सांस्कृतिक रूप से पिछड़े, जातिवादी, सामंती, पुरुष-प्रधान समाज में स्त्री का संघर्ष कितना विकट और दुष्कर है, यह हम सब रोज़ाना देखते हैं, पढ़ते हैं, अच्छी तरह जानते-समझ सकते हैं। आज भी दूर दराज के खेत, जंगल और देहात के क्षेत्रों में यह संकट अकेली-दुकेली महिलाओं के साथ रोज़ घटित होता है। कई बार वह बच जाती हैं, कई बार रेप के बाद मौत के घाट उतार दी जाती हैं। परंतु वरिष्ठ कहानीकार ओमसिंह अशफ़ाक की यहां प्रस्तुत कहानी ‘लड़कियां और शोहदे’ उच्च शिक्षा के केंद्र- विश्वविद्यालय में घटित एक ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण वास्तविक घटना पर आधारित वृतांत है जोकि सबको सोचने पर मजबूर कर देता है : संपादक।
कहानी
लड़कियाँ और शोहदे
ओमसिंह अशफ़ाक
अक्टूबर, 1988 की 31 तारीख। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय परिसर में औसत से अधिक चहल-पहल। लड़के-लड़कियां अतिरिक्त उत्साह में हैं। मौसम खुशगवार है। खुशी भी क्यों न हो? कल हरियाणा दिवस जो है। सन् 1966 की पहली नवंबर को हरियाणा राज्य का उदय हुआ था। इसी खुशी में प्रतिवर्ष एक नवंबर को छात्र-छात्राओं की छुट्टी रहती है। स्कूल, कालेज बंद रहते हैं। विश्वविद्यालय के आडिटोरियम में शाम को एक रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होना है। अतिथि सोवियत-कलाकारों एवं कसरतबाजों के हैरतअंगेज करतबों की कल्पना ने इस बार खुशी को और अधिक बढ़ा दिया है। बच्चे-बूढ़े, छात्र-शिक्षक महिला-पुरुष सभी अपनी-अपनी रुचियों और शौक के मुताबिक सांस्कृतिक कार्यक्रम को देखने की योजना अपने दिमागों ओर परिवारों में बना रहे हैं। देर रात तक लौटेंगे इसलिए खाना पकाने, खाने अथवा रख छोड़ने की व्यवस्थाएं की जा रही हैं।
छात्रावासों की लड़कियाँ दुविधा में हैं। कुछ का विचार है कि हर वर्ष की तरह विश्वविद्यालय की बसें-मोटरें उन्हें कार्यक्रम दिखाने ले जाएंगी। लेकिन कुछ लड़कियों का कहना है कि इस बार विश्वविद्यालय प्रशासन ने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की है। आखिर पूर्व घोषित सांस्कृतिक कार्यक्रम का निर्धारित समय निकट आ पहुंचा है। संदेह वास्तविकता में बदल गया है। कोई वाहन लड़कियों के लिए नहीं आया लेकिन यह संदेश जरूर आया है कि जो छात्राएं सांस्कृतिक कार्यक्रम में जाना चाहें, जा सकती हैं। अनेक लड़कियाँ मन-मसोसकर रह गई हैं। उन्हें अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर अंदेशा है कि थोड़ा बहुत हुड़दंग वहां जरूर होता है। लेकिन वाहन और सुरक्षा व्यवस्था के बिना वहां जाना-आना उन्हें असुरक्षित महसूस होता है। विवशतावश इसी उधेड़बुन में बहुत सी लड़कियाँ कार्यक्रम देखने का इरादा छोड़ देती हैं। पर कुछ नई तथा अति उत्साही लड़कियाँ लोभ संवरण नहीं कर पाती हैं। वे हिम्मत जुटाकर आडिटोरियम पहुंच जाती हैं।
सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुआ है। रूसी बैले (नृत्य-नाटक) देखकर कुछ उदंड-उजड्ड युवक सीटियां बजाते हैं, कुछ शराब के नशे में धुत हैं। कहकहे लगाते हैं, फब्तियां कसते हैं ओर कुछ तो दुस्साहस करके स्टेज पर ही चढ़ जाते हैं। हाल के अंदर बैठी लड़कियां खिन्न हैं, मन ही मन कुढ़ती हैं। विवश हैं, कुछ कर नहीं सकती हैं- आखिर यह कौन सी संस्कृति है ? आप किसी चीज़ को देखने से बाज नहीं आते हैं और शालीनता से उसे देख भी नहीं सकते हैं? इतना जल्दी, इतने अभद्र और उग्र हो जाते हैं। शिष्टाचार और शालीनता की सारी मर्यादाएं लांघ जाते हैं कि सभ्यता भी शर्माने लगती है। जैसे-तैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम संपन्न होता है।
हाल के दरवाजे खुलते हैं। सबसे पहले वहीं उदंड ‘शोहदे’ दरवाजों को घेर लेते हैं। लड़कियां दूसरी दिशा के निकास द्वारों से निकलने का प्रयास करती हैं। कई प्रकार की बद्तमीजियां झेलती हुईं किसी तरह बाहर निकल जाती हैं। हाल की स्टेज के पीछे वाली दीवार के साथ से सुरक्षित निकल जाना चाहती हैं लेकिन वहां भी गुंडे-बदमाश घात लगाए खड़े हैं। उन्हीं में से कोई सांप-सांप चिल्लाता है।
लड़कियां भयभीत होकर इधर-उधर छितर कर अंधेरे रास्तों पर दौड़ने लगती हैं, किसी तरह इज्ज़त बचाकर यथाशीघ्र अपने छात्रावासों में पहुंच जाना चाहती हैं। लेकिन गुंडे उनमें से कइयों को दबोच लेते हैं, कपड़े फाड़ डालते हैं। हद दर्जे की बदसलूकी और अमानुषिकता से पेश आते हैं। कोई वहां लड़कियों की सहायता के लिए उपलब्ध नहीं है। क्योंकि सुरक्षा की कोई व्यवस्था की ही नहीं की गई है। ज्यादातर दर्शक हाल के दूसरे दरवाजे से निकलकर मुख्य सड़क पर जा चुके हैं। एक भरे पूरे शहर के बीच शिक्षा के उच्च केंद्र की चारदीवारी में सरेआम जंगल राज कायम हो गया है ? इतना कुछ सह चुकी, भुगत चुकी लडकियां बदहवास होकर निरंतर छात्रावासों की तरफ दौड़ रही हैं। लेकिन मुख्य सड़क पर भी कई जगह ऐसे ह बदमाश’ छुपे खड़े हैं, वहां फिर हमला होता है लेकिन कार्यक्रम देखकर लौट रहे कुछ प्राध्यापक परिवार मौके पर पहुंच जाते हैं तो गुंडे अंधेरे में इधर-उधर दुबक जाते हैं। आहत, मर्माहत लड़कियां दौड़ती हांफती किसी तरह छात्रावास पहुंच जाती हैं। उनकी हालात देखकर छात्रावास की शेष लड़कियों में दहशत और हड़कंप मच जाता है।
यह दृश्य देखकर कुछ लड़कियों का खून खौलने लगता है। वे चाहती हैं कि अपराधियों को पहचान कर उन्हें सबक सिखाना चाहिए। उनको सारे समाज के सामने बेनकाब करके कठोर दंड दिलाना चाहिए। लापरवाही के जिम्मेवार अधिकारियों को कठघरे में खड़ा किया जाना चाहिए। ये लड़कियां पीड़ित छात्राओं से हमलावरों का परिचय जानना चाहती हैं। पीड़ित, छात्राओं ने कइयों को पहचान लिया है लेकिन हमारे समाज का पुरुष-प्रधान-सामंती चरित्र यहां आड़े आ जाता है। पीड़ित छात्राएं शोक और चिंता में डूब जाती हैं, उनके सामने गंभीर मुसीबत मुंह बाये खड़ी है। अपराधी तत्वों में कई तो विश्वविद्यालय के ‘भूतपूर्व छात्र नेता’ हैं। उनकी चौधराहट और छत्रछाया में पलने वाले कई लग्गे- भग्गे भी हमले में शामिल थे।
लड़कियां इस तथ्य से बखूबी वाक़िफ हैं कि विश्वविद्यालय प्रशासन तथा कुलपति तक इन शौहदों की पहुंच और प्रभाव है। सत्ताधारी दल का वरदहस्त उन्हें प्राप्त है। ऐसी स्थिति में न्याय की गुंजाइश कितनी रह जाती है ? फिर पुलिस में रपट लिखाकर न्यायपालिका का दरवाज़ा खटखटाना भी हमारे समाज में महिलाओं के लिए अत्यंत दुष्कर कार्य है। अविवाहित लड़कियों के लिए तो यह स्थिति अभिशाप बन जाती है। उनके कैरियर, विवाह और सामाजिक स्थिति पर अत्यंत भौंडे प्रश्नचिह्न लग जाते हैं। निर्दोष-बेदाग होते हुए भी समाज उन्हें घटिया नजरों से देखने लगता है। उनके सच्चरित्र पर ही उंगलियां उठने लगती हैं। बर्बर दुष्चरित्र, हमलावर पुरुष की यहां कोई कैफियत नहीं पूछता है। सबको जुबान पर पीड़ित अभिशप्त महिला का ही नाम होता है। कलंक का टीका उस हमलावर दुष्चरित्र, राक्षस-पुरुष की बजाय पीड़ित-स्त्री के माथे पर मढ़ दिया जाता है। ऐसी विकट स्थिति में सहमी हुई ये लड़कियां सारी रात जागकर बिताती हैं, मन ग्लानि से भर जाता है।
लेकिन सांस्कृतिक कार्यक्रम से अनुपस्थित रही कुछ लड़कियों का हौसला अभी भी टूटा नहीं है। वे हिम्मत हारकर हथियार डालने के लिए तैयार नहीं हैं। अपनी साथिनों की मनःस्थिति वे यथार्थपरक धरातल पर समझ रही हैं। पर वे इस अमानुषिक स्थिति को किसी भी सूरत में कायम नहीं रहने देना चाहती हैं। उनका विचार है कि यदि ज़ुल्म सहकर चुपचाप बैठ गई तो दरिन्दों के हौसले और अधिक बुलंद हो जाएंगे। तब यहां लड़कियों का पढ़ना कितना दुष्कर होगा ? इसकी कल्पना का चित्र उनके मन में कांटे की तरह चुभ रहा है। इन्हीं लड़कियों में एक नाम है-कुमारी ‘शबनम’।
शबनम अपनी सभी सहेलियों को इकट्ठा करती है, उनसे गंभीर विचार-विमर्श करती है। ज़ुल्म को सहकर बैठने के नुकसान और जुल्म के ख़िलाफ़ लड़ने के संभावित खतरे लड़कियों को समझाती है। उनका मनोबल बढ़ाती है कि फिर भी संघर्ष ही अंतिम रास्ता है। वह एम.ए. (शारीरिक शिक्षा) की छात्रा है। खुद अच्छी खिलाड़ी भी है। अंतर्विश्वविद्यालय स्तर तक महिला कबड्डी में खेल चुकी है। परिवार में उसे भाइयों के समान बर्ताव मिला है। उसके पिता ज़रा विस्तृत दृष्टिकोण के व्यक्ति हैं। अपनी चारों बेटियों को कालेज स्तर तक पढ़ा चुके हैं। वह चारों बहनों में बड़ी है। इसी पृष्ठभूमि के कारण वह इस शर्मनाक कांड के विरुद्ध संघर्ष की पहल करने में सक्षम होती है। अपनी छोटी बहन तथा अपनी सहेलियों- कृष्णा, पूनम, ममता आदि से और अपनी कक्षा के विश्वासपात्र नेक लड़कों से इस संघर्ष में मदद का आग्रह करती है। लेकिन कुछ लड़के इस मुकाम पर भी मौकापरस्ती दिखाते हैं। शायद कुछेक के हमलावरों के साथ दोस्ताना संबंध भी है और कुछ उनसे भयभीत हैं। लेकिन शबनम साहस नहीं छोड़ती है।
उसका एक सहपाठी यशवीर संघर्ष के अंतिम पड़ाव तक साथ देने का विश्वास दिलाता है और शबनम को साथ लेकर एस.एफ. आई. नामक छात्र संगठन के सक्रिय छात्रों से संपर्क करता है। ग्यारह सदस्यीय संघर्ष-समिति लड़कियाँ बना लेती हैं तो कुलपति महोदय के ख़ुफ़िया सूत्र सारी जानकारी उन तक पहुंचा देते हैं। कुलपति जी छात्राओं को गच्चा दे जाते हैं। उनसे पूरी हमदर्दी जताते हुए विश्वास दिलाते हैं कि आज ही राज्य के मुख्यमंत्री जो हरियाणा-दिवस के अवसर पर विश्वविद्यालय में पधार रहे हैं, वह उनसे सारे हादसे की रिपोर्ट करेंगे और अपराधियों के खिलाफ सख़्त कानूनी कार्यवाही करवा कर उन्हें कठोर सज़ा दिलवाएंगे। लेकिन मुख्यमंत्री जी कार्यक्रम में शामिल होकर लौट जाते हैं, स्टेज पर एक शब्द भी बीती रात के हादसे के बारे में उनकी जुबान से नहीं सुना गया है।
लड़कियों का संदेह अब यकीन में बदल गया है कि अपराधियों को कुलपति का पूरा संरक्षण प्राप्त है। छात्राओं के तन-बदन में मानों आग लग गई है। उन्हें अपराधी ही नहीं विश्वविद्यालय प्रशासन भी अपना दुश्मन दिखाई देने लगा है। उनमें विद्रोह का भाव भर गया है। वे संघर्ष के लिए कमर कस लेती हैं। इधर कुलपति के चहेते कुछ अधिकारी, कुछ शिक्षक यहां तक कि कुछ महिला-शिक्षिकाएं भी लड़कियों में फूट डालने, बहकाने, डराने, उनकी एकता को तोड़ने के लिए सक्रिय हो गई हैं। परन्तु लड़कियाँ तो जैसे बाग़ी हो गयी हैं। उनमें अनोखी हिम्मत, स्वाभिमान और एकता का संचार हो गया है।
उन्होंने हाथों में डंडे, हाकियाँ और लकड़ियाँ संभाल ली हैं और आठ सौ लड़कियों का जुलूस कुलपति की कोठी की तरफ़ चल पड़ता है। कुलपति के चमचे एवं तथाकथित छात्रनेता एक बार फिर उनके संघर्ष को भीतरघात करने की कोशिश करते हैं। अबकी बार वे लड़कियों को समर्थन देने का छद्म प्रस्ताव लेकर उनके रास्ते में आते हैं लेकिन छात्राओं के कड़वे अनुभवों ने उन्हें अतिरिक्त समझदार बना दिना है। जैसे ही ये नेता प्रस्तावित समर्थन के साथ कुछ शर्तों का जिक्र करते हैं तो लड़कियां तुरन्त उनकी साजिश को भांप लेती हैं और पहले उन्हें ही ‘ठीक कर देने’ का आह्वान जुलूस में गूंजने लगता है। चमचों को वहां से खिसक लेने में ही अपनी सलामती दिखती है और वे वहां से रफ्फूचक्कर हो जाते हैं।
विश्वविद्यालय परिसर और सारे शहर में शर्मनाक-कांड की प्रतिगूंज सुनाई पड़ती है। अगले दिन के सभी प्रमुख समाचारपत्रों में उस हादसे और छात्राओं के संघर्ष की खबरें सुर्खियों में छपती हैं। छात्राएं छेडछाड़ कांड के विरोध में इश्तहार छपवा देती हैं और कुरूक्षेत्र शहर के प्रबुद्ध नागरिक एक सभा बुलाकर 16 सदस्यीय नागरिक-समिति का गठन करके उसे “छेड़छाड़ काँड की जांच और लापरवाही के लिए जिम्मेवार अधिकारियों” का पता लगाने का दायित्व सौंप देते हैं। जनवादी महिला समिति की सैकड़ों औरतें कुलपति के कार्यालय पर छात्राओं के समर्थन में धरना देती हैं। जिला प्रशासन और राज्य सरकार तक खबरें पहुंचती हैं तो सरकार को भी तीन विधायकों की “जांच-समिति” के गठन का एलान करना पड़ता है।
उधर कुलपति स्वयं को निरंतर गहराते भंवर में फंसा पाते हैं तो उच्च न्यायालय के सेवानिवृत न्यायाधीश एवं अपने ‘मित्र’ को एक तीसरी “जांच समिति का अध्यक्ष” नियुक्त करते हैं। छात्राएं प्रतिवाद करती हैं कि उन्हें कुलपति द्वारा मनोनीत किसी जांच समिति की निष्पक्षता पर विश्वास नहीं है और वे छेड़छाड़ कांड की न्यायिक जांच अथवा सी.बी.आई (महिला विंग) द्वारा जांच की मांग करती हैं। फलस्वरूप जिला पुलिस को छात्राओं द्वारा प्रकाशित इश्तिहार के आधार पर ही केस दर्ज़ करना पड़ता है और वही पुलिस एकदम पूरी हरकत में आ जाती है जो अब तक कह रही थी कि उसके पास छेड़छाड़ कांड की किसी ने रपट नहीं लिखाई है? मुद्दत से पुरुष छात्रवासों में डेरा जमाये बैठे असामाजिक तत्व होस्टलों को छोड़कर भाग खड़े होते हैं।
कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय शिक्षक संघ द्वारा विश्वविद्यालय समुदाय की एक संयुक्त सभा बुलाई जाती है जिसमें संघर्ष-समिति की छात्राओं को भी आमंत्रित किया जाता है। लेकिन छात्राएं अब तक, अनेक शिक्षकों की भूमिका और चरित्र से स्वयं परिचित हो चुकी हैं। वे प्रयत्न करके भी अपने जज़बात रोक नहीं पाती हैं और कुछ शिक्षकों की भूमिका पर कटु टिप्पणी कर देती हैं। कुलपति को एक बार फिर बहाना मिल जाता है। वह उस घटना का अनैतिक लाभ उठाकर लड़कियों पर राजनीति प्रेरित होने का आरोप लगाते हैं। यहां तक कि यमुनागर के एक कालेज के दीक्षांत समारोह में बोलते हुए कुमारी शबनम को एक राजनैतिक दल की एजेंट घोषित कर डालते हैं। उस लड़की के भविष्य पर खतरों के बादल मंडरा रहे होते हैं। कभी उसके ‘सस्पेंशन’ की अफवाह उड़ती है तो कभी विश्वविद्यालय से निष्कासन की खबरें लड़कियों को हतोत्साहित करती हैं। लेकिन वह फ़ौलादी लड़की हर संभावित ख़तरे और ज़ुल्म के खिलाफ चट्टान सी अड़ी हुई है..।
बहरहाल छात्राओं द्वारा शुरू किए गए संघर्ष की अंतिम परिणति यह हुई कि कुलपति को कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से हटना पड़ा और परिसर से बढ़ती उद्दडंता एवं गुंडागर्दी का बोलबाला एक बार फिर लुप्त हो गया।
(‘जनसत्ता’ चंडीगढ़, 18 सितंबर 1990)
—————————————

लेखक के व्हाट्सएप पर प्रतिबिंब मीडिया के नियमित संजीदा पाठक श्री सुरेंद्र पाल तोमर की ये टिप्पणी प्राप्त हुई है:
“कहानी क्या सत्य घटना का वर्णन किया है. उन लड़कों को कोई-कोई आदमी समझा देने की हिम्मत भी रखता था परन्तु अब किसी की मजाल नहीं कि किसी को गलत बात बोलने या गलत काम से रोक दे???? कहने वाले की जान को तुरंत ख़तरा हो जाता है बल्कि मार ही देते है. पढ़ी- लिखी जनरेशन का यह क्या हाल है???
-सुरेंद्र पाल तोमर, भारतीय सेना का पूर्व सैनिक, बरेली (उत्तर प्रदेश) भारत।