जसवीर त्यागी की कविताएं

जसवीर त्यागी की कविताएं

टूटना

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झर रही हैं नीम की पत्तियाँ
पत्तियाँ अठखेलियाँ करती हुई बालिकाओं-सी

बगैर समझे-विचारे
कूद पड़ती हैं डाल से जमीन पर

हरे-पीले हल्के रंग की
हाथ से बुनी हुई एक चादर
बिछती जा रही है पृथ्वी पर

पत्तियाँ जुदा हो रही हैं पेड़ से
और सुगन्ध पत्तियों से दूर जा रही हैं

पत्तियाँ हों
हो जीव-जंतु या मनुष्य
टूटता है जो एक बार अपने मूल से

फिर खोया-खोया-सा
भटकता फिरता है दर-बदर

नीम से टूटी हुई
पत्तियों की मानिंद।


घर का कोना
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घर में
सबसे पीछे एक कोना है
परिवारी जन कम जाते हैं वहाँ

कोने में एक झरोखा है
जहाँ से नीम का पेड़ दिखता है

दोपहर के बाद
झरोखे से धूप घर के अंदर झाँकती है

घर का वह कोना
मुझे अपना लगता है।

नीम
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मेरे कमरे की खिड़की से
नीम का एक पेड़ दिखता है
उसकी छाया कमरे में रहती है

और सावन में
उसकी निम्बोलियों की गंध महकती है

मेरे पास आने-जाने वालों का
नीम स्नेहिल स्वागत करता है

कुछ लोग मुझे नीम-सा कड़वा समझते हैं
मेरे जानकर जो परिचित हैं मुझसे

वे नीम का महत्त्व
और उसकी उपयोगिता को
बखूबी समझते हैं

उन्हें पता है
दूसरों को जीवन देना नीम की प्रकृति है।

सौंदर्य संतुलन में है
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मिठाई के शौकीन व्यक्ति को
डॉक्टर ने मधुमेह की हिदायत देते हुए कहा-

बहुत ले लिया मिठाइयों का स्वाद
अब मिठाई कम
नीम,करेला,आँवला,जामुन लीजिये

दरअसल सौंदर्य अधिकता में नहीं
संतुलन में वास करता है।

निशान
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पार्क आते-जाते हुए
रास्ते में
शहतूत से लदे पेड़ मिलते हैं

लेकिन!पेड़ों से शहतूत खाने वाले
बहुत कम दिखते हैं

शहतूत कब तक
किसी की बाट जोहते रहेंगे?
आखिर उनके साँसों की डोर भी
समय-सरताज के हाथ में है

इंतजार की इंतिहा होने पर
वे पेड़ से जमीन पर कूदकर
खुद को खत्म कर लेते हैं

मैं रोज सड़क पर
पेड़ों से पड़े हुए
शहतूतों के निशान देखता हूँ।

कहीं जाने को तैयार
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झमाझम बारिश थम गयी
पेड़-पौधे
घर-बाहर
मकान-दुकान
साइकिल-कार
सब नहाये-धोये आह्लादित हैं

उनको देखकर लगता है
मानो किसी उत्सव में जाने को तैयार हैं।

जसवीर त्यागी दिल्ली विश्वविद्यालय के राजधानी कॉलेज में हिंदी के प्रोफेसर हैं।

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