चीन और शी जिनपिंग की जीत और अमेरिका और डोनाल्ड ट्रंप की हार
मुनेश त्यागी
पिछले कई दिनों से सोशल मीडिया पर यह खबर जोरदार तरीके से छाई हुई थी कि चीन और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की इमेज यानि छवि, दुनिया भर में रोशन होती जा रही है। अब यह बात प्रिंट मीडिया में भी आ गई है। “पीयू” रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट के अनुसार पहले दुनिया, चीन के मुकाबले अमेरिका के पक्ष में खड़ी थी, मगर इस वर्ष दुनिया की यह राय चीन के पक्ष में चली गई है और आज दुनिया के लोग चीन के बारे में सकारात्मक रूप से सोच रहे हैं। यह बेहद खास बदलाव ट्रंप प्रशासन और अमेरिकी सहयोगियों के बीच बढ़ते जा रहे तनाव के कारण हुआ है।
जिन देशों में सर्वे किया गया है, वहां पता चला है कि वहां के अधिकांश लोग यानी 36 देशों में से 24 देश, कनाडा और मेक्सिको समेत, चीन के समर्थक हैं। यह पोल इसी साल फरवरी से मई किया गया था। जब अमेरिका और इजरायल ने इराक पर हमले किए थे। यह भी खास जानकारी आई है कि 36 में से 22 देशों के लोगों के विचार, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पक्ष में है और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विरोध में है। कनाडा, मेक्सिको और यूरोपीय देशों जैसे फ्रांस, जर्मनी और इंग्लैंड के लोगों के भी यही विचार हैं।
पीयू की सहायक निरीक्षक लोरा सिल्वर के अनुसार यह तथ्य पिछले 20 वर्षों में सामने आया है कि वैश्विक मत के अनुसार चीन को अमेरिका के मुकाबले में ज्यादा सकारात्मक रूप से देखा जा रहा है। यह परिवर्तन कोविड-19 के दौर में शुरू हुआ था। यह दूरी इस वजह से भी बढ़ रही है कि अमेरिका का वैश्विक शांति और स्थायित्व में बहुत कम सहयोग रहा है और लोगों का ट्रंप में विश्वास कम हो गया है। ट्रंप की ग्रीनलैंड कब्जाने की और वेनेजुएला पर अमेरिकी सैन्य हमला और राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की मनमानी गिरफ्तारी और गजा में इजराइल-हमास पर अमेरिकी नियंत्रण के कारण
अमेरिकी साख गिरती जा रही है। विभिन्न देशों में अमेरिकी दखलअंदाजी जो वर्षों से जारी है, उसको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक रूप से स्वीकार नहीं किया जा रहा है।
दूसरी ओर वाशिंगटन में चीनी दूतावास का कहना है कि वर्तमान पोल दिखा रहे हैं कि चीनी सरकार/व्यवस्था की उपलब्धियां और विकासशील प्रगति को पूरी दुनिया में स्वीकार किया गया है। मुख्य रूप से अमेरिकी समर्थित देश जैसे कनाडा ने अपने अमेरिकी रुख में बड़ा बदलाव किया है। वहां अमेरिकी समर्थन 57% से घटकर 33% पर आ गया है जबकि तीन के पक्ष में यह समर्थन 14% से बढ़कर 44% पर पहुंच गया है। ब्रिटेन में अमेरिकी समर्थन घटा है और चीनी समर्थन में इजाफा हुआ है। इजराइल, जापान, भारत, दक्षिणी कोरिया, फिलीपींस और पोलैंड में अमेरिका के पक्ष में समर्थन बढा है।
खुशी की बात है कि चीन के नेतृत्व में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस समूह में रूस समेत 29 देश शामिल हो गए हैं। इनमें मुख्य रूप से शामिल देश कजाखिस्तान, इंडोनेशिया, पाकिस्तान, लाओस शामिल हैं। इस अभियान में इन देशों के प्रतिनिधियों ने शंघाई में दस्तक कर दिए हैं।
इसी के साथ साथ, अमेरिका की गिरती साख में दूसरे कारण भी हो सकते हैं जैसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने 72 से ज्यादा देशों में सैनिक हमले और हस्तक्षेप किए हैं और 4 करोड़ से ज्यादा लोगों की हत्या कर दी है। उसका अंतरराष्ट्रीय कानून व्यवस्था में, यूएनओ के सिद्धांतों में कोई विश्वास नहीं है। वह अपनी मनमानी करके अपने वैश्विक वर्चस्व को बनाए रखना चाहता है और पूरी दुनिया पर अपना कब्जा करना चाहता है। अब दुनिया के लोग अमेरिका की इस वैश्विक वर्चस्ववादी और दुनिया के प्राकृतिक संसाधनों पर अवैध और मनमाना कब्जा करने की, मनमानी नीतियों की वजह से लोग, अमेरिका के खिलाफ होते जा रहे हैं।
इसके अतिरिक्त पूरी दुनिया देख रही है कि अमेरिका का जनतंत्र के बुनियादी मूल्यों में कोई विश्वास नहीं है। वहां की पूंजीवादी शोषणकारी और मुनाफाखोर व्यवस्था ने जनतंत्र को अपना गुलाम बना लिया है अब वह “धनतंत्र” में बदल दिया गया है। अब वह पूरी दुनिया में अवैध और चोरी छिपे तरीकों से जातिवादी, क्षेत्रीयतावादी और सांप्रदायिक ताकतों को बढ़ावा देकर, जनता की एकता तोड़ रहा है, जनता के जनवादी, प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष संघर्षों को कमजोर कर रहा है और वह वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था और किसानों मजदूरों की सरकार की स्थापना से पूरी तरह से डरा हुआ है।
इन सब कारणों से जनता धीरे-धीरे अमेरिकी वर्चस्व से नाराज और परेशान होती जा रही है। इसी कारण अमेरिकी सोच और व्यवस्था को लोग पसंद नहीं कर रहे हैं और धीरे-धीरे वैज्ञानिक समाजवादी व्यवस्था वाले चीन की ओर मुख मोड़ रहे हैं। दुनिया भर की साम्यवादी ताकतों और सोच की ताकतों के लिए और वैश्विक जनकल्याण, सुरक्षा और शांति के लिए जनता का शोषणकारी, वैश्विक वर्चस्ववादी और युध्दोन्मादी अमेरिका से दूर हटना, बेहद जरूरी और स्वागत योग्य रुझान और कदम है। दुनिया की जनता की सकारात्मक सोच को बहुत बहुत बधाईयां।
हम तो यही कहेंगे…
