सामाजिक सरोकार
द एंटी-बकेट लिस्ट: हर चीज़ चाहने की मजबूरी से मुक्ति
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जब ‘सब कुछ पाने’ की दौड़ थका दे, तब ‘कुछ छोड़ देने’ का साहस ही सच्ची आज़ादी बन जाता है
डॉ रीटा अरोड़ा
“शर्मा जी, आपकी यूरोप यात्रा कैसी रही?” पार्क में टहलते हुए वर्मा जी ने पूछा।
शर्मा जी मुस्कुराए, लेकिन वह मुस्कान आँखों तक नहीं पहुँची।
“अच्छी थी।”
“अब अगला प्लान क्या है?”
“शायद जापान।”
“फिर?”
कुछ पल चुप रहकर शर्मा जी बोले, “पता नहीं वर्मा जी, जितनी जगहें देख रहा हूँ, उतना ही लग रहा है कि कुछ और देखना बाकी है।”
वर्मा जी हँस पड़े। बोले, “मुझे तो लगता है कि दुनिया देखने से पहले आदमी को अपने मन को देख लेना चाहिए।”
दोनों आगे बढ़ गए। लेकिन यह बातचीत आज के समय की एक गहरी सच्चाई को उजागर करती है। हम पहले से अधिक अनुभव जुटा रहे हैं, लेकिन शायद पहले से कम संतुष्ट हैं।

आजकल एक शब्द बहुत लोकप्रिय है – बकेट लिस्ट।
मरने से पहले क्या-क्या करना है, कहाँ-कहाँ घूमना है, क्या-क्या हासिल करना है, इसकी लंबी सूची।
सुनने में यह विचार बहुत आकर्षक लगता है। लेकिन धीरे-धीरे यह सूची प्रेरणा से ज्यादा दबाव बनने लगी है।
सोशल मीडिया ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है।
कोई पहाड़ की चोटी पर खड़ा है। कोई समुद्र के बीच छुट्टियाँ मना रहा है। कोई दुनिया के पचासवें देश की यात्रा का जश्न मना रहा है। स्क्रीन पर सब कुछ चमकदार दिखता है। और हम अनजाने में अपनी जिंदगी को उनके पैमाने से मापने लगते हैं।
फिर मन में एक आवाज़ उठती है – “मैं क्या मिस कर रहा हूँ?”
यहीं से शुरू होता है FOMO – यानी कुछ छूट जाने का डर।
यह डर बड़ा अजीब होता है। यह हमें उन चीज़ों के पीछे भी दौड़ाता है जिनकी हमें वास्तव में चाहत नहीं होती। हम अनुभवों को जीने के बजाय इकट्ठा करने लगते हैं। हम किसी जगह की सुंदरता महसूस करने के बजाय वहाँ फोटो खिंचवाने की चिंता करने लगते हैं। हम वर्तमान में रहने के बजाय अगली उपलब्धि की तैयारी में लगे रहते हैं। धीरे-धीरे जीवन एक यात्रा कम और एक चेकलिस्ट ज्यादा बन जाता है।
यहीं पर “एंटी-बकेट लिस्ट” का विचार राहत की तरह सामने आता है। यह उन चीज़ों की सूची नहीं है जो आपको करनी हैं। यह उन चीज़ों की सूची है जिन्हें आप करने के लिए मजबूर नहीं हैं। यह एक घोषणा है कि हर लोकप्रिय अनुभव आपके लिए जरूरी नहीं है। हर सपना आपका सपना नहीं है। हर दौड़ में भाग लेना आपकी जिम्मेदारी नहीं है।
पुराने समय में लोगों के पास बकेट लिस्ट नहीं होती थी। फिर भी वे जीवन जीते थे। गाँव की चौपाल में बैठकर घंटों बातें करना, बरामदे में चारपाई पर लेटकर तारों को देखना, परिवार के साथ बिना किसी जल्दबाज़ी के खाना खाना – ये सब भी जीवन के अनुभव थे।
आज हम दुनिया देखने निकले हैं, लेकिन कई बार अपने आसपास की दुनिया देखना भूल गए हैं।
एंटी-बकेट लिस्ट हमें यही याद दिलाती है कि जीवन की सबसे मूल्यवान चीज़ें अक्सर मुफ्त होती हैं।
एक शांत शाम।
एक सच्ची दोस्ती।
एक किताब।
एक लंबी बातचीत।
एक खाली दोपहर।
और कभी-कभी कुछ न करना भी।
समस्या यह नहीं कि हम सपने देखते हैं।
समस्या तब शुरू होती है जब हम अपनी खुशी को उन सपनों की पूर्ति पर टिका देते हैं।
हम सोचते हैं –
जब वह नौकरी मिलेगी तब खुश होंगे।
जब वह कार आएगी तब खुश होंगे।
जब वह यात्रा पूरी होगी तब खुश होंगे।
लेकिन जीवन बार-बार साबित करता है कि मंजिल पर पहुँचकर भी मन कुछ नया ढूँढने लगता है।
इसे मनोवैज्ञानिक “हेडोनिक ट्रेडमिल” कहते हैं।
हम दौड़ते रहते हैं।
मंजिल बदलती रहती है।
लेकिन संतोष वहीं का वहीं खड़ा रहता है।
शायद इसलिए आज का सबसे बड़ा साहस कुछ नया हासिल करना नहीं, बल्कि यह स्वीकार करना है कि सब कुछ हासिल करना जरूरी नहीं।
यही FOMO से JOMO की यात्रा है। JOMO – यानी कुछ छूट जाने का आनंद।
