ओमसिंह अशफ़ाक की कविता – कबीर चौकड़ा

कविता

कबीर चौकड़ा

ओमसिंह अशफ़ाक

1

कबीरा एक बार फिर आजा !

खतरे में है अपनी थाती

हमको तेरी याद सताती

यूँ तो साधु-संत बहुत हैं

भांति-भांति के पंथ बहुत हैं

बेढब पर ये गड़बड़ झाला

गुड़ का सब कर दीना राला़

मति मुंडाये सब फिरते हैं

मंदिर-मस्जिद पे लड़ते हैं

मान–मूल्य–मर्यादा का ये

लेकर चले जनाजा!

कबीरा एक बार फिर आजा!!

2.

 

कृषक की यहाँ हालत खस्ता

पटवारी का भारी-बस्ता

कारीगर हुए दुखी बेचारे

इंजीनियर के वारे-न्यारे

मंत्री तिकड़म में मशगूल

जनता बेबस फाँकें धूल

लीडर भी धन हड़प रहे हैं

बच्चे दूध-बिन तड़प रहे हैं

बैंक यहाँ घोटाले करते

कुटुंब नेक गुरबत में मरते

हमको फिक्र पड़ी रोज़ी की

ये पैदा करें तनाज़ा !

कबीर एक बार फिर आजा!!

3.

 

भैंस और लाठी हुई एक

अब कौन सुने जनता की टेक

नेता भी पल़ गये मुसटंडे

माँगों नौकरी खाओ डंडे

शासन की तबियत रंगीनी

अपनी तो हालत संगिनी

ऐसी मार पड़ी सरकारी

घर में आटा-ना-तरकारी

अद्भुत कारोबार सजा है

बेईमानों का मौज-मजा है

पहले जो होता था चोर

बन बैठा अब सीना-जोर

सच को तो बनवास दे दिया-

झूठ बनाया हमने राजा !

कबीर एक बार फिर आजा !!

4.

 

भूल गये और भटक गये हम

बीच भंवर में अटक गये हम

विचार श्रेष्ठ ना जीवन सादा

कौन हरे फिर अपनी व्याधा

खुद ही मकड़जाल बुनते हैं

उनमें घिर फिर सिर धुनते हैं

प्रेम का आखर नहीं पढ़ा है

जीवन में रस नहीं चढ़ा है

बाजे कैसे नाद अनहदी

अब तू ही हमें बता जा!

कबीरा एक बार फिर आजा !!

 

(जुलाई 1993)