रेजीम चेंज : भाषा का भौतिक विज्ञान और लोकतंत्र का रसायन शास्त्र
सत्ता का अंगरेज़ी शब्दकोश और भारतीय लोकतंत्र का दोहरा व्याकरण
त्रिभुवन
देश का राजनीतिक वातावरण पहले ही इतना अशांत था कि उसमें शांति की कोई छोटी-मोटी संभावना भी उपद्रव जान पड़ रही थी। इसी बीच सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने एक दिन उसे कुछ और अशांत कर देने के लिए अंगरेज़ी के केवल दो शब्द उच्चारित कर दिए Regime Change। उन्हें शायद अनुमान भी न रहा होगा कि ये दो मामूली-से शब्द हमारी राजनीतिक चेतना ही नहीं, भाषिक प्रज्ञा, शब्दकोशों की प्रतिष्ठा, पत्रकारिता के विवेक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की समूची बिरादरी को एक साथ सक्रिय कर देंगे। यह हैरानी की बात ही है कि किसी समय जिस देश में ‘उखाड़ फेंकना’ लोकतंत्र था, वहीं अब ‘Regime Change’ को षड्यंत्र बताकर बहस की जा रही है।
किसी ने कहा, ऐसा नहीं बोलना चाहिए था; किसी ने पूछा, आख़िर क्यों नहीं बोलना चाहिए था? कुछ लोगों को इसमें लोकतंत्र की अपरिहार्य संभावना दिखाई दी, कुछ को सत्ता पलटने की साज़िश और कुछ को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के तहख़ानों से उठती सीआईए की पुरानी पदचाप सुनाई देने लगी। देखते-देखते बात शब्द से अर्थ, अर्थ से अभिप्राय, अभिप्राय से आशंका और आशंका से षड्यंत्र तक पहुँच गई। अब अंगरेज़ी भी बेचारी क्या करती! उसकी एक अभिव्यक्ति के इतने राजनीतिक अभिभावक निकल आए थे कि ऑक्सफ़ोर्ड और कैंब्रिज के शब्दकोश भी संभवतः अपने ही अर्थों को लेकर असमंजस में पड़ जाते।
किसी ने Perplexity से पूछ लिया कि यह प्रयोग कितना उचित है; किसी ने Grok से राय माँगी; कोई ChatGPT के दरवाज़े पहुँचा और किसी ने Claude की भाषिक न्यायप्रियता को आज़माना चाहा।
मनुष्य की बुद्धि जिस प्रश्न पर असहमत थी, उसका अंतिम निर्णय अब मशीनों की उस बिरादरी को सौंपा जा रहा था, जिसकी सबसे बड़ी विशेषता यही है कि वह अपनी भूल भी कभी-कभी इतनी असाधारण वाक्पटुता से प्रस्तुत करती है कि साधारण मनुष्य को अपना सही होना संदिग्ध लगने लगता है। यह एक दिलचस्प दृश्य था। मनुष्य ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता बनाई थी, लेकिन अब वह उससे पूछ रहा था कि मनुष्य को अपने राजनीतिक विचार व्यक्त करते समय किन शब्दों का प्रयोग करने की अनुमति होनी चाहिए!
इस भाषिक रणभूमि में प्रख्यात पत्रकार राहुल देव जी भी उपस्थित हुए और ओम थानवी भी, जिनकी शब्दों की तह तक उतरने की अभिरुचि किसी पुरातत्त्ववेत्ता की तरह भाषा की प्राचीन और आधुनिक परतों में एक साथ विचरण करती रही है। अभी तक भाषाविद सुरेश पंत जी इस विवाद में दिखाई नहीं दिए थे; वरना हिन्दी के शब्दकोशीय संसार से भी एक दिलचस्प हस्तक्षेप संभव था। इस बीच प्रोफ़ेसर हेमंत जोशी जी ने राहुल देव जी से पूछ लिया कि अपनी बुद्धि पर भरोसा क्यों नहीं करते?
यह प्रश्न अपने आप में बड़ा मनोरंजक था, क्योंकि मनुष्य की बुद्धि पर भरोसा करने का परामर्श भी ऐसे समय दिया जा रहा था जब बुद्धि के कृत्रिम संस्करणों से उसके मूल संस्करण की प्रामाणिकता जँचवाई जा रही थी। मोहन श्रोत्रिय ने तो राहुल देव को अंगरेज़ी में ही टोक दिया,“Why should you have been so desperate in your search, Rahul? I mean, Rahul Dev?” इस वाक्य में desperate शायद regime से भी अधिक दिलचस्प शब्द था।
कहीं ऐसा तो नहीं कि सत्ता परिवर्तन की आशंका ने हमारी भाषिक जिज्ञासा को भी किसी आपातकालीन खोज-अभियान में बदल दिया था? उधर सुदीप्ति को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के दुष्प्रभावों और उसके पर्यावरणीय परिणामों की चिंता सताने लगी। यह चिंता निस्संदेह वाजिब थी। आख़िर जिन डिजिटल मेधाओं से हम दो अंगरेज़ी शब्दों का अर्थ पूछ रहे थे, उनके पीछे बिजली, पानी, डेटा सेंटर और पृथ्वी के सीमित संसाधनों का भी एक विशाल अदृश्य संसार था।
मुझे इस समूचे दृश्य में कुछ ऐसा मनोरम विरोधाभास दिखाई दिया कि एक तरफ़ मनुष्य राजनीतिक व्यवस्था बदलने की बात कर रहा था और दूसरी तरफ़ उसी मनुष्य की बनाई मशीनें उस परिवर्तन का भाषिक औचित्य निर्धारित करने में लगी थीं; इस बीच पृथ्वी चुपचाप उन मशीनों के संसाधन-उपभोग की क़ीमत चुका रही थी। सत्ता की चिंता अलग, शब्द की चिंता अलग और संसार के बचे रहने की चिंता बिल्कुल अलग!
लेकिन इस सारी दिलचस्प बहस में एक प्रश्न संभवतः सबसे अधिक विचारणीय था। क्या किसी अंगरेज़ी अभिव्यक्ति का अर्थ उसके शब्दकोश से निर्धारित होगा, उसके राजनीतिक इतिहास से, वक्ता की वास्तविक मंशा से या उस सरकार की सुविधा से जिसके विरुद्ध उसका इस्तेमाल किया गया है? क्या regime change में छिपा संभावित ख़तरा सचमुच उस पद की अंतर्निहित विशेषता है अथवा उसका अर्थ इस बात के साथ बदलने लगता है कि उसे किस राजनीतिक पक्ष ने उच्चारित किया?
भाषा की अपनी अर्थ-स्मृति होती है। शब्द अपनी व्युत्पत्ति, ऐतिहासिक प्रयोगों, वैचारिक साहचर्यों और समकालीन संदर्भों को साथ लेकर चलते हैं। लेकिन वे किसी राजनीतिक दल की पुश्तैनी संपत्ति नहीं होते। इसीलिए मुझे इस विवाद में सबसे अधिक दिलचस्पी प्रशांत भूषण की राजनीतिक इच्छा से नहीं, उस भाषिक विसंगति से हुई जिसके अंतर्गत कभी सरकार को ‘उखाड़ फेंकना’ लोकतांत्रिक जनाकांक्षा का वीरतापूर्ण उद्घोष था और आज regime change उसी लोकतंत्र के विरुद्ध एक भयावह षड्यंत्र की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है।
शब्द वही सत्ता परिवर्तन की आकांक्षा प्रकट कर रहे हैं, मगर सत्ता की दिशा बदलते ही उनके नैतिक अर्थ बदल दिए गए हैं। क्या यह भाषा का प्रश्न है या उस राजनीतिक मानसिकता का, जो अपने लिए प्रत्येक स्वतंत्रता सुरक्षित रखना चाहती है, लेकिन प्रतिद्वंद्वी के हाथ में पहुँचते ही उसी स्वतंत्रता को संदिग्ध घोषित कर देती है?
भारतीय राजनीति का यह दिलचस्प दौर है जब एक अंगरेज़ी पद के विरुद्ध ऐसे वैचारिक अभियोग का अभियान चल रहा है, मानो लोकतंत्र के समूचे अस्तित्व को महज दो शब्दों यानी Regime Change। से ख़तरा पैदा हो गया हो। सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने इनका उच्चारण क्या किया, सत्ता प्रतिष्ठान की भाषिक संवेदनशीलता अचानक असाधारण रूप से जाग्रत हो उठी। जो राजनीति कभी सरकार को ‘उखाड़ फेंकने’ का उद्घोष करती थी, जो समूचे देश को एक राजनीतिक दल से ‘मुक्त’ करने का स्वप्न दिखाती थी, उसे अब सत्ता परिवर्तन की अंगरेज़ी अभिव्यक्ति में लोकतंत्र-विरोधी षड्यंत्र की आहट सुनाई दे रही है।
यहाँ प्रश्न किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध से कहीं अधिक गंभीर है। यह उस विचित्र परिस्थिति का प्रश्न है जिसमें शब्दों का अर्थ उनके कोशगत आशय, ऐतिहासिक संदर्भ अथवा वक्ता की घोषित मंशा से नहीं, हिन्दी इस बात से निर्धारित होने लगता है कि उनका उच्चारण सत्ता ने किया है या सत्ता के आलोचक ने। भाषा जब राजनीतिक प्रभुत्व की बंदिनी बन जाती है, तब शब्दकोश भी पक्षपात करने लगता है।
सामान्य प्रयोग में government किसी समय सत्तारूढ़ सरकार को इंगित करता है, जबकि regime का अर्थ शासन की प्रकृति, संस्थागत व्यवस्थाओं, शक्ति के वितरण, निर्णय लेने के तरीक़ों और सत्ताधारी समूह की व्यापक संरचना से भी हो सकता है। राजनीति-विज्ञान में regime के तीन उल्लेखनीय अर्थ मिलते हैं सत्ता प्राप्त करने और उसका उपयोग करने के नियम; शासन करने वाला प्रभुत्वशाली गठबंधन; और शासकों तथा शासितों के बीच संबंधों की प्रकृति। इसलिए change of government तथा regime change हमेशा एक-दूसरे के पूर्ण पर्याय नहीं होते। पहला प्रायः सरकार के परिवर्तन तक सीमित रह सकता है, जबकि दूसरा राजनीतिक व्यवस्था के चरित्र अथवा उसके संचालन की पद्धति में व्यापक बदलाव का संकेत भी दे सकता है। लेकिन इस भेद से यह निष्कर्ष निकालना कि regime change अनिवार्यतः हिंसक, असंवैधानिक अथवा विदेशी हस्तक्षेप से संपन्न होने वाला परिवर्तन है, एकदम असंगत है।
इस पूरे विवाद में एक और सूक्ष्म अंतर है। Regime सामान्यतः government से अधिक आलोचनात्मक ध्वनि उत्पन्न करता है। अंगरेज़ी में the Modi government और the Modi regime सुनने वाले के मन में एक जैसी भावनाएँ नहीं जगाते। दूसरे प्रयोग में सत्ता के केंद्रीकरण, उसके वैचारिक चरित्र अथवा उसकी संस्थागत कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाने का भाव अधिक मुखर हो सकता है। यही इस अभिव्यक्ति की राजनीतिक तीक्ष्णता है। मोदी सरकार के विरोध की सबसे बड़ी वजह भी यही अर्थध्वनि है।
प्रशांत भूषण ने यदि जान-बूझकर government change के बजाय regime change कहा, तो उन्होंने केवल सत्ताधारी दल के पराजित होने की इच्छा नहीं, हिन्दी शासन की वर्तमान पद्धति के प्रति अपनी गहरी असहमति भी व्यक्त की। इसे कठोर राजनीतिक आलोचना कहा जा सकता है। इसकी वैचारिक उपयुक्तता पर बहस की जा सकती है। मगर किसी शासन-व्यवस्था के चरित्र पर प्रश्न उठाना और संवैधानिक व्यवस्था को बलपूर्वक ध्वस्त करने का षड्यंत्र रचना दो बिल्कुल अलग गतिविधियाँ हैं। एक आलोचना का अधिकार है, दूसरी अपराध हो सकती है। दोनों के बीच का अंतर शब्द की उत्तेजना नहीं, उसके साथ जुड़ा उद्देश्य, साधन और आचरण निर्धारित करते हैं।
अब इस भाषिक विवेचन के सामने भारतीय जनता पार्टी का अपना राजनीतिक इतिहास रखकर देखिए। 20 दिसंबर 2013 को वाराणसी में नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को उखाड़ फेंकने की जन-आकांक्षा का उल्लेख किया था। इसमें overthrow the Delhi Government जैसी अभिव्यक्ति आती है। उसी संबोधन में Congress-free India को गरीबी और बेरोज़गारी से मुक्ति की शर्त के रूप में प्रस्तुत किया गया था। क्या overthrow शब्द अपने शाब्दिक अर्थ में regime change से कम उग्र है? Overthrow में तो उलट देने, गिरा देने और सत्ता से विस्थापित कर देने की कहीं अधिक प्रत्यक्ष क्रियात्मक तीव्रता है। लेकिन उस समय इस अभिव्यक्ति को चुनावी संदर्भ में पढ़ना उचित था। नरेंद्र मोदी जनता से आगामी चुनाव में कांग्रेस को सत्ता से हटाने की अपील कर रहे थे, न कि आवश्यक रूप से किसी असंवैधानिक कार्रवाई की। यही भाषिक न्याय आज प्रशांत भूषण को भी मिलना चाहिए। लोकतांत्रिक भाषा के लिए एक ही कसौटी होनी चाहिए, वक्ता की राजनीतिक पहचान नहीं।
इससे भी अधिक उल्लेखनीय अभिव्यक्ति है कांग्रेस मुक्त भारत। यह केवल किसी सरकार को बदलने का नारा नहीं था। इसकी प्रतीकात्मक संरचना एक पूरे राजनीतिक दल की अनुपस्थिति की आकांक्षा पर आधारित थी। किसी लोकतंत्र में प्रतिद्वंद्वी दल को चुनाव में पराजित करने की इच्छा सर्वथा वैध है; उसे राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक बना देने का स्वप्न भी वैचारिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा हो सकता है। लेकिन किसी देश को एक वैधानिक राजनीतिक दल से ‘मुक्त’ करने की भाषा उस बहुलतावादी चेतना से असहज संबंध रखती है, जिसके बिना लोकतंत्र की कल्पना अधूरी है। यहाँ ‘मुक्ति’ शब्द भी ध्यान देने योग्य है।
सामान्यतः हम उत्पीड़न, दासता, बीमारी अथवा विपत्ति से मुक्त होने की कामना करते हैं। जब किसी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को इसी भाषिक श्रेणी में रख दिया जाता है तो वह केवल पराजित किए जाने वाला प्रतिस्पर्धी नहीं रह जाता, उससे छुटकारा पाया जाने वाला अवांछनीय अस्तित्व बन जाता है। यह आवश्यक नहीं कि नारे का वास्तविक उद्देश्य उस दल के संवैधानिक अधिकारों का उन्मूलन हो। लेकिन उसकी ध्वनि में लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा से आगे बढ़कर राजनीतिक निष्कासन की आकांक्षा अवश्य सुनाई देती है। विडंबना देखिए कि ऐसी व्यापक प्रतीकात्मक मुक्ति का नारा स्वीकार्य था, मगर regime change संदिग्ध हो गया!
यह केवल एक नेता के भाषण तक सीमित प्रसंग नहीं है। सितंबर 2012 में तृणमूल कांग्रेस ने यूपीए से समर्थन वापस लिया तो भाजपा प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने इसे यूपीए सरकार के पतन की शुरुआत बताया और downfall शब्द इस्तेमाल किया। अप्रैल 2013 में राजसमंद में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह ने कहा कि यूपीए सरकार कभी भी गिर सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतंत्र के हित में सरकार को जाना चाहिए। तब सरकार के पतन की कामना विपक्ष की स्वाभाविक राजनीतिक भूमिका समझी जाती थी। और वस्तुतः उसे ऐसा ही समझा जाना चाहिए था। किंतु आज उन्हीं राजनाथ सिंह को regime change में बांग्लादेश जैसी अराजकता का ख़तरा दिखाई देता है। यहाँ इतिहास एक अत्यंत असुविधाजनक साक्षी है।
इस विवाद की सबसे गंभीर दार्शनिक समस्या यह है कि भारतीय सार्वजनिक जीवन में government, state और nation के बीच आवश्यक विभाजन बार-बार धुँधला किया जाता है। सरकार राज्य नहीं है, राज्य राष्ट्र का पर्याय नहीं है और राष्ट्र किसी एक राजनीतिक दल अथवा निर्वाचित नेता की निजी संपत्ति नहीं हो सकता। सरकारें संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत आती-जाती हैं; राज्य की वैधानिक निरंतरता उनसे व्यापक होती है। राष्ट्र का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और मानवीय अस्तित्व इन दोनों से भी अधिक विस्तृत है। किसी सरकार का विरोध राष्ट्र का विरोध नहीं है। किसी दल को सत्ता से हटाने की आकांक्षा राज्य के विनाश की इच्छा नहीं है। और किसी शासन-पद्धति की आलोचना संविधान को नष्ट करने की योजना नहीं है। इन सभी संकल्पनाओं को एक ही राजनीतिक अस्तित्व में विलीन कर देना बहुलतावादी लोकतंत्र के लिए वास्तविक वैचारिक संकट उत्पन्न करता है।
इसलिए भारतीय जनता पार्टी को प्रशांत भूषण से असहमत होने का पूरा अधिकार है। यह सब लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है। लेकिन वह एक तरफ़ अपने इतिहास में downfall, overthrow, government must go और Congress-mukt Bharat जैसी अभिव्यक्तियों को राजनीतिक जनादेश की आकांक्षा माने तथा दूसरी ओर अपने विरोधियों के regime change को बिना पर्याप्त प्रमाण राष्ट्रीय षड्यंत्र का पर्याय बना दे तो उस दोहरे मानदंड को सार्वजनिक परीक्षण से छूट नहीं मिल सकती। किसी राजनीतिक शब्द का संवैधानिक अर्थ इस बात पर निर्भर नहीं हो सकता कि उसे बोलते समय व्यक्ति सत्ता की तरफ़ मुँह किए खड़ा था या विपक्ष की तरफ़।
आख़िरकार यह विवाद अंगरेज़ी के दो शब्दों से अधिक लोकतंत्र की उस बुनियादी नैतिकता का है, जिसमें सत्ता की अस्थायित्व-स्वीकृति ही उसकी वैधता का एक प्रमुख आधार है। सरकार बदलने की इच्छा कोई लोकतांत्रिक दुर्घटना नहीं; लोकतंत्र की स्वाभाविक संभावना है। उसकी आलोचना कीजिए, उससे चुनाव में लड़िए, उसका वैचारिक प्रतिवाद कीजिए, लेकिन उसे बिना प्रमाण राष्ट्रविरोधी अपराध मत बनाइए। Regime change यदि हिंसा, विदेशी हस्तक्षेप अथवा संवैधानिक व्यवस्था के विध्वंस का आह्वान है तो उसका प्रतिरोध होना चाहिए। यदि वह स्वतंत्र चुनाव, नागरिक संघर्ष और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से सत्ता परिवर्तन की आकांक्षा है तो वह उसी राजनीतिक स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति है जिसके सहारे भारतीय जनता पार्टी स्वयं विपक्ष से सत्ता तक पहुँची थी।
भारतीय लोकतंत्र को आज किसी अंगरेज़ी शब्द से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। उसे उस राजनीतिक प्रवृत्ति से सावधान रहने की आवश्यकता है, जो अपनी महत्वाकांक्षा को राष्ट्रहित और प्रतिद्वंद्वी की वैसी ही महत्वाकांक्षा को राष्ट्रविरोध का नाम देती है। लोकतंत्र का वास्तविक सौंदर्य यह नहीं कि उसमें कोई शासन कितने वर्षों तक बना रहता है; यह है कि उसके बने रहने के दौरान भी नागरिक उसे बदलने की स्वतंत्र इच्छा व्यक्त कर सकते हैं। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे ख़तरनाक शब्द ‘Regime Change’ नहीं है। लोकतंत्र के लिए सबसे भयावह क्षण वह नहीं, जब कोई नागरिक सरकार बदलने की इच्छा व्यक्त करता है; वह है, जब किसी राजनीतिक समूह को सरकार के बदले जाने की कल्पना तक विचलित करने लगती है, क्योंकि उसी क्षण जनता की संप्रभुता सत्ता पर विश्वास दरकता है। यह भाषा का भौतिक शास्त्र ही नहीं, यह लोकतंत्र का रसायन शास्त्र भी है।
