डॉ रीटा अरोड़ा की लघुकथा – सफलताओं को शोर मचाने दो

लघु कथा

सफलताओं को शोर मचाने दो

 

डॉ रीटा अरोड़ा

 

“सर, आजकल तो वही दिखता है जो अपनी तारीफ़ खुद करता है,” रोहन ने पूछा।

शिक्षक मुस्कुराए, “तो क्या पेड़ हर फल लगने पर ढोल बजाते हैं?”

“नहीं।”

“क्या नदी हर प्यास बुझाने के बाद घोषणा करती है?”

“नहीं, सर।”

शिक्षक ने खिड़की से बाहर देखा और बोले, “क्या चंदन अपनी सुगंध का परिचय देता फिरता है? हवा ही उसे दूर-दूर तक पहुँचा देती है।”

रोहन कुछ देर चुप रहा। फिर बोला, “लेकिन अगर लोग हमारी मेहनत ही न देखें तो?”

शिक्षक ने शांत स्वर में कहा, “मेहनत को लोगों के सामने खड़ा मत करो, उसे इतना सशक्त बनाओ कि एक दिन वही तुम्हारा परिचय दे।”

इतने में परिणाम घोषित होने की घंटी बजी। पूरे विद्यालय में खुशी, तालियों और बधाइयों का शोर गूँज उठा। रोहन भी भीड़ की ओर बढ़ा, फिर एक पल के लिए ठिठक गया।

शोर धीरे-धीरे थम गया…

पर शिक्षक की कही बात उसके मन में देर तक गूँजती रही।

 

डॉ रीटा अरोड़ा,सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल