स्वाभिमान का पर्व: संविधान और क्रांति का आह्वान

आज़ादी की 80वीं वर्षगांठ के अवसर पर देश के अमर शहीदों, क्रांतिवीरों और संविधान

निर्माताओं के सपनों, समता और स्वाभिमान को नमन करता एक क्रांतिकारी गीत

स्वाभिमान का पर्व: संविधान

और क्रांति का आह्वान

नरसिंह कुमार ‘मयूर’

 

उठो कि आज़ादी के अस्सी बरस पुकारते,
शहीदों के सपने तुम्हें बार-बार निहारते।

जिस माटी को सींचा था लहू से वीरों ने,
उसे फिर से संवारना है संविधान की धार से॥

भगत, बिस्मिल और अशफ़ाक़ की वो ज्वाला याद करो,
आज़ादी के पन्नों में दर्ज़ वो हुंकार याद करो।

न कोई ऊँच, न नीच का भेद जहाँ होगा,
अंबेडकर के शब्दों का वो इंक़लाब याद करो।

न्याय, समता और बंधुत्व की जो नींव धरी थी,
जिसकी ख़ातिर वीरों ने हर यातना सही थी।

उस तिरंगे की शान को झुकने न देंगे हम,
नफ़रत और संकीर्णता को रुकने न देंगे हम॥

यह देश किसी की मनमर्ज़ी से नहीं चलेगा,
विधान की ज्योति से ही हर अंधियारा ढलेगा।

रोटी, कपड़ा, मकान और हक़ हर इंसान का,
यही तो सपना था भारत माता के हर लाल का।

शोषित, पीड़ित और वंचित को जो अधिकार दिलाए,
आओ मिलकर फिर वही चेतना और अलख जगाएँ।

ज़ुल्म के आगे जो सिर न झुके, वो स्वाभिमान बने,
हर जन-जन का जीवन सच्चा लोकतंत्र बने॥

सपनों का वो भारत फिर से हम गढ़ पाएँगे,
सच्ची आज़ादी के पथ पर आगे बढ़ते जाएँगे॥

जय भारत! जय संविधान! जय क्रांति का नारा हो,
हर कोने में इंसानियत का ही उजियारा हो।
जय हो! जय हो! जय हो!
विजय हो!

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