्ण नहीं, उसकी गहराई महत्वपूर्ण है।
इसलिए आज घर लौटकर जरा अपने रिश्तों को टटोलिए।
क्या आपका बच्चा आपसे बिना डरे अपनी गलती बता सकता है?
क्या आपका जीवनसाथी आपके सामने अपनी असहमति रख सकता है?
क्या आपका भाई या बहन अपनी परेशानी लेकर आपके पास आ सकता है?
और सबसे बड़ा सवाल-
क्या आपके अपने आपको आपके सामने स्वयं होने की आजादी है?
अगर इन सवालों के जवाब ‘हाँ’ हैं, तो शायद आपने रिश्तेदारी को मैत्री में बदलना सीख लिया है।
और यदि जवाब ‘नहीं’ है, तो शायद रिश्ता खत्म करने की नहीं… रिश्ते में दोस्ती शुरू करने की जरूरत है।
~डॉ रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल
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