हरियाणाः जूझते जुझारू लोग – 126
महेन्द्र शर्माः रिटायरमेंट के बाद भी सक्रियता बरकरार
सत्यपाल सिवाच
15 जुलाई 1958 को फतेहाबाद के मेहवाला गांव में जन्मे महेन्द्र शर्मा की कार्यस्थली सिरसा रही है। फिलहाल उनका परिवार सिरसा शहर के गोविन्द नगर में बसा हुआ है। उनकी माता जी का नाम श्रीमती जयदेवी है और पिता जी श्री रामेश्वर दास भारतीय रेलवे के कर्मचारी रहे। वे छह भाई-बहन हैं। उन्होंने आठवीं कक्षा तक ही शिक्षा प्राप्त की।
10 जनवरी 1979 को उन्हें सिंचाई विभाग हरियाणा में ड्राइवर की नौकरी मिल गई। उनके नौकरी में आने के थोड़ा समय बाद ही पीडब्ल्यूडी की तीनों शाखाओं के कर्मचारी मैकेनिकल वर्करज यूनियन के रूप में संगठित होने शुरू हो गए थे। उन दिनों अधिकारियों द्वारा बेगार लेना और कर्मचारियों का शोषण आम बात थी। इसी के चलते संगठन के प्रति कर्मचारियों में विश्वास बनने लगा था। महेन्द्र शर्मा 31 जुलाई 2016 को सेवानिवृत्त हुए।
वे मैकेनिकल वर्करज यूनियन के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में काम करने लगे थे। संगठन के प्रति आस्था बनने का मुख्य कारण शोषण से बचने के लिए कर्मचारियों के एकजुट होने की भावना रहा। विभाग में आए दिन शोषण के मामले सामने आते रहते थे। वे सिरसा में अपनी यूनियन के जिला प्रधान रहे। वे सर्वकर्मचारी संघ के जिला कोषाध्यक्ष, जिला सचिव और जिला प्रधान पद पर भी चुने गए। उनके काम की शैली ऐसी रही कि उन्हें लगातार कोई न कोई जिम्मेदारी देकर रखी गई।
उन्होंने सन् 1986 से सेवानिवृत्ति तक सभी आन्दोलनों में भाग लिया। वे सन् 1986,1993 और 1995 में गिरफ्तार हुए तथा जेल में रहे। आमतौर पर मुकदमा, चार्जशीट आदि समझौते के साथ समाप्त होते रहे। उन्हें इस बात पर फख्र है कि मैकेनिकल वर्करज यूनियन सर्वकर्मचारी संघ का हिस्सा है। हिस्सा ही नहीं, बल्कि वह मोर्चे की अगली कतार में रहने वाले कर्मचारियों का संगठन है। वे 1986 से सेवानिवृत्त होने तक अपने क्षेत्र में कर्मचारियों की नेतृत्वकारी भूमिका में रहे।
महेन्द्र शर्मा सभी समस्याओं के समाधान के लिए कर्मचारियों की एकता पर भरोसा करते हैं। इसलिए उन्होंने कभी किसी राजनीतिक नेता अथवा अधिकारी से निजी सम्बन्ध बनाने की कोशिश नहीं की। यद्यपि विभाग के स्थानीय अधिकारी तो जानते ही थे। किसी से कोई निजी काम भी नहीं करवाया।
उन्हें लगता है कि कर्मचारियों को अब पहले से अधिक संघर्ष करने की जरूरत है। भ्रष्टाचार, निजीकरण, बेरोजगारी और ठेका जैसी चीजें ही बहस में हैं। बड़ी एकता बनाकर ही निर्णायक लड़ाई लड़ी जा सकती है। वे समझते हैं कि यदि ईमानदारी के साथ प्रयास किया जाए; निडर होकर संघर्ष और कार्यकर्ताओं को जागरूक करें तो अब भी लड़ाई जीत सकते हैं।
सन् 1985 में महेन्द्र शर्मा व श्रीमती राजबाला का विवाह हुआ और उन्होंने जीवन की नयी पारी शुरू की। उनके तीन बच्चे हैं जो प्राईवेट सेक्टर में काम करते हैं।

लेखक – सत्यपाल सिवाच
