रंगमंच
दर्शक संवाद तंत्र रंगकर्म का स्वावलंबन है!
मंजुल भारद्वाज
पूंजीवाद ने ‘ बेचो और खरीदो’ buy & sell में दुनिया को तब्दील कर दिया । मनुष्य को नागरिक से ग्राहक और फिर वस्तु बना दिया । आज मनुष्य वस्तु बनकर बेचा और खरीदा जा रहा है। महिलाएं भारत और दुनिया में धर्म, नस्लवाद,वर्णवाद,पितृसत्ता के अधीन होकर वस्तु और भोग्या का जीवन जी रही थीं। भूमंडलीकरण ने पुरुषों को भी महिलाओं के समान वस्तु बनाकर ‘बेचो और खरीदो ‘ से पूरी दुनिया में शोषण का एकछत्र पूंजीवादी साम्राज्य स्थापित किया है।
आज पूंजीवाद अपने चरम पर पहुंचकर सिर्फ़ पूंजी रहना चाहता है ताकि दुनिया गुलाम हो और पूंजी का राज हो । पूंजीवाद में ग्राहक की थोड़ी बहुत सुनवाई है पर पूंजी सिर्फ़ मुनाफे का राज चाहती है। ट्रंप और एलन मस्क का द्वंद ‘ पूंजी और पूंजीवाद ‘ का द्वंद है।
आज शोषण,दमन,युद्ध,हिंसा,धर्मांधता के भयानक दौर में समता,समानता,न्याय,अहिंसा और मानवता त्राहि त्राहि कर रहे हैं। दुनिया को संतुलित करने वाला साम्यवाद वीभत्स पूंजीवादी तानाशाही का प्रतीक बनकर पूंजीवादी शोषण में लिप्त है।
इस विनाशकाल में बुद्धिजीवी कौम विलुप्त हो गई है। युवा पीढ़ी का झोंबी अवतार हमारे सामने है। तकनीक पर सवार दुनिया सोशल मीडिया,टी वी चैनलों और अखबारों के भ्रम जाल में फंसकर झूठ को जी रही है।
ऐसे समय में आदिकाल से मनुष्य को मनुष्य बनाने वाली चेतना जागृत करने वाली कलात्मक विधा ‘ रंगकर्म – रंगमंच ‘ की मानवता को बचाने के लिए अहम भूमिका है।
जी हां आदिकाल से अब तक सत्ता सिर्फ़ नियम बना सकती है,युद्ध कर सकती है। धर्म शोषण के पाखंड रच सकता है। पर मनुष्य को मनुष्य बनाती है सिर्फ़ ‘कला ‘ !
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन विगत 34 वर्षों से मानवता को बचाने के लिए दुनिया में रंग आंदोलन उत्प्रेरित कर रहा है । बिना सरकारी, कॉर्पोरेट, राजनैतिक पार्टियों की पूंजी के । सिर्फ़ और सिर्फ़ दृष्टि ,विचार ,विवेक से उत्प्रेरित कलात्मक प्रतिबद्धता, दर्शक संवाद और जन सहभागिता से यह रंग आंदोलन चल रहा है।
असंभव लगता है ना ! जी हां पूंजीवादी व्यवस्था ने यही जाल बिछाया है पूरी दुनिया में कि बिना पूंजी कोई कार्य भी संभव नहीं । थियेटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन ने इस असंभव को संभव कर दिखाया अपनी वैचारिक कलात्मक प्रतिबद्धता से !
ज़रा गौर करें पूरा पूंजीवाद बेचने और खरीदने पर टीका है। पर जो खरीद रहा है वो कौन है? जो उत्पाद कर रहा है वो कौन है?
थोड़ा सरल ढंग से समझें तो जनता अपने कल्याण के लिए सरकार की तरफ़ देखती है। सरकार से आर्थिक मदद की गुहार लगाती है। पर सरकार किसके पैसे या संपति पर ताकतवर बनती है । वो है जनता का पैसा और संपति । सरकार जनता के टैक्स से शक्तिशाली बनती है पर जनता गरीब ही रहती है।
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन ने इसी चक्र को भेदा और सीधा जनता यानी दर्शक से संवाद कर जनसरोकारों को मंचित किया !
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन ने पूंजीवादी सत्ता के इस भ्रम को तोड़ा कि कला सिर्फ़ मनोरंजन के लिए यानी टाइमपास होती है।
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन ने साम्यवादी प्रोपोगंडा को तोड़ा कि कला सिर्फ़ प्रोपोगंडा के लिए होती है।
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन ने सरकारी ड्रामा स्कूलों से प्रशिक्षित अध कचरे कूड़ा करकट द्वारा रंगकर्म और रंगमंच के बारे में फैलाई भ्रांतियों को तोड़कर जनमानस को रंगकर्म के मूल उद्देश्य से अवगत कराया । साथ ही साथ अवसरवादी बौद्धिक कौम द्वारा रंगकर्म को मात्र माध्यम भर तक सीमित कर देने वाले चक्रव्यूह को भेद कर ‘ रंगकर्म मानवमुक्ति का उन्मुक्त दर्शन है ‘ को स्थापित किया ।
हर सत्ता कला और कलाकारों से डरती है इसलिए कला और कलाकारों को अपने संसाधनों पर आश्रित कर अपना गुणगान कराती है। अपने जयकारे के बदले कला के नाम पर नाचने गाने वाले जिस्मों को पद्म भूषणों से सम्मानित करती है। ग्रांट के सिक्के फेंक नुमाइश कराती है।
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन ने सत्ता की साजिशों और षड्यंत्रों को भेदते हुए जन को अपना रंग आधार बनाया । जन को केवल आर्थिक सहभाग तक सीमित नहीं रखा अपितु जन को कला की वैचारिकी से जोड़ उसकी सहभागिता सुनिश्चित की ।
बाजारवाद के दौर में नुमाइश करने वाले कलाकारों को कला, रंगकर्म की चेतना से जोड़कर समग्र कलाकार और रंगकर्मी के रूप में तराशा ।
नाट्य मंचन के बाजारू नुस्खों यानी नाट्य गृह बुक करो , बिकाऊ अखबारों में विज्ञापन दो , महंगा सेट लगाओ, बिकाऊ समीक्षकों से वाह वाह करवाओ और सरकारी या किसी कॉरपोरेट के पैसे पर भोग करो, थियेटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन ने यह सब पलट दिया।
जन संवाद कर दर्शक समाज तैयार किया । विज्ञापन नहीं दिया। सेट के बदले कलाकारों की देह बोली को विकसित किया । नाट्यगृह के मंच पर नाटक प्रस्तुत करने की बजाए दर्शकों के मस्तिष्क में नाटक को मंचित किया ।
इस प्रयोग ने वैचारिक नाटक नहीं चलते के मिथ को तोड़ वैचारिक नाटकों के हाउसफुल का बोर्ड बॉक्स ऑफिस पर लगाया सतत विगत 33 वर्षों से !
दर्शक संवाद मार्केटिंग नहीं है। दर्शक संवाद दर्शकों का कलात्मक प्रशिक्षण है जो रंगकर्म के समूल आयामों से दर्शक को रूबरू कराता है।
दर्शक संवाद कलाकारों को मायावी यानी ग्लैमरस भ्रम से निकाल ठोस यथार्थ धरातल पर बनाए रखता है। दर्शकों से एक कलात्मक नाता निर्माण कर कला चेतना का विस्तार करता है। कलाकारों और दर्शकों के मानवीय पहलुओं को समृद्ध करता है।
दर्शक संवाद नुमाइश की बजाय कलात्मक प्रस्तुति को नए आयाम देता है।दर्शक संवाद कलाकारों का आर्थिक स्वावलंबन सुनिश्चित करता है जिससे कलाकार का अपनी रंग कला पर विश्वास सुदृढ़ होता है।
थियेटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य दर्शन कलाकारों को सीधे दर्शकों से जोड़कर ‘ रंगकर्म से बदलाव ‘ को सुनिश्चित कर मनुष्य को इंसान और दुनिया को मानवीय बनाने के लिए कलात्मक रूप से प्रतिबद्ध है।

लेखक – मंजुल भारद्वाज
