डॉली पार्टन – दुनिया भर के बच्चों की किताबों वाली आँटी

डॉली पार्टन – दुनिया भर के बच्चों की किताबों वाली आँटी

राहुल मिश्रा

उस घर में एक ही किताब थी। और पिता उसे भी नहीं पढ़ पाते थे, क्योंकि उन्होंने जिंदगी में कभी स्कूल का दरवाजा नहीं देखा था।
परसों उनकी बेटी गुजर गई।
अस्सी बरस की थीं।
और जिस दिन वो गईं, दुनिया भर के बच्चों के घरों में उनकी भेजी हुई तैंतीस करोड़ किताबें पड़ी थीं।
हर महीने पैंतीस लाख नई किताबें डाक से निकलती हैं।
आज भी।नाम अभी नहीं बताऊंगा। पहले एक और बात, जिस पर शायद आपकी नजर कभी नहीं गई।
1996 में स्कॉटलैंड की एक प्रयोगशाला में दुनिया की पहली क्लोन भेड़ पैदा हुई। आपने उसका नाम अपने बच्चे की विज्ञान की किताब में पढ़ा है। शायद अपनी भी।
डॉली।


वो नाम इसी औरत का था।
टीम के वैज्ञानिकों ने खुद बताया कि वह कोशिका जिस ग्रंथि से ली गई थी, उसे देखकर उन्हें यही नाम सूझा।
यानी विज्ञान की सबसे बड़ी खोजों में से एक का नाम भी, आखिरकार, एक औरत के शरीर पर किए गए मजाक से निकला।
और वो हंस दी।
कहा, अच्छा ही लगा। बस अपना क्लोन नहीं चाहिए।
पर उन्हीं बरसों में, जब दुनिया उसके शरीर की बात कर रही थी, वो चुपचाप एक और काम शुरू कर चुकी थी। एक-एक बच्चे के घर, डाक से, किताब भेजने का काम।
नाम -डॉली पार्टन।
अब शुरू से शुरू करते हैं।
टेनेसी। लोकस्ट रिज। 19 जनवरी 1946।
एक कमरे की झोपड़ी। न बिजली, न नल। घर के बाहर पहाड़, और घर के भीतर बारह बच्चे। डॉली उनमें चौथी थी।
जिस डॉक्टर ने उसे जन्म दिलवाया, उसकी फीस चुकाने के लिए पिता के पास पैसे नहीं थे।
उन्होंने मक्के के आटे की एक बोरी दे दी।
पिता का नाम था रॉबर्ट ली पार्टन। बंटाई पर खेती करते थे, बाद में तंबाकू का छोटा खेत लिया, और बीच-बीच में मजदूरी।
उनके अपने बचपन में परिवार इतना बड़ा था कि उन्हें घर चलाने में लगना पड़ा। स्कूल का नंबर कभी नहीं आया।
तो वो पढ़ नहीं सकते थे। लिख नहीं सकते थे।
डॉली ने बरसों बाद ओपरा विनफ्री से कहा था कि उनके पिता बेहद समझदार आदमी थे, पर इस एक बात की शर्म उनके भीतर बैठी हुई थी। उन्हें लगता था कि अब इस उम्र में सीखना मुमकिन नहीं।
बेटी उन्हें देखती रही।
और मां?
मां का नाम एवी ली। घर की सारी रजाइयां, पर्दे और कपड़े वो खुद सीती थीं। जो चीथड़े बच जाते, उन्हीं से बच्चों के कपड़े बनते।
एक जाड़े में डॉली के पास कोट नहीं था।
मां ने बचे हुए रंग-बिरंगे टुकड़ों को जोड़कर एक कोट सी दिया।
और बेटी को बाइबिल की वो कहानी सुनाई, जिसमें यूसुफ को उसके पिता ने रंग-बिरंगा चोगा दिया था। मां ने कहा, तुम्हारा कोट भी वैसा ही है।
लड़की उसे पहनकर स्कूल गई, और बच्चे हंस पड़े।
वो रोती हुई घर लौटी।
उसे लगा मां ने झूठ बोला था।
मां ने जो जवाब दिया, वो इस पूरी कहानी की जड़ है।
उन्होंने कहा कि वो अपने बच्चों के मुंह से यह कभी नहीं सुनना चाहतीं कि हम गरीब हैं। हम अमीर हैं -दया में, प्यार में, और समझ में।
उसी कोट पर आगे चलकर डॉली ने एक गीत लिखा, जो ता-उम्र उसकी सबसे प्रिय रचना बना रहा।
अब 1964 पर आइए। सेवियर काउंटी हाई स्कूल। विदाई समारोह।
डॉली अपने पूरे खानदान में पहली थी, जो हाई स्कूल पास कर रही थी।
बच्चों से बारी-बारी पूछा गया कि आगे क्या करोगे। कोई नर्सिंग, कोई फौज, कोई शादी।
उसकी बारी आई। उसने खड़े होकर कहा कि वो नैशविल जाएगी, और स्टार बनेगी।
पूरा हॉल हंस पड़ा।
उसने बाद में लिखा कि उस हंसी से उसे बहुत शर्मिंदगी हुई। पर सपने से वो एक इंच नहीं हिली।
अगली सुबह वो नैशविल की बस में थी।
शहर में पहला दिन। हाथ में गंदे कपड़ों का गट्ठर। एक लॉन्ड्री में कपड़े डालकर वो सड़क पर टहलने निकली।
एक ट्रक से किसी लड़के ने आवाज लगाई। गांव की लड़की थी, उसने हाथ हिला दिया।
लड़के का नाम कार्ल डीन था।
उसने बाद में बताया कि पहला खयाल यही आया था -मैं इसी से शादी करूंगा।
और डॉली ने जो कहा, वो पढ़कर सांस रुकती है।
उसने कहा कि उसे हैरानी हुई कि बात करते वक्त वो आदमी उसके चेहरे की तरफ देख रहा था। और साफ जोड़ा -मेरे साथ ऐसा कम ही होता है।
अट्ठावन बरस वो साथ रहे। कार्ल ने कभी कोई इंटरव्यू नहीं दिया, कभी रेड कार्पेट पर कदम नहीं रखा।
पर आगे बढ़ने से पहले नैशविल का सच जान लीजिए। शहर उसे गायिका के रूप में नहीं चाहता था। आवाज बहुत ऊंची और बहुत अलग थी, और उसके गांव वाले लहजे पर हंसी उड़ती थी।
तो उसने दूसरों के लिए गीत लिखने शुरू किए।
फिर एक टीवी शो में जगह मिली। शो पोर्टर वैगनर का था -उस दौर के बड़े कलाकार। सात बरस वो उस शो की लड़की गायिका बनी रही।
और फिर उसने जाने का फैसला किया।
पोर्टर सुनने को तैयार नहीं थे। बहस लंबी खिंची। एक रात, हारकर, उसने वो बात लिख दी जो बोलकर नहीं कह पा रही थी।
उसी एक रात में उसने दो गीत लिखे। दुनिया आज भी दोनों गाती है -जोलीन, और आई विल ऑलवेज लव यू।
अगली सुबह वो पोर्टर के दफ्तर गई और गाकर सुनाया।
पोर्टर रो पड़े। बोले, यह तुम्हारा सबसे खूबसूरत गीत है। जाओ -बस रिकॉर्ड मैं बनाऊंगा।
और अब वो पल, जिसने उसकी बाकी जिंदगी तय कर दी।
1974। एल्विस प्रेस्ली ने वो गीत गाने की इच्छा जताई। स्टूडियो तय हो गया, और डॉली को बुलाया गया कि वो सामने बैठकर सुने।
रिकॉर्डिंग से एक रात पहले एल्विस के मैनेजर का फोन आया। शर्त यह थी कि गीत की आधी मालिकाना हिस्सेदारी उन्हें मिलेगी। नियम था। हर गाने पर।
डॉली ने कहा कि यह नियम उसका नहीं है।
और मना कर दिया।
अट्ठाईस बरस की लड़की, दुनिया के सबसे बड़े गायक को मना कर रही थी।
उसने बाद में बताया कि वो पूरी रात रोई। पर यह भी कहा -यह कॉपीराइट मेरी जेब में ही रहेगा। ये गीत मेरे बच्चे हैं, और बुढ़ापे में मुझे इन्हीं को मेरा खर्च उठाना है।
फिर 1992 आया। व्हिटनी ह्यूस्टन ने वही गीत गाया, और वो अमेरिकी संगीत के सबसे ज्यादा बिकने वाले गीतों में शामिल हो गया।
पूरा पैसा उसी लड़की के पास आया, जिसने एक रात रोकर मना कर दिया था।
और उसने उस पैसे का जो किया, वो सबसे कम जाना गया हिस्सा है।
उसने नैशविल के उस मोहल्ले में एक पूरा दफ्तर परिसर खरीदा, जो उन दिनों अश्वेत परिवारों का इलाका माना जाता था, और जहां कोई बड़ा कलाकार पैसा नहीं लगाता था।
वजह उसने खुद बताई। बोली, गाना व्हिटनी की वजह से चला, तो जगह भी उसके लोगों के बीच होनी चाहिए। उसने उस इमारत को नाम दिया -वो घर, जो व्हिटनी ने बनाया।
बीच में एक और दृश्य है, जो हर काम करने वाली औरत का है।
जेन फोंडा ने उसे एक फिल्म का प्रस्ताव दिया -तीन दफ्तरी औरतों की कहानी। डॉली ने कभी अभिनय नहीं किया था। उसने एक शर्त रखी। शीर्षक गीत वो खुद लिखेगी।
सेट पर गिटार नहीं था। शूटिंग के बीच खाली वक्त में वो अपने लंबे नकली नाखून आपस में रगड़ती रहती। उस आवाज में उसे टाइपराइटर सुनाई दिया।
गीत बना, और रिकॉर्ड के क्रेडिट में एक पंक्ति दर्ज हुई जो शायद संगीत के इतिहास में अकेली है।
नाखून -डॉली।
अब वो हिस्सा, जिसके लिए मैंने यह पूरी पोस्ट लिखी।
1986 में उसने अपने ही जिले में एक मनोरंजन पार्क खड़ा किया। वजह पैसा नहीं थी। वजह यह थी कि उसके इलाके के लोगों को काम चाहिए था, और पहाड़ों में काम नहीं था। आज वो पूरे जिले का सबसे बड़ा नियोक्ता है।
पर उसके बाद उसने जो किया, वो किसी गायक ने आज तक नहीं किया।
उसने अपने जिले के स्कूलों का आंकड़ा उठाया। तीन में से एक बच्चा हाई स्कूल पूरा किए बिना पढ़ाई छोड़ रहा था।
शोध कराया तो पता चला कि बच्चा सातवीं-आठवीं में ही तय कर लेता है कि उसे आगे नहीं पढ़ना।
तो उसने उन्हीं दो कक्षाओं के बच्चों को बुलाया और एक अजीब सौदा रखा।
हर बच्चा एक साथी चुनेगा। दोनों एक कागज पर दस्तखत करेंगे। और अगर दोनों हाई स्कूल पास कर गए, तो दोनों को पांच सौ डॉलर मिलेंगे। अकेले पास होने पर कुछ नहीं।
छोड़ने की दर पैंतीस फीसदी से गिरकर छह फीसदी पर आ गई।
एक औरत ने पैसे से नहीं, जोड़ी बनाकर बच्चों को स्कूल में रोक लिया।
और फिर 1995 में उसने वो शुरू किया, जिसे उसने खुद अपनी सबसे कीमती चीज कहा।
इमेजिनेशन लाइब्रेरी।
तरीका इतना सीधा था कि उस पर यकीन नहीं होता। जन्म से लेकर पांच साल की उम्र तक, हर महीने, हर पंजीकृत बच्चे के घर डाक से एक किताब। मुफ्त। डाक खर्च समेत। आमदनी कोई भी हो।
पहले साल यह सिर्फ उसके अपने जिले में था।
आज यह पांच देशों में है -अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और आयरलैंड।
पर सबसे सुंदर बात यह नहीं है।
सबसे सुंदर बात यह है कि हर किताब के पहले पन्ने पर उसकी तस्वीर होती थी। तो बच्चे उसे गायिका नहीं समझते थे।बच्चे उसे किताब वाली आंटी कहते थे।
और उसके पिता के लिए दुनिया में इससे बड़ी कोई बात नहीं थी। डॉली ने बताया कि उन्हें सबसे ज्यादा गर्व इसी पर था। वो कहते थे -मेरी बेटी किताब वाली है।
स्टार नहीं। किताब वाली।
इमेजिनेशन लाइब्रेरी के दफ्तर में आज भी उनकी एक बड़ी तस्वीर टंगी है, जिसमें वो सूट पहने हुए हैं।
डॉली ने कहा था कि पिता ने जिंदगी में कभी सूट नहीं पहना। हमेशा खेत के कपड़े।
वो 2000 में गुजरे।
जाने से पहले उन्होंने यह सब देख लिया था।
बेटी ने बरसों बाद एक समारोह में कहा कि उसे आज तक यही खयाल आता है -अगर पिता पढ़-लिख पाते, तो न जाने क्या बन जाते। यह पूरी योजना उसी अधूरे सवाल का जवाब थी।
और अब वो बात, जो भारत के पाठक के लिए है।
हमारे यहां साक्षरता दर अब 80.9 फीसदी है। यानी हर पांच में से एक भारतीय आज भी लिख-पढ़ नहीं सकता। औरतों में यह कमी और गहरी है।
सरकार का उल्लास कार्यक्रम इसी को पाटने के लिए चल रहा है, और बयालीस लाख स्वयंसेवक उसमें लगे हुए हैं। लद्दाख, मिजोरम, गोवा, त्रिपुरा और हिमाचल पूरी तरह साक्षर घोषित हो चुके हैं।
यानी रॉबर्ट ली पार्टन जैसे पिता हमारे यहां लाखों हैं। आज भी।
और यह भी सच है कि डॉली पार्टन की वो किताबें भारत कभी नहीं आईं। पांच देश, और उनमें हम नहीं।
पर एक बात है जो आपको चुभेगी।
जो पांच देश उस सूची में हैं, उन्हीं पांच में हमारे सबसे ज्यादा बच्चे बसे हुए हैं। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, आयरलैंड।
यानी इस वक्त, किसी भारतीय मां-बाप के घर, किसी विदेशी डाकिये ने डॉली पार्टन की भेजी किताब डाल दी होगी।
और उसी बच्चे के दादा या दादी, यहां हिंदुस्तान के किसी गांव में, बैंक के कागज पर दस्तखत की जगह अंगूठा लगा रहे होंगे।
एक ही खानदान। एक ही पीढ़ी के दो सिरे।
अब आखिरी हिस्सा।
पिछले बरस मार्च में कार्ल डीन गुजर गए। अट्ठावन बरस का साथ खत्म हुआ।
कोई संतान नहीं थी।
उसके बाद उसकी अपनी तबीयत बिगड़ने लगी।
अक्टूबर में उसकी बहन ने लोगों से दुआ मांगी, और अफवाह फैल गई कि वो जा रही है।
तो उसने खुद वीडियो बनाया। हंसते हुए कहा कि वो अभी मरी नहीं है। बोली -मुझे लगता नहीं कि ऊपर वाले का काम मुझसे खत्म हुआ है। और मेरा अपना काम तो बिल्कुल नहीं।
फिर उसने साफ बताया कि जब कार्ल बीमार थे, उसने अपनी सेहत की तरफ देखना ही छोड़ दिया था।


21 अगस्त को उसने आखिरी बयान दिया।
उसने कहा कि वो अब भी ठीक हो रही है, और अब भी काम कर रही है।
फिर एक पंक्ति जोड़ी, जो कोई थका हुआ इंसान नहीं बोल सकता।
उसने कहा कि उसने खुद को सपनों में इतना उलझा लिया है कि अब भी बहुत कुछ करना बाकी है।
चार दिन बाद, नैशविल में, वो चली गईं।
यह कहानी एक गायिका की नहीं है।
यह उस डाकिये की कहानी है, जो एक अनपढ़ पिता की तरफ से, तीस बरस तक, अजनबी बच्चों के घर चिट्ठियां बांटता रहा।
दुनिया ने उसका शरीर देखा -इतना कि एक वैज्ञानिक खोज का नाम तक उसी से रख दिया गया।
एक आदमी ने उसका चेहरा देखा -और वो अट्ठावन बरस साथ रहा।
और उसने खुद, ता-उम्र, उन लोगों को देखा जिन्हें कोई नहीं देखता। वो जो पढ़ नहीं सकते।
अठारह बरस से मेरा काम यही है -दूसरों के लिखे को दुरुस्त करना।
और इन बरसों में मैंने देखा है कि विदेशी हस्तियों के जाने की खबर हमारे यहां कैसे छपती है। एक मशहूर गाने का नाम, एक उम्र, एक तस्वीर, और नीचे तीन लाइन।
कल भी यही हुआ। हर जगह जोलीन लिखा गया।
डाकघर कहीं नहीं छपा।
सितंबर सिर पर है, और सितंबर उसी योजना का महीना है। परिवार ने कहा है कि उन्हें याद करने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि वो डाक चलती रहे। संस्था ने साफ कहा है कि किताबें उनके बाद भी जाती रहेंगी।
तो कल सुबह, कहीं न कहीं, किसी बच्चे के दरवाजे पर एक लिफाफा गिरेगा।
भेजने वाली अब नहीं है।
पर डाक अब भी उसी के नाम से आ रही है।
जो आदमी पढ़ नहीं सका, उसकी बेटी ने दुनिया के बच्चों को पढ़ना दे दिया।
डॉली पार्टन ने असल में तीन ही काम किए, और तीनों दोहराए जा सकते हैं।
एक। जो हुनर उसका अपना था, उसका मालिकाना हक उसने किसी को नहीं दिया -चाहे सामने कितना भी बड़ा नाम खड़ा हो।
दो। जो पैसा उस हुनर से आया, वो उसी जमीन पर लौटा जहां से वो खुद आई थी।
तीन। जो कमी उसके अपने घर में थी, उसे उसने दूसरों के घरों में नहीं रहने दिया।
यह कहानी उस बेटे या बेटी तक पहुंचनी चाहिए, जिसके पिता आज भी कागज पर दस्तखत की जगह अंगूठा लगाते हैं। और जिसे यह कभी नहीं समझ आया कि उस अंगूठे के पीछे कोई नालायकी नहीं, सिर्फ एक छूटा हुआ मौका है।
मैं राहुल हूं। इस पन्ने पर कोई कहानी गढ़ी नहीं जाती। हर नाम असली है, हर तारीख जांची हुई, और हर बयान किसी न किसी छपे हुए स्रोत से उठाया हुआ। जो पुष्ट नहीं होता, वो यहां नहीं आता।

राहुल मिश्रा के फेसबुक वॉल से साभार

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