रविन्द्र कुमार ‘रवि’ की एक ग़ज़ल
पेट की उदासी को,रोटियां समझती हैं।
बंदरों की चालें कब, बिल्लियां समझती हैं।
पेड़ के हरेक ग़म को, डालियां समझती हैं।
बाप की परेशानी, बेटियां समझती हैं।
हमसफ़र समझता है, रास्तों की मुश्किल को।
पांव की थकावट को जूतियां समझती हैं।
दो दिलों का आपस में, कोई एक रिश्ता है।
याद की सदाओं को हिचकियां समझती हैं।
हिज़्र ए मुहब्बत में, जान भी निकलती है।
नीर से बिछड़ना क्या, मछलियां समझती हैं।
बाग में बहारों में, खूब रंग बिखरे हैं।
फूल के हरेक रंग को, तितलियां समझती हैं
रोज़ बात करतीं हैं,आप की कलाई से।
आप की कलाई को, चूड़ियां समझती हैं।
