समय के सामने कवि और कविता

(जनवादी कवि ओमसिंह अशफ़ाक की एक लोकप्रिय कविता है ‘जब इंसाफ कहीं ना होता हो'(अन्याय गाथा)। उक्त कविता के कुछ बंध प्रसंगवश कुछ लेखों में हमारे पाठकों तक पहुंचे तो कुछ ने पूरी कविता पढ़ने की जिज्ञासा प्रकट की है। शेष बंध यहां दिए जा रहे हैं और साथ ही प्रस्तुत है-समय के सामने कवि का बयान -संपादक)

समय के सामने कवि और कविता

ओमसिंह अशफ़ाक

इस दौर में हमारे देश और दुनिया में जो कुछ घट रहा है, वह समाज के ज्यादातर हिस्सों को निरन्तर परेशान और चिंतित किए हुए है। शोषित-उत्पीड़ित तबके अपने-अपने ढंग और सामर्थ्य अनुसार इस जुल्म और शोषण का प्रतिरोध व प्रतिकार भी कर रहे हैं।

लेकिन लगता है कि वर्चस्वशाली मीडिया उनकी आवाज और जद्दोजहद की या तो “उपेक्षा” करता है या फिर मुद्दों को अनुचित और अनैतिक ढंग से “विकृत रूप” में पेश करता है। शायद इसी का असर है कि गरीब किसान और मजदूर वर्ग के कुछ हिस्से असुरक्षा, कुंठा और हताशा में धकेले जाकर आत्महत्याओं जैसे अतिदुखान्त कदम उठाने पर विवश हैं।

उन्हें लगता है कि उनकी “न्याय की आवाज” कहीं भी सुनी नहीं जा रही है और ये दुनिया इतनी “संवेदनहीन और निष्ठुर” हो चली है कि अब यहां जिन्दा रहने का कोई कारण और औचित्य नहीं बचा है।

ऐसी मनः स्थिति में धकेला गया इंसान समाज को “सबक सिखाने और प्रतिशोध लेने” की भावना से संचालित होकर खुदकुशी की ओर प्रवृत्त होता है।

नतीजा-वैसा ही होता है, जैसा हमारे सामने है? बेशक ऐसी स्थिति किसी भी समाज के लिए बेहद त्रासद होती है।

समाज सामूहिक रूप में मानसिक विकारों का शिकार होकर अपनी ऊर्जा का क्षरण कर देता है। उत्पादक शक्तियों का ह्रास होता है। विकास-प्रक्रिया अवरूद्ध हो जाती है।

कांतिहीन समाज में नये-नये आविष्कार और रचना-कौशल के विकास की गुंजाईश ख़त्म हो जाती है और अन्ततः ऐसा समाज हिंसक बनकर रसातल में डूब जाया करता है।

जाहिर है उसमें अनसुनी करने वाले वे तबके भी नहीं बच सकेंगे जो आज अपने अगाध ऐश्वर्य के बल पर कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हैं?

समाजशास्त्री और अर्थमनीषी कार्लमार्क्स ने लिखा है-सौ प्रतिशत मुनाफे के लालच में पूंजी खुदकुशी के लिए भी तत्पर हुआ करती है- यह उसका चरित्र है।

इतिहास में इसके प्रमाण भी सहज उपलब्ध हैं- एक ही सदी में मानवता ने दो-दो विश्वयुद्ध झेले हैं। इसलिए पूंजीपति-सामन्ती शासकवर्ग से न्यायकारी-समतामूलक उत्पादक भविष्य की आशा करना व्यर्थ प्रतीत होने लगा है।

निःसंदेह आज की स्थितियां हर संवेदनशील इंसान को दिनरात परेशान किए हैं और रचनाकारों का दुखी होना तो और भी ज्यादा स्वाभाविक है।

वाकई यह तकलीफदेह दौर है, काला़ दौर है, मुश्किलों का दौर है, लेकिन ऐसे दौर के बारे भी एक महान कवि ने लिखा है:

क्या जुल्मतों के दौर में भी गीत गाए जायेंगे !’

हां, जुल्मतों के दौर के ही गीत गाए जायेंगे !

प्रायः मुझे लगता रहा है कि अन्य विधाओं के बरक्स कविता मानव-मन के ज्यादा निकट पड़ती है- ज्यादा संवेदनशील हिस्सों पर असर करती है। उसकी प्रकृति ही शायद ऐसी है।

यही सोचकर मैंने अपने इस दौर की घटनाओं को कविता में बुनने का यह प्रयास किया है- लोककविता में। लोकशैली, लोकमुहावरे और लोकचित्त में रची-बसी लयात्मकता इस बुनावट के रेशे-धागे हैं। बहुत स्वाभाविक है कि परम्परागत साहित्य-पण्डितों को इस कविता में “पांडित्य का रस” न मिले?

यदि हिन्दुस्तान की करोड़ों शोषित-उत्पीड़ित गरीब-मेहनतकश जनता को इनमें अपनी धमनियों में बजते रक्त की लय सुनाई पड़े तो कवि इसे कविता की कामयाबी तो समझेगा ही, इसी में अपने श्रम का समुचित मूल्य भी पा जाएगा!

कवि का दृढ़ विश्वास है कि यदि साथियों-मित्रों के सहयोग से ये कविताएं जनता तक पहुंच सकीं तो उनके दिलों की धड़कनों के साथ लयबद्ध होकर अपने मक़सद में सफल होंगीं।

 

लोक कविता के कुछ बन्ध

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1.

एक गांव दतेली खीरी’ है !

वहां पांडे की ही पीरी है !

संग थोड़ी-बहुत अमीरी है !

न्यूं पटवा-कन्या के दाग लगा?

परिवार का दम दे गया दगा !

फिरे दिन में कवि ठगा-ठगा !

और रात में रोए जगा-जगा !

भई!दिन बरजण के आन पड़े !

2.

जब लड़कियां खूब पढ़ाकू हों !

पर सफेदपोश बणे डाकू हों !

वे घर से निकलती डरती हों !

लिख-लिख चिठ्ठी मरती हों !

और मरती रम्भाट्टे भरती हों !

भई!दिन बरजण के आन पड़े !

3.

फिर डुंगर’ में यूं चीर हरण हो?

जीते-जी औरत का मरण हो?

अब ना कोई कृष्ण-करण हो?

मजदूर का एक्का अपनी शरण हो!

उत्पीड़ित अपनी बहणा है !

अब चुप हमको ना रहणा है !

भई!दिन बरजण के आन पड़े !

4.

जब घर-घर उदासी छाने लगे?

दुख में माणस सकुचाने लगे !

मजदूर भी फांसी खाने लगे !

यूं जान पर आफ़त आने लगे? 

भई! दिन बरजण के आन पड़े!

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*दिसंबर,2006
(शेष शीघ्र अगली किस्त में)

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1. जिला लखीमपुर खीरी (यू.पी.)

2. यू.पी. में मुज़फ्फरनगर (अब शामली जिला) का एक गांव।

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