जसवीर त्यागी की कविताएं- साइकिल और काल के पास कल नहीं होता

जसवीर त्यागी की कविताएं- साइकिल और काल के पास कल नहीं होता

साइकिल
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जीवन में
मैं बहुत सारी साइकिलों पर बैठा
उनमें पारिवारिक सदस्यों,रिश्तेदारों
और यारों-दोस्तों की साइकिलें अधिक थीं

कभी-कभार
अजनबियों की साइकिलों पर भी
बैठने का अवसर मिला

एक समय वह भी था
जब मान और शान की
सवारी मानी जाती थी साइकिल

मेरी जीवन-यात्रा में
अनेक साइकिलों का साथ रहा

समय की आवाजाही में
कुछ साइकिलें खराब हो गयी
और कुछ हो गयी गुम

स्मृतियों के संसार में
एक साइकिल बची रही
जिस पर बैठकर
मैं पहली बार शहर गया
पिताजी संग दशहरा देखने के लिए

वहीं पर मैंने
सैकड़ों साइकिलें देखी थीं एक साथ

घर लौटते हुए
पिताजी ने खिलाई थी
गरमागरम रस भरी जलेबी
जिसकी चाशनी की मिठास
जिंदा है आज भी मेरे स्वाद में

चमचमाती कारों की तुलना में
साइकिलें आज भी मुझे आकर्षित करती हैं

जब कभी यादों की सड़क पर निगाह जाती है
दूर से ही दिखती है चलती हुई साइकिल।

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काल के पास कल नहीं होता

बहुत सारे काम
जिन्हें आज ही निपटाया जा सकता हैं

बड़ी सहजता से
कल के कंधों पर लटका देते हैं हम
कल देखेंगे

कल का कलरव
कानों में बजता हुआ
हमारी मानसिकता की शैय्या पर
आराम फ़रमाता है

हम नींद में सोते हुए
सुनहरे स्वप्न देखते हैं

आज को कल हाथों में
कितने विश्वास से सौंप देते हैं हम

मानो पहले से ही
कल से कोई करारनामा है हमारा

काल कहीं दूर खड़ा ओट में
देखता है सब कारगुजारियां

और मन ही मन मुस्कुराता है
यह सोचकर
कि काल के शब्दकोश में
कल नाम का
कोई शब्द नहीं आता।

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