ब्यास में ड्रेजिंग : बाढ़ से बचाव या नई मुसीबत का खतरा?
कुलभूषण उपमन्यु
गत दिनों लुधियाना से संबंधित एक संस्था “पब्लिक एक्शन कमिटी मत्तेवाड़ा सतलुज” ने कुल्लू-मनाली क्षेत्र में ब्यास नदी के तल को गहरा करके किनारों पर कंक्रीट की दीवारें लगाने के काम को बंद करवाने के लिए राष्ट्रीय सड़क प्राधिकरण, वन पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय हिमाचल प्रदेश और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को नोटिस देकर हिमालय क्षेत्र में नदी एवं बाढ़ प्रबंधन के मुद्दे पर जारी बहस को पुनर्जीवित कर दिया है, जिस पर स्पष्टता टिकाऊ पर्वतीय विकास के लिए जरूरी है। 2023 में भी बरसात में ब्यास की बाढ़ ने इस क्षेत्र में भारी तबाही की थी। राष्ट्रीय राजमार्ग भी तबाह हुआ था, जिसके निरीक्षण के लिए सड़क एवं परिवहन मंत्री भारत सरकार माननीय नितिन गडकरी ने इस क्षेत्र का दौरा किया था। तब भी नदी की ड्रेजिंग की बात उठी थी।
हिमालय नीति अभियान ने तब भी इस पर प्रश्न उठाया था और उचित तकनीकी और वैज्ञानिक शोध के बाद ही कोई निर्णय करने की बात कही थी। 5 अगस्त 2023 को इस विषय पर मेरा भी एक लेख प्रकाशित हुआ था। लुधियाना की संस्था ने एमसी. मेहता बनाम कमल नाथ केस का भी जिक्र किया है, जिसका फैसला 15 मार्च 2002 को हुआ, जिसमें उच्चत्तम न्यायालय ने ब्यास नदी के प्राकृतिक बहाव से छेड़ छाड़ पर अंकुश की बात कही थी और सार्वजनिक न्यास के सिद्धांत के आधार पर “प्रदूषक द्वारा भरपाई” को सही ठहराया था। उस नोटिस में राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण में दायर सुगंधा बनाम सड़क परिवहन मंत्रालय के केस का भी हवाला दिया है, जिसके अंतर्गत हिमाचल में हाईवे निर्माण से संबंधित चिंताओं को जायज ठहराया था, जिनमें सड़क के सर्वे से जुड़े मामलों जैसे कि नदी के उच्चत्तम बाढ़ स्तर का आकलन करना शामिल है ताकि यह पता लग सके कि कहीं सड़क बाढ़ स्तर के भीतर तो नहीं आ गई है या सड़क निर्माण कार्य बाढ़ निर्मित समतल भूमियों में तो नहीं घुस गया है। जाहिर है कि ड्रेजिंग कार्य सड़क को सुरक्षित करने और नदी के पास की बस्तियों को बाढ़ से बचाने के लिए किया जा रहा है, इसलिए यह जरूरी हो जाता है कि पहले न्यायालय द्वारा दी गई हिदायतों का पालन किया जाए। इस मामले में यदि पालन किया गया है तो बताया जाना चाहिए वरना यह एक बड़ी लापरवाही मानी जाएगी। हिमालय नीति अभियान के संयोजक गुमान सिंह ने भी मांग की है कि नदी के प्रवाह को बदलने वाली कोई भी कारवाई पर्याप्त वैज्ञानिक अध्ययन के बिना करना खतरनाक हो सकती है।

वैज्ञानिक दृष्टि से नदी में जमा मलबा हमेशा समस्या नहीं होता। हिमालयी नदियां अपने साथ भू-क्षरण और चट्टानों के अपक्षय से टूटने से पैदा मलबा अपने साथ लाती रहती हैं और उसे नीचे तक बहा कर जगह-जगह छोड़ती जाती हैं। यही नदी की पारिस्थितिकी का निर्माण करता है। इसमें ज्यादा छेड़छाड़ नदी की पारिस्थितिकी को हानि पंहुचा सकती है। हिमालयी नदियों के तल सख्त चट्टानों द्वारा नहीं बने हैं। इसलिए ज्यादा मलबा निकाल लेने से तेज ढलानों के कारण नदी तल के भूमि कटाव के बढ़ने और तल के गहरे होते जाने का खतरा पैदा हो सकता है। तल यदि गहरा हो गया तो किनारे पर लगाई गई आरसीसी दीवारों की नींव भी नंगी हो जाएगी और दीवारें अंदर नदी में गिर कर ज्यादा खतरनाक बाढ़ का कारण बन सकती हैं।
ड्रेजिंग एक स्थायी समाधान कभी नहीं हो सकता, क्योंकि हिमालयी नदियों द्वारा हर साल लाया जाने वाला मलबा कुछ ही सालों में खाली किए गए स्थलों को भर देगा और जल निकासी की क्षमता फिर से घट जाएगी, यानि बार बार आपको ड्रेजिंग करते रहना पड़ेगा। यह आर्थिक रूप से भी कितना संभव होगा। नदी पर्यावरण का जल जीव भी बड़ा हिस्सा हैं। ड्रेजिंग से उनके आवास तो खत्म ही हो जाएंगे। इन सभी बातों का ध्यान रखने के लिए पहले हर नदी घाटी, उसके जलागम क्षेत्र और चट्टानों के प्रकार आदि का वैज्ञानिक निरीक्षण किया जाना चाहिए, ताकि यह तय किया जा सके कि कहां कितनी मात्रा में ड्रेजिंग निरापद रूप से बिना नदी के पर्यावरण को हानि पंहुचाए किया जा सकता है।
डॉ. नविन जुयाल जैसे हिमालयी नदियों के बारे में वैज्ञानिक समझ रखने वाले विशेषज्ञों की राय तो ड्रेजिंग के विरुद्ध ही है। अत: इस विषय में पुनर्विचार की जरूरत है। हो सकता है कि नदी के जलागम क्षेत्र में मलबा रोकने के लिए किए जाने वाले भू-संरक्षण उपायों की ज्यादा जरूरत हो और वे ज्यादा कारगर हों, इसलिए हालत की यह मांग है कि इस परियोजना पर पुर्विचार किया जाए और हिमाचल की इन तीन नदियों, सतलुज, ब्यास, और रावी पर पूरा वैज्ञानिक अध्ययन करवाया जाए, जिसमें इन नदियों पर बने बांध जलाशयों पर ड्रेजिंग से पड़ने वाले प्रभावों का भी आकलन किया जाना चाहिए, ताकि बनाई जा चुकी परिसंपत्तियों को भी नुकसान न पंहुचे।
