अकड़ेंगे तो बिखरेंगे, बदलेंगे तो निखरेंगे

अकड़ेंगे तो बिखरेंगे, बदलेंगे तो निखरेंगे

लोहे जैसी जिद नहीं, पानी जैसा लचीला बनना होगा – क्योंकि समय उसी का साथ देता है जो बदलना सीखता है

डॉ. रीटा अरोड़ा

“दादाजी, यह पेड़ गिर गया और बगल वाला बच गया, ऐसा क्यों?”

बारिश के बाद पार्क में टहलते हुए पोते ने पूछा।

दादाजी ने टूटे हुए पुराने पेड़ की ओर देखा और फिर पास खड़ी घास की तरफ इशारा करते हुए बोले, “बेटा, पेड़ को अपनी मजबूती पर बहुत घमंड था। वह तूफान के सामने तनकर खड़ा रहा। घास झुक गई। तूफान चला गया तो पेड़ टूट चुका था और घास फिर मुस्कुरा रही थी।”

बच्चा कुछ पल चुप रहा। शायद वह पेड़ और घास की कहानी समझ रहा था। लेकिन सच कहें तो

यह कहानी केवल प्रकृति की नहीं, हम सबकी है।

जीवन बार-बार हमें यही सिखाता है कि जो अकड़ता है, वह टूटता है। जो झुकना सीखता है, वही बचता है। यही कारण है कि आज के बदलते दौर में लोहे जैसा कठोर नहीं, पानी जैसा लचीला बनना सबसे बड़ी जरूरत बन गया है।

हम ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ हर दिन कुछ नया हो रहा है। तकनीक बदल रही है। काम करने के तरीके बदल रहे हैं। रिश्तों की परिभाषाएँ बदल रही हैं। बच्चों की सोच बदल रही है। दुनिया जिस गति से बदल रही है, शायद पहले कभी नहीं बदली।

लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब हम बदलती दुनिया में भी पुरानी जिद को सीने से लगाए रखते हैं।

अक्सर लोग कहते हैं, “मैं ऐसा ही हूँ, मैं नहीं बदल सकता।”

पहली नजर में यह आत्मविश्वास जैसा लगता है। लेकिन गहराई से देखें तो यह विकास के दरवाजे बंद करने जैसा है।

अकड़ केवल घमंड नहीं होती। कई बार यह डर का दूसरा नाम होती है।

नया सीखने का डर।

गलती मानने का डर।

अपने पुराने विश्वासों को छोड़ने का डर।

यही डर धीरे-धीरे इंसान को भीतर से कठोर बना देता है।

रिश्तों में भी यही होता है।

पति कहता है, “गलती मेरी नहीं है, पहले वही माफी मांगे।”

पत्नी सोचती है, “मैं क्यों झुकूँ?”

दोनों अपनी जगह सही साबित करने में लगे रहते हैं। लेकिन कोई यह नहीं सोचता कि सही होने से ज्यादा जरूरी रिश्ता बचाना है।

कई घर इसलिए नहीं टूटते कि वहाँ प्रेम नहीं होता। वे इसलिए टूटते हैं क्योंकि वहाँ अहंकार प्रेम से बड़ा हो जाता है।

पुराने समय में लोगों के पास सुविधाएँ कम थीं, लेकिन रिश्तों में लचीलापन अधिक था। बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहा करते थे, “रिश्ता बचाना हो तो थोड़ा झुकना पड़ता है।”

आज हम झुकने को कमजोरी समझ बैठे हैं।

यही भूल हमें भीतर से तोड़ रही है।

पानी को देखिए।

उसकी सबसे बड़ी खूबी उसकी लचक है। उसे किसी गिलास में डालिए, वह गिलास का आकार ले लेता है। नदी में बहाइए, नदी बन जाता है। समुद्र में मिलाइए, समुद्र बन जाता है।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि पानी कमजोर है।

यही पानी धीरे-धीरे पत्थरों को काट देता है। पहाड़ों के बीच रास्ता बना देता है। जीवन को जन्म देता है। उसकी ताकत उसकी जिद में नहीं, उसकी अनुकूलन क्षमता में है।

कार्यक्षेत्र में भी यही सच दिखाई देता है।

कुछ साल पहले तक जो लोग डिजिटल तकनीक सीखने से बचते थे, उन्हें लगता था कि पुराना तरीका ही काफी है। लेकिन समय ने उन्हें पीछे छोड़ दिया। दूसरी ओर जिन्होंने सीखने का साहस किया, वे आगे बढ़ते चले गए।

सफलता का रहस्य प्रतिभा से अधिक सीखते रहने की क्षमता में छिपा होता है। जीवन में आगे वही बढ़ता है जो कहता है, “मुझे सब कुछ नहीं आता, लेकिन मैं सीख सकता हूँ।”

यह वाक्य साधारण लगता है, लेकिन इसके भीतर विकास का पूरा दर्शन छिपा है।

बच्चों की परवरिश में भी यह बात उतनी ही महत्वपूर्ण है।

कई माता-पिता चाहते हैं कि बच्चे वही करें जो वे चाहते हैं। वही पढ़ाई, वही करियर, वही सोच।

लेकिन हर बच्चा अपनी अलग पहचान लेकर पैदा होता है।

जब हम उस पर अपनी इच्छाएँ थोपते हैं तो वह या तो विद्रोही बन जाता है या भीतर ही भीतर टूटने लगता है।

इसके विपरीत, जो माता-पिता बच्चों को समझने की कोशिश करते हैं, उनकी बात सुनते हैं और समय के साथ अपनी सोच में बदलाव लाते हैं, वे बच्चों के साथ मजबूत रिश्ते बना पाते हैं।

समाज में भी यही नियम लागू होता है।

इतिहास गवाह है कि जो समाज समय के साथ बदलने को तैयार नहीं हुए, वे पीछे छूट गए। जिन्होंने शिक्षा, विज्ञान और नई सोच को अपनाया, उन्होंने प्रगति की नई कहानियाँ लिखीं।

असल में परिवर्तन जीवन का नियम है।

हम चाहें या न चाहें, समय चलता रहेगा। परिस्थितियाँ बदलती रहेंगी। लोग बदलते रहेंगे।

सवाल यह नहीं है कि बदलाव आएगा या नहीं।

सवाल यह है कि हम उसके सामने कैसे खड़े होंगे।

लोहे की तरह तनकर?

या पानी की तरह बहकर?

जीवन की सबसे बड़ी समझ शायद यही है कि हर लड़ाई लड़ना जरूरी नहीं होता। हर बात मनवाना जरूरी नहीं होता। हर बहस जीतना जरूरी नहीं होता।

कई बार थोड़ा रुक जाना, थोड़ा सुन लेना और थोड़ा बदल जाना ही सबसे बड़ी जीत बन जाता है।

आज यदि हम अपने जीवन की परेशानियों पर नजर डालें, तो पाएँगे कि उनमें से बहुत-सी समस्याओं की जड़ हमारी अपनी जिद है।

हम चाहते हैं कि लोग बदल जाएँ।

हालात बदल जाएँ।

दुनिया बदल जाए।

लेकिन खुद को बदलने की बारी आती है तो हम पीछे हट जाते हैं।

यहीं से संघर्ष शुरू होता है।

और यहीं समाधान भी छिपा है।

यदि हम हर दिन केवल एक प्रतिशत भी बेहतर बनने का प्रयास करें, अपनी सोच को थोड़ा खुला रखें, अपनी गलतियों को स्वीकार करें और सीखने की इच्छा जीवित रखें, तो जीवन धीरे-धीरे बदलने लगता है।

याद रखिए, झुकना हार नहीं है।

बदलना कमजोरी नहीं है।

लचीलापन चरित्र की सबसे बड़ी ताकत है।

आखिरकार वही पेड़ सबसे लंबे समय तक जीवित रहते हैं जो हवा के साथ झूमना जानते हैं। वही रिश्ते टिकते हैं जिनमें लोग एक-दूसरे के लिए थोड़ा बदलना जानते हैं। और वही इंसान आगे बढ़ते हैं जो समय के साथ खुद को नया बनाना सीख लेते हैं।

इसलिए अगली बार जब जीवन आपको किसी मोड़ पर बदलने का अवसर दे तो उससे डरिए मत।

क्योंकि अकड़ हमें टूटना सिखाती है, जबकि बदलाव हमें निखारना सिखाता है।

और शायद जीवन का सबसे बड़ा रहस्य भी यही है कि मजबूत वह नहीं जो कभी झुके नहीं, बल्कि वह है जो हर तूफान के बाद फिर से मुस्कुराते हुए खड़ा हो जाए।

डॉ. रीटा अरोड़ा सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल हैं

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *