कविता
मूर्तियाँ
सरला माहेश्वरी
तुम्हारे बनाने से
नहीं बनती ये मूर्तियाँ !
तुम्हारे तोड़ने से
नहीं टूटतीं ये मूर्तियाँ !
तुम्हारी किसी पंचधातु की मुहताज
नहीं होती ये मूर्तियाँ !
लोगों के दिलो-दिमाग में
बनती और महफ़ूज़ रहती हैं ये मूर्तियाँ !
अरुण माहेश्वरी के फेसबुक वॉल से साभार

कवयित्री – सरला माहेश्वरी
