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बादशाह का कमरा – राजेश भारती
बादशाह का कमरा
बहुत बड़ा है
बड़े होने के बावजूद
बादशाह समा नहीं पा रहा है
उसका घमंड आड़े आ रहा है
और सच
दरवाज़े से ही वापिस जा रहा है
कमरे में सब कुछ है
महंगे पर्दे, मख़मली गद्दे
सोने से मढ़ी दीवारें
झूठ की खुशबू से भरे फ़ूल
पर सच कहीं नही है
यहाँ सिर्फ़ चाटुकार आते हैं,
चापलूसी के मंत्र
फूँकते हैं बादशाह के कानों में
आँखों पर विकास की धूल झोंकते हैं
यहाँ औरतें भी आती हैं
गाती हैं,
नाचती हैं,
अपनी मजबूरी छिपाकर
मुस्कान का बोझ उठाती हैं
बादशाह खुश होता है
उसका गदराया जिस्म पाकर
बादशाह के कमरे में दर्पण नहीं है
क्योंकि दर्पण सवाल करता है,
और सवाल
सत्ता को पसंद नहीं
यहाँ फरमान हैं,
फतवे हैं,
गुलामी के दस्तावेज़ हैं
इतिहास के नाम पर
लिखी जा रही
आने वाली खामोशियाँ हैं
कमरे में रौनक़ है,
ऐशोआराम है
और इसी चमक में
बादशाह को लगता है
कि दुनिया भी
इसी रोशनी में नहा रही होगी
लेकिन बाहर
भूख है,
बेबसियों की लंबी कतार है
बीमारियों की ठंडी साँस है
और मौत
धीरे-धीरे
हर दरवाज़े पर दस्तक दे रही है
बाहर लोग
अब भी जी रहे हैं
या शायद
मरने को जीना कह रहे हैं
और सब कुछ
अब भी
बादशाह की मेहरबानी पर टिका है।
