राखी का एक धागा: परिवार से समाज को जोड़ती डोर
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एक छोटी-सी गाँठ, जो अपनों का साथ निभाना सिखाते-सिखाते हर जरूरतमंद के लिए हाथ बढ़ाने का संस्कार देती है
डॉ रीटा अरोड़ा
“भैया, इस बार राखी पर क्या वचन दोगे?” बहन ने राखी बाँधते हुए पूछा।
भाई हँसा, “वही पुराना – हमेशा तुम्हारी रक्षा करूँगा।”
पास बैठी माँ मुस्कुराईं, “लेकिन रक्षा सिर्फ बहन की ही क्यों?”
दोनों ने उनकी ओर देखा।
माँ बोलीं, “कल सड़क पर एक बुज़ुर्ग गिर गए थे। कितने लोग देखकर निकल गए, एक लड़के ने रुककर उन्हें उठाया और घर तक पहुँचाया। वह भी तो किसी का भाई था।”
बहन ने धीरे से कहा, “मतलब राखी का वचन सिर्फ मेरे लिए नहीं?”
“तुमसे उसकी शुरुआत है,” माँ बोलीं, “अगर परिवार में सीखा साथ देना केवल परिवार तक ही रह जाए, तो संस्कार अधूरा रह जाता है।”
भाई ने राखी को देखा और कहा, “तो आज वचन थोड़ा बड़ा करते हैं – जहाँ किसी को मेरे साथ की जरूरत होगी, वहाँ मुँह नहीं मोड़ूँगा।”
शायद राखी के छोटे-से धागे में छिपा सबसे बड़ा संदेश यही है।
हमारे त्योहार केवल परंपराएँ नहीं, पीढ़ी-दर-पीढ़ी मूल्यों को आगे बढ़ाने के सहज माध्यम भी हैं। रक्षाबंधन में बहन भाई की कलाई पर राखी बाँधती है और भाई उसके साथ खड़े रहने का वचन देता है। बचपन से हर वर्ष दोहराई जाने वाली यह छोटी-सी रस्म मन में एक बड़ी बात बैठाती जाती है – रिश्ता केवल प्रेम का नाम नहीं, जिम्मेदारी का नाम भी है।
लेकिन राखी की सार्थकता केवल इस वचन में नहीं कि मैं अपनी बहन के साथ खड़ा रहूँगा, बल्कि उस संस्कार में है जो धीरे-धीरे हमें हर उस व्यक्ति के साथ खड़ा होना सिखाता है, जिसे हमारे सहारे की जरूरत है।
यही वह बिंदु है जहाँ राखी का धागा परिवार की चौखट पार करके समाज की डोर बन सकता है।
रक्षा का अर्थ भी समय के साथ व्यापक हुआ है। आज रक्षा केवल किसी को शारीरिक खतरे से बचाना नहीं है।
किसी के साथ अन्याय हो रहा हो और हम उसके पक्ष में आवाज़ उठाएँ – यह भी रक्षा है,
किसी परेशान व्यक्ति की बात बिना उसे जज किए सुन लें – यह भी साथ देना है,
किसी बुज़ुर्ग को सड़क पार करा देना, किसी बच्चे को डराया जा रहा हो तो उसके पक्ष में खड़े होना,
किसी दुर्घटना में घायल व्यक्ति को देखकर आगे निकलने के बजाय मदद के लिए रुक जाना – ये सब उसी संस्कार के अलग-अलग रूप हैं।
कल्पना कीजिए, यदि हर भाई राखी पर बहन को दिया सुरक्षा का वचन केवल अपनी बहन तक सीमित न रखे, बल्कि हर बेटी और हर महिला के सम्मान को उसी दृष्टि से देखे, तो समाज कितना बदल सकता है।
और यह जिम्मेदारी केवल भाई की भी नहीं है।
आज बहन भी भाई की शक्ति है। वह कठिन समय में उसका मनोबल बनती है, गलत राह पर उसे टोकती है और जरूरत पड़ने पर पूरे परिवार का सहारा बनकर खड़ी होती है। इसलिए राखी किसी एक के शक्तिशाली और दूसरे के कमजोर होने का प्रतीक नहीं, बल्कि एक-दूसरे के लिए खड़े रहने की साझी जिम्मेदारी का पर्व है।
आज हमारे जीवन में संपर्क बहुत हैं, लेकिन संवेदनशीलता कहीं कम होती दिखाई देती है।
सड़क पर कोई परेशान हो तो कई बार मदद के लिए हाथ बढ़ाने से पहले मोबाइल कैमरा निकल आता है।
पड़ोस में कौन अकेला है, कौन संकट में है, यह जानने का समय कम होता जा रहा है।
ऐसे समय में रक्षाबंधन जैसे पर्व हमें याद दिलाते हैं कि सुरक्षित समाज केवल कानून और पुलिस से नहीं बनता – वह संवेदनशील नागरिकों से बनता है।
समाज की सुरक्षा की शुरुआत भी आखिर परिवार से ही होती है।
जिस बच्चे को घर में कमजोर का हाथ पकड़ना सिखाया जाएगा, वह बाहर किसी असहाय को देखकर शायद मुँह नहीं मोड़ेगा।
जिसे बहन का सम्मान करना सिखाया जाएगा, वह दूसरी स्त्री के सम्मान को भी समझेगा।
जिसे भाई के संकट में साथ देना सिखाया जाएगा, वह मित्र, पड़ोसी और सहकर्मी की परेशानी के प्रति भी संवेदनशील होगा।
यही संस्कार धीरे-धीरे समाज का चरित्र बनते हैं।
इस रक्षाबंधन पर राखी के साथ एक विचार भी बाँधा जा सकता है – “मैं केवल अपनों की नहीं, अपने भीतर की संवेदना की भी रक्षा करूँगा।”
किसी की परेशानी देखकर “मुझे क्या?” कहकर आगे नहीं बढ़ूँगा। जहाँ संभव होगा, हाथ बढ़ाऊँगा। अन्याय देखकर चुप नहीं रहूँगा। रिश्तों में विश्वास की रक्षा करूँगा और समाज में किसी की गरिमा को ठेस पहुँचती देख तमाशबीन नहीं बनूँगा।
तब शायद राखी केवल भाई की कलाई का श्रृंगार नहीं रहेगी। वह बच्चों में जिम्मेदारी, युवाओं में संवेदना और समाज में सुरक्षा का संस्कार बनेगी।
क्योंकि परिवार हमें रिश्ते देता है, लेकिन संस्कार उन रिश्तों की सीमाएँ बढ़ाना सिखाते हैं।
राखी का धागा कुछ दिनों बाद कलाई से उतर जाएगा। उसका रंग भी फीका पड़ जाएगा। लेकिन यदि उससे मिला यह भाव मन में रह गया कि “जहाँ किसी को मेरे सहारे की जरूरत होगी, मैं यथासंभव उसके साथ खड़ा रहूँगा,” तो वह धागा कभी नहीं टूटेगा।
वह एक कलाई से निकलकर दूसरी कलाई तक, एक परिवार से दूसरे परिवार तक और अंततः पूरे समाज को जोड़ने वाली डोर बन जाएगा।
शायद रक्षाबंधन की सबसे सुंदर सार्थकता भी यही है – रक्षा का वचन अपनों से शुरू हो, लेकिन संवेदना की सीमा अपनों पर खत्म न हो।
~ डॉ. रीटा अरोड़ासेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल
