डॉ रीटा अरोड़ा का छोटे लम्हे, बड़ी सीख (9)

युवाओं, अब यह स्वतंत्रता की मशाल तुम्हारे हाथों में है। इसे केवल संभालना नहीं, और अधिक उज्ज्वल बनाना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां गर्व से कह सकें - “हमारे पूर्वजों ने हमें आज़ादी दी थी, और हमने उस आज़ादी को सम्मान, एकता और कर्म से जीवित रखा।”

घर परिवार

छोटे लम्हे, बड़ी सीख (9)

डॉ रीटा अरोड़ा

 

1. रूठा भाई

माँ ने कहा – “भाई से बात कर ले, आखिर अपना है।”

बेटी बोली – “पहले वो फोन करे।”

उधर भाई भी यही सोच रहा था।

साल गुजरता गया।

 

*सीख*: कई रिश्ते बड़े झगड़ों से नहीं, “पहले वह क्यों नहीं?” के इंतज़ार में टूट जाते हैं।

 

2. बड़ा घर

बेटे ने गर्व से कहा – “पापा, आखिर आपका सपना पूरा कर दिया। इतना बड़ा घर खरीद लिया!”

पिता ने चारों ओर देखा और धीरे से पूछा-

“बहुत सुंदर है बेटा… सब साथ कब बैठेंगे?”

सीख: घर का आकार बढ़ने से परिवार का साथ नहीं बढ़ता।

 

3. जीत किसकी?

पति बोला- “देखा, आखिर मेरी बात सही निकली!”

पत्नी चुप हो गई।

कमरे में सन्नाटा फैल गया।

पति बहस तो जीत गया था, लेकिन रात दोनों ने अलग-अलग करवटें बदलते गुज़ारी।

सीख*: हर बहस जीतना जरूरी नहीं; कभी-कभी हार जाना रिश्ता बचा लेता है।

 

4. छूटी हुई नौकरी

बेटी रोते हुए बोली- “माँ, नौकरी नहीं मिली। मेरी सारी मेहनत बेकार हो गई।”

माँ ने सिर्फ़ इतना कहा- “आज दुखी हो ले, लेकिन इसे अपनी कहानी का आखिरी पन्ना मत समझना।”

कुछ महीने बाद बेटी के हाथ में दूसरी कंपनी का नियुक्ति-पत्र था।

सीख*: हर बंद दरवाज़ा अंत नहीं होता; कभी-कभी वही रास्ता बदलता है।

5. अपने लिए

महिला पार्क में अकेली बैठी किताब पढ़ रही थी।

पड़ोसन ने पूछा—“आज अकेली? घर पर सब ठीक है न?”

वह हँस पड़ी—“सब बिल्कुल ठीक है।”

“फिर यहाँ अकेली?”

उसने किताब बंद की और कहा—

“पूरे दिन सबके लिए रहती हूँ। यह आधा घंटा अपने लिए रख लिया है।”

पड़ोसन कुछ क्षण उसे देखती रही।

सीख: स्त्री का अपने लिए समय निकालना स्वार्थ नहीं; स्वयं से जुड़े रहने की जरूरत है।

 

6. आखिरी तालियाँ

सेवानिवृत्ति के दिन बहुत तालियाँ बजीं।

घर लौटते समय उन्होंने पत्नी से पूछा- “इतने वर्षों में मैंने कमाया क्या?”

पत्नी मुस्कुराईं- “कल से देखना। जिन लोगों को तुम्हारा पद नहीं, तुम्हारी याद आएगी-वही तुम्हारी असली कमाई हैं।”

वे खिड़की से बाहर देखते रहे।

सीख: जीवन का असली हिसाब उपलब्धियों से नहीं, हमारे जाने के बाद बची अच्छी यादों से होता है।

डॉ. रीटा अरोड़ा, सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर, करनाल

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